
अदालत की अवमानना के मामले में प्रधानमंत्री 19 जनवरी को सु्प्रीम कोर्ट में पेश हुए थे
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी ने सुप्रीम कोर्ट में अदालत की अवमानना के मामले में अग्रिम याचिका दायर की है.
माना जा रहा है कि उन्होंने ये याचिका इसलिए दायर की है क्योंकि उन्हें आशंका है कि अदालत उनके ख़िलाफ़ अभियोग तय कर सकती है.
प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी के वकील ऐतेज़ाज़ एहसन ने यह याचिका तैयार की और एड्वोकेट ऑन रिकॉर्ड एस एम ख़टक ने दायर की.
उस याचिका में अदालत ने अनुरोध किया गया है कि याचिका पर फ़ैसला होने तक दो फ़रवरी के अदालती फ़ैसले पर अमल न किया जाए.
ग़ौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय खंडपीठ ने दो फ़रवरी को अदालत की अवमानना करने के आरोप में प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी पर अभियोग शुरू करने का फ़ैसला लिया था.
अदालत ने प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी को 13 फ़रवरी को पेश होने का आदेश भी दिया था.
प्रधानमंत्री पर अभियोग का फ़ैसला
प्रधानमंत्री की ओर से दायर की गई याचिका में अदालत से कहा गया है कि दो फ़रवरी को अदालत ने उनके वकील को सुने बिना उनके ख़िलाफ़ अभियोग लागू करने की कार्रवाई शुरु करने का फ़ैसला लिया था.
सुप्रीम कोर्ट ने 16 जनवरी को कई नेताओं को मिली आम माफ़ी के मामले में प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी को अदालत की अवमानना का नोटिस जारी किया था.
प्रधानमंत्री यूसुफ रज़ा गिलानी 19 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए थे और अदालत को बताया था कि पाकिस्तान के संविधान के तहत राष्ट्रपति ज़रदारी पर कोई मामला नहीं चलाया जा सकता.
क्या है मामला
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ज़रदारी और उनकी दिवंगत पत्नी और पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो को साल 2003
में स्विटज़रलैंड की एक अदालत ने करोड़ो डॉलर की हेराफेरी का दोषी पाया था.
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बाद में इन दोनों ने इस निर्णय के विरुद्ध अपील की.
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वर्ष 2008
में पाकिस्तानी सरकार के निवेदन पर स्विटज़रलैंड ने ये जांच बंद कर दी.
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वर्ष 2008
में बेनज़ीर भुट्टो के ख़िलाफ़ बहुत से ऐसे मामले बंद कर दिए गए थे. इसके बाद ही
वे चुनावों में भाग लेने के लिए पाकिस्तान आ पाई थीं.
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साल 2009
में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों को बंद करने के आदेश को असंवैधानिक घोषित किया.
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ये मामले नैशनल रिकंसिलिएशन आर्डिनेंस या एनआरओ के तहत बंद किए गए थे.
- इस क़ानून का लाभ उठाने वालों में राष्ट्रपति ज़रदारी, गृह मंत्री रहमान मलिक, कई अन्य मंत्री, वरिष्ठ नेता और सरकारी कर्मचारी हैं.
गिलानी पर आरोप है कि उन्होंने ज़रदारी के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के मामलों की जांच के लिए स्विस अधिकारियों से आग्रह न करके अदालत की अवमानना की है.
प्रधानमंत्री गिलानी ने स्विटरज़रलैंड से राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के एक मामले की दोबारा जांच शुरू करने का आवेदन नहीं किया था. इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने गिलानी के विरुद्ध अवमानना की कार्यवाही शुरू की थी.
पाकिस्तान में गिलानी सरकार एक तरफ़ न्यायापालिका और दूसरी तरफ़ ताक़तवर सेना से उलझी हुई है.
हेराफ़ेरी के मामले
वे हमेशा से ही स्विटज़रलैंड को ज़रदारी के विरुद्ध जांच का आवेदन करने से मना करते रहे हैं. उनका तर्क है कि जब तक राष्ट्रपति अपने पद हैं उन पर अभियोग नहीं चलाया जा सकता.
राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी और उनकी दिवंगत पत्नी व पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो को साल 2003 में स्विटज़रलैंड की एक अदालत ने करोड़ो डॉलर की हेराफेरी का दोषी पाया था.
ये मामला उस समय का था जब बेनज़ीर भुट्टो सत्ता में थीं.
बाद में इन दोनों ने स्विटज़रलैंड में इस निर्णय के विरुद्ध अपील की थी. उसके बाद वर्ष 2008 में पाकिस्तानी सरकार के निवेदन पर स्विटज़रलैंड ने ये जांच बंद कर दी थी.
वर्ष 2008 में बेनज़ीर भुट्टो के ख़िलाफ़ बहुत से मामले बंद कर दिए गए थे, जिसकी वजह से वे चुनावों में भाग लेने के लिए पाकिस्तान आ पाई थीं.
इसके कुछ समय बाद ही उनकी हत्या हो गई थी.
लेकिन वर्ष 2009 में पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने इन मामलों को बंद करने के आदेश को असंवैधानिक घोषित कर दिया था.

राष्ट्रपति के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार के मामले फिर से चलाने पर सरकार और न्यायपालिका के बीच मतभेद हैं.
नेताओं को आम माफ़ी
दरअसल पूर्व राष्ट्रपति परवेज़ मुशरर्फ़ ने अपने कार्यकाल में कई नेताओं और अधिकारियों को आम माफ़ी दी थी यानी इन लोगों के ख़िलाफ़ मुक़दमा नहीं चलाया जा सकता था. 90 के दशक के दौरान इन लोगों पर कई तरह के आरोप लगे थे.
नेशनल रिकंसिलिएशन आर्डिनेंस या एनआरओ के नाम से प्रचलित इस क़ानून का लाभ उठाने वालों में राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी, गृह मंत्री रहमान मलिक, कई अन्य मंत्री, वरिष्ठ नेता और सरकारी कर्मचारी शामिल हैं.
राष्ट्रपति बनने से पहले ज़रदारी कई सालों तक जेल में थे और उन पर भ्रष्ट्राचार के कई आरोप लगे थे.
लेकिन पाकिस्तान की अदालत ने इस विवादास्पद अध्यादेश को दिसंबर 2009 में अवैध क़रार दिया था साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने बचाव का रास्ता भी सुझाया था और कहा था कि सरकार को संसद में विश्वास मत हासिल करना होगा.

















