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बुधवार, 12 नवंबर, 2008 को 16:45 GMT तक के समाचार

ब्रजेश उपाध्याय
बीबीसी संवाददाता, वाशिंगटन

बराक ओबामा पर उम्मीदों का बोझ

इश्क मुहब्बत की बातें हुईं, चांद तारे तोड़ लाने के वादे किए गए और अमरीका ने अपना हाथ थमा दिया एक ऐसे इंसान के हाथों में जो उनकी ज़िदगी में एक हवा के झोंके की तेज़ी से आया है.

नाम भी कुछ अजीब सा, बराक हुसैन ओबामा, सुनने में अमरीकी कम, अफ़्रीकी ज़्यादा. चमड़ी का रंग काला लेकिन सपनों के रंग मानो इंद्रधनुष से चुराए हुए हों.

और उन रंगों से उन्होंने एक ऐसे अमरीका की तस्वीर दिखाई है लोगों को जिसमें दरारें नहीं है, जहां काले और गोरे का फ़र्क नहीं है, जहां डेमोक्रैट और रिपबलिकन हाथ में हाथ डालकर सही मायने में एक यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ़ अमेरिका बना सकते हैं.

फ़्रैंकलिन रूज़वेल्ट के बाद कोई राष्ट्रपति नहीं हुआ है जिसे आते ही इतनी बड़ी समस्याओं से जूझना पड़ा हो, बल्कि रूज़वेल्ट के सामने भी केवल अर्थव्यवस्था की मंदी थी, ओबामा को तो इराक़ और अफ़गानिस्तान भी विरासत में मिले हैं. और साथ में है बोझ उन वादों का जो उन्होंने अमरीका से किए हैं, बोझ उन उम्मीदों का जो उन्होंने आम लोगों में जगाए हैं.

उम्मीद

और इसका सही अंदाज़ा मुझे लगा जब मैं चुनाव के नतीजों के तुरंत बाद निकला अमरीका के उन दक्षिणी राज्यों के दौरे पर जहां सालों पहले रंगभेद ने अपना सबसे बदसूरत चेहरा दिखाया था.

नार्थ कैरोलाइना के ग्रीन्सबोरो शहर के छोटे से ट्रेन स्टेशन पर मेरी मुलाक़ात हई 73 साल के रॉबर्ट ब्राउन से जो कभी गोरे और कालों के समान हक की लड़ाई में मार्टिन लूथर किंग के साथ चले थे.

जहां हम खड़े थे कभी उसी ट्रेन स्टेशन पर गोरे और कालों के लिए अलग दरवाज़े होते थे, अलग सीटें होती थीं.

उन दिनों को याद करते हुए रॉबर्ट ब्राउन ने कहा कि बचपन में एक बार उनकी दादी ने उन्हें डांट लगाई थी जब उन्होंने एक गोरे लोगों के लिए बने नलके से पानी पिया था. और फिर उन्होंने उस नलके से पानी पिया जो कालों के लिए था.

कहने लगे, "पानी का स्वाद दोनों ही नलकों में एक सा ही था और मुझे बहुत समय लगा था ये समझने में कि दादी ने मुझे डांटा क्यों.''

नया अमरीका

उनका कहना है कि आज जब वो बराक ओबामा को देख रहे हैं तो कभी लगता है जैसे अमरीका उस वक्त को बहुत पीछे छोड़ आया हो.

उसी राज्य के शारलट शहर में एक नाई की दुकान है नो ग्रीज़. वहां काम करनेवाले सभी अफ़्रीकी अमरीकी ही हैं और बाल कटवाने वाले भी ज़्यादातर काले ही हैं. रिसेप्शन पर बैठती हैं टारा मैक्घी. जब मैं वहां पहुंचा तो नतीजों को आए हुए बस डेढ़ दिन हुए थे. टारा मैक्घी का कहना था कि उन्हें तो अभी से ही बदलाव नज़र आने लगा है.

