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हक़्क़ानी के कथित संदेश से उठते कई सवाल

 मंगलवार, 22 नवंबर, 2011 को 19:47 IST तक के समाचार
पाकिस्कानी सेना

ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद पाकिस्तान का मनोबल काफ़ी गिर गया था.

अमरीका में पाकिस्तान के राजदूत हुसैन हक़्क़ानी सरकार के बुलावे पर इस्लामाबाद पहुँच चुके हैं और वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाक़ात कर कथित संदेश से जुड़े विवाद पर स्पष्टीकरण देंगे.

हुसैन हक़्क़ानी की बैठकों पर औपचारिक रुप से कुछ नहीं बताया जा रहा है और ख़बरें हैं कि उन्होंने राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी से मुलाक़ात की है लेकिन उसकी भी कोई जानकारी नहीं दी गई है.

हुसैन हक़्क़ानी की पत्नी और सत्ताधरी दल पीपुल्स पार्टी की वरिष्ठ सांसद फ़रह नाज़ इस्फ़हानी ने पत्रकारों को बताया कि वे राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी, प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी और सैन्य अधिकारियों से मुलाक़ात करेंगे.

उनके मुताबिक़ हुसैन हक़्क़ानी ने अपना लैपटॉप और ब्लैकबेरी फ़ोन जाँच के लिए देने का भी प्रस्ताव दिया है.

स्प्ष्टीकरण

"हुसैन हक़्क़ानी राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी, प्रधानमंत्री यूसुफ़ रज़ा गिलानी और सैन्य अधिकारियों से मुलाक़ात करेंगे और उन्होंने अपना लेपटॉप और ब्लैक बैरी फ़ोन जाँच के लिए देने का भी प्रस्ताव दिया है."

फ़रहनाज़ इस्फ़हानी, पीपीपी सांसद

'जाँच की माँग'

पूर्व प्रधानमंत्री और विपक्षी पार्टी मुस्लिम लीग नवाज़ के प्रमुख नवाज़ शरीफ़ ने फ़ैसलाबाद में एक सभा को संबोधित करते हुए मांग की है कि अगर दो दिनों में सरकार कथित संदेश की जाँच की घोषणा नहीं करती है तो वे स्वयं सुप्रीम कोर्ट जाकर जाँच के लिए अर्ज़ी देंगे.

कथित संदेश को लेकर स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में बहुत कुछ लिखा जा चुका है और संदेश भेजने वाले पाकिस्तानी मूल के अमरीकी नागरिक मंसूर ऐजाज़ के बयान भी आ रहे हैं, जिनकी वजह से विवाद और बढ़ रहा है और उससे कई सवाल उठ रहे हैं.

अभी तक यह तय होना बाक़ी है कि यह कथित संदेश हुसैन हक़्क़ानी के कहने पर लिखा गया या उनके प्रतिद्वंद्वियों ने उन्हें फँसाने के लिए यह किया है.

कुछ दिन पहले मुस्लिम लीग नवाज़ के सांसदों ने इस संदेश को पाकिस्तान के ख़िलाफ़ साज़िश क़रार देते हुए हुसैन हक़्क़ानी और राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी के ख़िलाफ़ विद्रोह का मुक़दमा दर्ज करने की माँग की थी.

लेकिन सोमवार को संसद के सत्र में मुस्लिम लीग नवाज़ के किसी भी सांसद ने इस मुद्दे पर एक शब्द भी नहीं बोला. विपक्ष के नेता चौधरी निसार अली ख़ान भी इस पर बात करने से सावधान रहे.

'मेमो से उठते कई सवाल'

कथित संदेश का आकलन करें तो बहुत से सवाल उभरते हैं. उदाहरण के तौर पर दो मई को ऐबटाबाद में अमरीकी सैनिकों की कार्रवाई में ओसामा बिन लादेन की मौत के बाद तो पाकिस्तानी सेना की काफ़ी आलोचना हो रही थी और उसका मनोबल कम हो रहा था और उसके लिए अपना बचाव भी करना मुश्किल था.

