पाकिस्तान में हिंदू: स्वात से सीनेट तक अमरजीत का संघर्ष

 सोमवार, 21 मई, 2012 को 07:01 IST तक के समाचार

पाकिस्तान के सफल हिंदु -1

पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों की सफल कहानियों के पहले भाग में स्वात घाटी के निवासी सीनेटर अमरजील मल्होत्रा से बातचीत.

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पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों को हमेशा से ही समस्याओं का सामना रहा है और वह समस्याएँ कम नहीं हुई हैं, लेकिन कुछ ऐसे व्यक्ति हैं जिन्होंने इन सब दिक्कतों के बावजूद समाज में अपना स्थान बनाए रखा है. उनके योगदान को पूरे देश में कदर की निगाह से देखा जा रहा है.

बीबीसी हिंदी ने कुछ ऐसे ही खास शख्सियतों से बातचीत की है.

इस श्रंखला की पहली कड़ी में स्वात निवासी सीनेटर अमरजीत मल्होत्रा के बातचीत.

स्वात घाटी का नाम सुनते ही आतंकवाद, चरमपंथ और तालिबान जैसे शब्द ज़हन में उभर आते हैं लेकिन इसमें एक ऐसा नाम जुड़ गया है जो इन सबसे बहुत भिन्न है.

वह है 45 वर्षीय अमरजीत मल्होत्रा.

स्वात घाटी के इलाके बरीकोट के निवासी अमरजीत मल्होत्रा पाकिस्तानी संसद के ऊपरी सदन सीनेट के सदस्य हैं और वे रुढ़िवादी माने जाने वाले प्रांत खैबर पख्तूनख्वाह से पहले हिंदू सीनेटर हैं.

पार्टी का विश्वास

उनका संबंध उदारवादी दल अवामी नेशनल पार्टी से हैं, जिसकी बुनियाद बाचा खान ने डाली थी. बाचा खान सीमांत गांधी के नाम से मशहूर हैं जो महात्मा गांधी के करीबी मित्रों में से एक थे.

वैसे अमरजीत मल्होत्रा पेशे से व्यापारी और पिछले कई सालों से उनका परिवार स्वात घाटी और आसपास के इलाकों में कपड़े का व्यापार करता रहा है.

महनत करुँगा

"अल्लाह ने मुझे सेवा का मौका दिया है और मैं कोशिश करुँगा कि अपने समुदाय के साथ साथ मुसलमानों की भी सेना कर सकूँ. अपने इलाके स्वात घाटी के विकास के लिए काफी महनत करुँगा."

अमरजीत मल्होत्रा, स्वात घाटी से सांसद

उन्होंने वर्ष 1980 में राजनीति में भाग लिया और आवामी नेशनल पार्टी के सदस्य बने. वे जिला स्तर पर कई बार पार्टी के पदाधिकारी रह चुके हैं और पार्टी के भीतर एक ईमानदार नेता के तौर पर जाने जाते हैं.

सीनेटर जैसे पर बड़े पद पहुँचने का कारण भी उनकी ईमानदारी ही है. इस बारे में वे कहते हैं कि उनकी पार्टी को इस पद के लिए 16 उम्मीदवारों ने आवेदन दिया था और उसमें से केवल उनको चुना गया.

संसद के ऊपरी सदन में बैठ कर वे अपने समुदाय के प्रतिनिधत्व कर काफी गौरव महसूस करते हैं और कहते हैं कि पहली बार पार्टी ने इतनी बड़ी ज़िम्मेदारी दी है तो इस पर पूरा उतरने की कोशिश कर रहे हैं.

वे कहते हैं, “अल्लाह ने मुझे सेवा का मौका दिया है और मैं कोशिश करुँगा कि अपने समुदाय के साथ साथ मुसलमानों की भी सेना कर सकूँ. अपने इलाके स्वात घाटी के विकास के लिए काफी महनत करुँगा.”

शिक्षा पर ज़ोर

उन्होंने स्वात घाटी में शिक्षा को बढ़ावा देने का संकल्प लिया और कहते हैं कि तालिबान चरमपंथियों ने जिन स्कूलों को नष्ट कर दिया था, वह अब उसका फिर से निर्माण करवाने की कोशिश कर रहे हैं.

“तालिबान चरमपंथियों ने 400 के करीब हमारे स्कूलों को नष्ट कर दिया था और अब अपनी प्रांतीय सरकार और सेना से मिल कर उसके फिर से निर्माण की पूरी कोशिश कर रहा हूँ. इसमें सेना का पूरा सहयोग हासिल है.”

व कहते हैं कि वर्ष 2010 में आने वाले भयंकर बाढ़ ने स्वात घाटी को काफी नुकसान पहुँचाया था और वे अपने इलाके के पुनर्निमाण के लिए भी कोशिश कर रहे हैं.

पश्तो भाषा की शैली में बात करने वाले अमरजीत बताते हैं कि स्वात घाटी में अब हालात बहतर हैं और जो हिंदू परिवार इलाका छोड़ कर सुरक्षित इलाकों की ओर चले गए थे, अब वापस आ गए हैं और उन्हें कोई डर नहीं है.

स्वात के स्कूल

अमरजीत मल्होत्रा तालिबान की ओर से नष्ट किए गए स्कूलों का फिर से निर्माण करवा रहे हैं.

मुसलमानों का अल्पसंख्यकों के प्रति रवैय पर बात करते हुए उन्होंने कहा, “अगर वहाँ के लोगों का रवैया हमारे साथ अच्छा न होता तो हम वहाँ क्यों रहते. हम वहाँ दशकों रह रहे हैं और हम भाईयों जैसे आपस में रहते हैं.”

अनिश्चितता बरकरार

उन्होंने बताया कि जब स्वात घाटी पर तालिबान चरमपंथियों का कब्ज़ा था तो कई परिवार इलाका छोड़ चले गए थे क्योंकि उन्हें चरमपंथियों की ओर से धमकियाँ मिली थी लेकिन किसी को जानी नुकसान नहीं हुआ.

अमरजीत कहते हैं कि इस समय स्वात घाटी में करीब छह सौ परिवार रह रहे हैं और वह बिन किसी डर या खौफ के अपना जीवन बिता रहे हैं और उन्होंने फिर से अपना कारोबार शुरु दिया है.

ग़ौरतलब है कि स्वात खैबर पख्तूनख्वाह प्रांत की सुंदर घाटियों में से एक है और पिछले कई सालों से तालिबान चरमपंथियों का गढ़ रहा है.

वर्ष 2009 में पाकिस्तानी सेना ने व्यापक स्तर पर अभियान कर स्वात घाटी को तालिबान और अन्य चरमपंथियों से सुरक्षित किया था.

अब स्वात घाटी और उसके आसपास के इलाक़ों में हालात बहतर हैं और चरमपंथियों का ज़ोर भी टूट गया है लेकिन अभी तक अनिश्चितता अपनी जगह बरकरार है.

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