कहती हैं," लोग, खासकर गोरे लोग, जिस तरह से गुड मार्निंग कहते थे उसका भी अंदाज़ बदल गया है.''

मैंने कहा कि कहीं आप कुछ ज़्यादा ही बारीकी से तो नहीं इस बदलाव को परख रही हैं.

कहने लगीं, " ये आप नहीं समझ सकेंगे, आज के अमरीका में ये भेदभाव इतनी महीनी से होता है कि बस हम ही समझ पाते हैं और इसलिए एक छोटा सा फर्क़ भी हमें ही नज़र आता है.''

नॉर्थ कैरोलाइना, साउथ कैरोलाइना, जॉर्जिया, टेनेसी, अलाबामा ये वो इलाक़े हैं जहां इतिहास अभी भी पुरबाई के झोंके की तरह हड्डी के पुराने दर्दों को जगाता रहता है.

एक छोटे से शहर मूर्सविल में मुझे नज़र आया एक कॉफ़ी हाउस, नाम है पैट्स कैफ़े...अंदर पूरा नाम लिखा हुआ है पैट्रियट्स कैफ़े और दीवारों पर चारों तरफ़ लगी हुई हैं वर्ल्ड वार टू, वियतनाम, गल्फ़ वार और इराक़ में मारे गए अमरीकियों की तस्वीरें, लटकी हुई हैं उनकी वर्दियां और नीचे एक बोर्ड है शिकायतों के लिए भी लेकिन साथ में है एक ग्रेनेड रखा हुआ...यानि शिकायत की तो जान से गए..

यक़ीन की कमी

 अभी भी भारत में कोई ब्राह्मण है तो कोई और जाति का है उसपर झगड़ा होता है. महाराष्ट्र में उत्तर भारत के लोगों के साथ राज ठाकरे के लोग जो कर रहे हैं वो शर्मनाक है
 
कुंवर नील कुमार, भारतीय

यहां ज़्यादातर गोरे रिटायर्ड फौजी ही आते हैं. और उनमें से ओबामा पर शायद ही किसी को यकीन है. एक रिटायर्ड मरीन फ़ौजी डॉन ह्यूम ने तो यहां तक कहा कि इस देश के लिए सबसे बड़ा ख़तरा वो ओबामा को मानते हैं.

बहुतों को अभी भी ये लगता है कि वो मुसलमान हैं और उतना काफ़ी है उनपर भरोसा नहीं करने के लिए.

लेकिन इसी भीड़ में 30 साल के डेल बीटी भी हैं. इराक़ में एक लैंडमाइन धमाके में उन्होंने अपने दोनों पांव खो दिए. यकीन उन्हें भी नहीं है ओबामा पर लेकिन उम्मीद ज़रूर है.

कहते हैं," उम्मीद के दम पर ही अपने दोनों पांव खो देने के बावजूद मैं ज़िंदा रह पाया इराक़ में. मैं चाहूंगा कि ओबामा कामयाब हों.''

जॉर्जिया के अटलांटा शहर के पास एक रेस्तरॉं है जॉर्जिया डाइनर जहां घुसते ही नज़र पड़ती है जिमी कार्टर के साथ एक सिख दंपत्ति की तस्वीर पर. वो रेस्तरॉं के आधे पार्टनर हैं और दूसरे पार्टनर हैं कुंवर नील कुमार जो मूलत: हिमाचल प्रदेश से हैं.

उनका कहना था कि काले और गोरे के बीच भेदभाव की कभी कभी झलक तो मिलती है लेकिन इससे कहीं ज़्यादा भेदभाव तो वो भारत में देखते हैं.

उनका कहना है, "अब भी भारत में कोई ब्राह्मण है तो कोई और जाति का है उसपर झगड़ा होता है. महाराष्ट्र में उत्तर भारत के लोगों के साथ राज ठाकरे के लोग जो कर रहे हैं वो शर्मनाक है.''