क्या ऐसे में सेना सत्ता पर क़ब्ज़ा करने का सोच सकती थी या कोई योजना बना सकती थी?

उन दिनों संसद और टीवी प्रोग्रामों में सबसे ज़्यादा सेना की आलोचना करने में मुस्लिम लीग नवाज़ के दोस्त आगे थे और पीपुल्स पार्टी वाले आईएसआई सहित सेना का हर मंच पर बचाव करते थे. ऐसे माहौल में सरकार को कैसे डर महसूस हो सकता था कि सेना तख़्ता पलट करने वाली है और उन्हें ऐडमिरल माइक मलेन से गुप्त रूप से मदद माँगनी चाहिए?

ओसाना कम्पाऊँड

दो मई 2011 को अमरीकी सैनिकों ने ऐबटाबाद में कार्रवाई कर ओसामा को मार दिया था.

अगर यह मान भी लें कि वह कथित संदेश अमरीकी सैन्य अधिकारी एडमिरल माइक मलेन को इमरजेंसी में भेजा गया तो माइक मलेन के प्रवक्ता के मुताबिक़ उन्होंने उस संदिग्ध संदेश को महत्व नहीं दिया. क्यों?

अमरीका और पाकिस्तान के बीच ‘हॉट लाइन’ पर संपर्क बहाल है और वहाँ पर उसका ज़िक्र या पुष्टि क्यों नहीं हुई? मंसूर ऐजाज़ ख़ुद यह कथित संदेश सामने लाने पर मजबूर क्यों हुए? इसकी जानकारी एक विशेष मीडिया समूह में क्यों हुई?

अगर यह सही है कि सेना सरकार का तख़्ता पलट करने वाली थी तो क्या उस बात की भी जाँच होनी चाहिए कि ऐसा था भी या नहीं?

'ओसामा को किसने शरण दी?'

जब ऐबटाबाद की घटना हुई तब सबने यह सवाल ज़रूर उठाया कि अमरीका ने पाकिस्तानी संप्रभुता का उल्लंघन क्यों किया? लेकिन यह सवाल क्यों दफ़न हो गए कि दुनिया का सबसे बड़ा आतंकवादी पाकिस्तान में कैसे आया? किसने उनको शरण दी? और किसने उनको चिकित्सा की सुविधाएँ प्रदान कीं?

मीडिया में मंसूर ऐजाज़ के जो बयान सामने आ रहे हैं उसमें भी काफ़ी विरोधाभास है. सबसे पहले उनका बयान आया कि राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी के कहने पर हुसैन हक़्क़ानी की मंज़ूरी से उन्होंने यह कथित संदेश माइक मलेन को भेजा. लेकिन बाद में उनकी ओर से बयान सामने आया कि कथित संदेश हुसैन हक़्क़ानी ने नहीं लिखा था बल्कि उनकी टेलीफ़ोन पर हुई बातचीत के बाद मंसूर ऐजाज़ से ख़ुद लिखा था.

अब जो ताज़ा बयान सामने आ रहा है उसके मुताबिक़ मंसूर ऐजाज़ कहते हैं कि उस कथित संदेश के बारे में राष्ट्रपति आसिफ़ अली ज़रदारी को पता नहीं है. ऐसे में यह सवाल उठता है कि मंसूर ऐजाज़ के किस बयान पर विश्वास किया जाए?

बेहतर यही होगा कि सरकार और विपक्ष संयुक्त रुप से यह तय करें कि इस मुद्दे की जाँच किससे करानी चाहिए और असल तथ्यों तक कैसे पहुँचा जाए? उस विवाद का लाभ लेने वाले कौन हैं और यह सेना के ख़िलाफ़ के साज़िश है, हुसैन हक़्क़ानी या लोकतंत्र के ख़िलाफ़ और जो भी इसके ज़िम्मेदार हैं उनको सज़ा मिलनी चाहिए.

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