'पाकिस्तान को सोचना होगा कि वह कैसा देश बनना चाहता है'

 रविवार, 8 अप्रैल, 2012 को 05:56 IST तक के समाचार

आसिफ अली जरदारी एक दिन की भारत यात्रा पर अजमेर आ रहे हैं

सरकारी तौर पर तो पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की ये निजी यात्रा है, लेकिन इसके निहितार्थ से इंकार नहीं किया जा सकता.

क्योंकि यदि पाकिस्तान के राष्ट्रपति और भारत के प्रधानमंत्री पूरे शिष्टमंडल के साथ मिल रहे हैं, भले ही थोड़ी देर के लिए तो पूरी तरह से तो ये यात्रा निजी नहीं हो सकती.

जैसा कि हम जानते ही हैं कि पहले से रुकी हुई समग्र वार्ता प्रक्रिया फिर से शुरू हुई है और अभी जारी है. ऐसे में जब दोनों लोग मिलेंगे तो भारत और पाकिस्तान दोनों देशों के कुछ अहम मुद्दों का जिक्र तो होगा ही.

लेकिन जिस तरह से पिछले दिनों पाकिस्तान की असेंबली में विपक्षी दलों ने कहा है और खुद प्रधानमंत्री ने भी कहा है तो उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है कि कुछ ठोस परिणाम निकलने की उम्मीद नहीं है.

निजी प्रयास

जहां तक जरदारी साहब का निजी सवाल है, तो वे जब से सत्ता में आए हैं उन्होंने भारत के साथ रिश्ते सुधारने के लिए कई प्रयास किए हैं.

जब वो नए नए राष्ट्रपति बने थे तो उन्होंने कहा था कि कश्मीर का मुद्दा इतनी आसानी से सुलझने वाला नहीं है इसलिए इसे बैक बर्नर पर रखा जाए और इसकी वजह से दूसरे मुद्दों पर बातचीत न रोकी जाए.

न्यूक्लियर मुद्दे पर भी उन्होंने कहा था कि ये ‘नो फर्स्ट यूज’ होना चाहिए. इस तरह से उन्होंने कई सकारात्मक बयान दिए थे, जिससे उनकी निजी मंशा का पता चलता है.

लेकिन अपनी सोच के हिसाब से वे कहां तक कर पाते हैं ये देखने वाली बात होगी. जिस तरह से पाकिस्तान के शासन में सेना की भूमिका है, एक नई काउंसिल बनी है- दिफाए पाकिस्तान नाम की, इन सबके दबाव के आगे वे कितना कर पाते हैं, ये देखना होगा.

साल 2005 के बाद पाकिस्तान के राष्ट्राध्यक्ष की पहली भारत यात्रा है

रही बात शिष्टमंडल की तो गृहमंत्री रहमान मलिक के साथ आने का कुछ मतलब निकाला जा सकता है. लेकिन इससे बहुत उम्मीद रखना ठीक नहीं है.

क्योंकि यदि बातचीत होती है तो जाहिर है भारत 9/11 की बात करेगा, हाफिज सईद की बात करेगा. और पाकिस्तान इस बारे में कुछ कर पाने या ठोस आश्वासन दे पाने की स्थिति में नहीं है, तो बड़े शिष्टमंडल का मतलब ये नहीं कि कुछ बड़ा होने वाला है.

समस्या

यहां एक बात और है. पाकिस्तान को अपने लिए एक फैसला करना बहुत जरूरी है कि वो किस तरह का देश अपने आप को समझते हैं और किस तरह का देश बनना चाहता है.

आतंकवाद का मुद्दा सिर्फ हिन्दुस्तान का नहीं है. पूरी दुनिया के लिए खतरनाक है. अमेरिका ने इसके खिलाफ क्या कदम उठाए हैं ओसामा को लेकर या फिर हाफिज सईद को लेकर.

हाल ही में चीन ने भी ऐसे आरोप लगाए हैं कि आतंकवादियों को पाकिस्तान में पनाह मिल रही है.

कहने का मतलब ये कि पाकिस्तान के मित्र देश भी उसके ऊपर उंगली उठाने लगे हैं. ऐसे में पाकिस्तान के लिए अपने बारे में एक रास्ता तय करना बहुत जरूरी है.

साथ ही भारत को भी ये सोचना होगा कि उसके साथ रिश्ते सुधारने का क्या मतलब है.

यदि पाकिस्तान आतंकवाद की मुहर लगा कर ही आगे बढ़ने में अपना भविष्य देख रहा है, फिर तो भारत को भी ये सोचना होगा कि क्या हम उसके साथ दोस्ती कर सकते हैं या नहीं.

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