उनकी उम्मीदें ओबामा से हैं कि वो पिछले आठ सालों में जो धब्बे लगे हैं अमरीका की तस्वीर पर उसे मिटा सकें.

कुंवर नील कुमार की बातों ने मानो अचानक से भारत की राजनीति की तरफ़ पहुंचा दिया मुझे. सोचने लगा बाबा साहब अंबेडकर के अलावा क्यों अभी तक वहां के दलित आंदोलन में कोई बराक ओबामा नहीं पैदा हो पाया है. दलित नेता तो बहुत सारे हैं लेकिन अभी तक कोई ऐसा क्यों नहीं दिखा जो पूरे देश की उम्मीदों को एक साथ संजो सके..

इन्हीं ख़यालों में डूबा हुआ था जब मेरी बस पहुंची अलाबामा के बरमिंघम शहर में. चालीस पैंतालीस साल पहले इस शहर को बॉंमबिंघम कहा जाने लगा था क्योंकि यहां काले लोगों को डराने धमकाने के लिए गोरे चरमपंथी जिन्हें कू क्लक्स क्लैन के नाम से जाना जाता था अक्सर चर्चों पर या काले इलाकों में बम धमाके किया करते थे.

कैरोलाइन मैकिंस्ट्री तब चौदह साल की थीं जब एक चर्च पर ऐसा ही बम हमला हुआ था और वो चर्च के अंदर थीं. उनकी चार सहेलियां उसमें मारी गई थीं. आज वो गोरे और कालों को साथ लाने के लिए काम करती हैं.

मुमकिन नहीं
अफ़्रीकी अमरीकी ओबामा को एक जादूगर की तरह देखने लगें हैं

उन्होने मुझे बताया कि उन्हें वैसे तो पूरी उम्मीद है कि ओबामा गोरे और काले अमरीका को एक कर पाएंगे लेकिन केवल अगले चार सालों में ये हो जाएगा ये मुमकिन नहीं दिखता.

इस उम्मीद भरे माहौल में बहुत लोगों को इस बात का भी डर है कि कई अफ़्रीकी अमरीकी ओबामा को एक जादूगर की तरह देखने लगें जो एक जादू की छड़ी घुमाएगा और उनकी सारी परेशानियां दूर कर देगा.

नॉर्थ कैरोलाइना के ड्यूक यूनिवर्सिटी में पोलिटिकल साइंस के प्रोफ़ेसर कैरी हेइनी का कहना है कि काले समुदाय को ये समझना होगा कि केवल एक व्यक्ति सबकुछ नहीं बदल सकता, उन्हें अपनी उम्मीदों पर थोड़ा लगाम तो कसना ही होगा.

शारलट की नाइ की दुकान में काम करनेवाली टारा मैक्घी का कहना है कि ये सोच ग़लत होगी कि बराक ओबामा का हाथ पकड़कर कामयाबी हासिल कर ली जाए.

कहती हैं, "ये मौक़ा ऐतिहासिक है, लेकिन अपनी बेहतरी की ज़िम्मेदारी हमारी अपनी है. अपने फ़ैसले हमें खुद करने होंगे लेकिन उनकी (ओबामा की) मदद की ज़रूरत तो होगी.

दो महीने के बाद बराक ओबामा यहाँ वॉशिंगटन में अपने हाथों को भूरे रंग की बाइबल पर रखकर व्हाइट हाउस में प्रवेश करेंगे और उनके सर पर होगा इन उम्मीदों का बोझ.

पिछले हफ़्ते राष्ट्रपति बुश ने जब बराक ओबामा को मुबारकबाद देने के लिए फ़ोन किया तो कहा कि अब आप अपनी ज़िदगी के सबसे बड़े सफ़र पर जानेवाले हैं.

राष्ट्रपति ओबामा की मुश्किल ये है कि रास्ता बहुत दुर्गम है और उनके पास तैयारी करने का भी वक़्त नहीं है.