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क्या नींद से हमें ऊर्जा मिलती है!
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हमें नींद की ज़रूरत क्यों पड़ती है. यह सवाल किया है गोराडीह, भागलपुर बिहार से हेमन्त कुमार ने.
ये ऐसा सवाल है जो सदियों से वैज्ञानिकों को परेशान करता आया है लेकिन इसका जवाब किसी के पास नहीं. कुछ लोगों का मानना है कि सोने से हमारे शरीर को दिन भर की थकान दूर करने और तरोताज़ा होने का अवसर मिलता है. लेकिन सच ये है कि सोने से ऊर्जा की बहुत मामूली सी बचत होती है. इसलिए इसे समझने का एक तरीक़ा ये हो सकता है कि हम न सोने के प्रभावों का आकलन करें. इसका असर अगले दिन साफ़ दिखाई देता है. हम चिड़चिड़े और भुलक्कड़ हो जाते हैं और हमारी आवाज़ भारी हो जाती है. एक रात की नींद न मिलने से ध्यान एकाग्र करने की हमारी शक्ति प्रभावित होती है. इसलिए यह कहना सही होगा कि न सोने से हमारे मस्तिष्क के काम करने की क्षमता पर बुरा असर पड़ता है. न सोने से हमारी समझने की प्रक्रिया ही प्रभावित नहीं होती बल्कि इसका शारीरिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है. इससे तनाव, रक्तचाप और मोटापा बढ़ता है. ग्राम बभनगामा, मधेपुरा बिहार से चन्द्रशेखर कुमार झा यह जानना चाहते हैं कि यज्ञोपवीत के तीन धागों और छह धागों का क्या तात्पर्य है. हिंदू धर्म में यज्ञोपवीत का अपना एक अलग महत्व है. यज्ञोपवीत को उपनयन संस्कार भी कहा जाता है. जिसमें उप का अर्थ होता है निकट और नयन का अर्थ होता है ले जाना. प्राचीन भारत में जब बालक आठ साल का हो जाता था तो अध्ययन और ज्ञानार्जन के लिए उसे पाठशाला या गुरू के पास ले जाने के समय किए गए संस्कार को यज्ञोपवीत कहा जाता. प्राचीन भारतीय परंपरा में जन्म के बाद नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह, मृत्यु आदि समय-समय पर भिन्न भिन्न संस्कारों का विधान बताया गया है. जीवन में नैतिक दायित्वों के सकुशल निर्वाह के लिए विद्यार्जन को बहुत अहम् माना गया है. यज्ञोपवीत संस्कार में बालक को ज्ञान की महत्ता और उसकी प्राप्ति के उपायों के लिए प्रेरणा देते हुए उसे यह दायित्व दिया जाता है. कि जीवन को नैतिकता और सदाचार के साथ कैसे जिया जाय. इसमें उसे जो उपवीत या जनेऊ पहनाया जाता है. उसमें तीन धागे होते हैं और एक गाँठ होती है और तीनों धागे तीन अलग-अलग दायित्वों के प्रतीक होते हैं. एक ब्रह्म ऋण का, दूसरा पितृ ऋण और तीसरा गुरु ऋण का प्रतीक होता है. इन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश का प्रतीक भी माना गया है. इसकी गाँठ आध्यात्मिकता की प्रतीक स्वरूप ब्रह्म-ग्रंथि होती है और क्योंकि आम तौर पर जनेऊ पुरूष पहनते है. इसलिए विवाह के बाद अपनी पत्नी की ओर से पति को छह धागों वाले जनेऊ पहनने का प्रावधान है. इलाहबाद उत्तर प्रदेश से आलोक यादव ने सवाल भेजा है. वो लिखते हैं कि मुझे लाफ़िंग बुद्धा के बारे में बताइए. लोग इसे क्यों अपने पास रखना पसंद करते हैं. चीन में बुदई और जापान में होतेइ के नाम से जाने जाने वाले इस लाफ़िंग बुद्धा को, बौद्ध, ताओवादी और शिन्तो संस्कृतियों का एक महत्वपूर्ण अंग माना जाता है. कोई एक हज़ार साल पहले चीन में एक चान भिक्षु हुए हैं जिन्हें संतोष और समृद्धि का देवता माना जाता है. इन्हें लाफ़िंग बुद्धा इसलिए कहते हैं क्योंकि ये हमेशा हंसते हुए दिखाए जाते हैं. ये गंजे हैं, इनकी बड़ी सी तोंद है और इनके पास एक बोरा रखा रहता है जिसमें बहुत सी बहुमूल्य चीज़ें भरी रहती हैं और ये कभी ख़ाली नहीं होता. इनके परोपकारी स्वभाव के कारण ही इन्हें बोधिसत्व का अवतार माना जाता है जो मैत्रेय या भावी बुद्ध होंगे. बांगलादेश का राष्ट्रीय गान क्या है. धनौजा, मधुबंज बिहार से ऋषिकेश कुमार. बांगलादेश का राष्ट्रगान है आमार शोनार बांगला आमि तोमाए भालोभाशी. इसे रवींद्रनाथ ठाकुर ने 1906 में लिखा और इसकी धुन भी बनाई. कहते हैं कि रवींद्र बाबू ने इसकी धुन बाउल गायक गगन हरकारा के गीत कोथाए पाबो तारे से प्रेरित होकर बनाई थी. इसकी पहली दस पंक्तियों को 1972 में बांगलादेश के राष्ट्रगान के रूप में ग्रहण किया गया. बिजनौर उत्तर प्रदेश से सलमान पूछते हैं कि धारा 356 क्या है. भारतीय संविधान की धारा 356 के अधीन भारत की केंद्र सरकार को, किसी भी राज्य की सरकार को भंग करने का अधिकार है, बशर्ते कि राज्य में सांविधानिक तंत्र विफल हो गया हो. राज्यपाल भी विधानसभा को भंग कर सकते हैं अगर किसी को स्पष्ट बहुमत न मिला हो. ऐसी स्थिति में राज्यपाल विधान सभा को भंग करके उसे छह महीने के लिए निलंबित अवस्था में रखते हैं. उसके बाद भी अगर स्पष्ट बहुमत न जुट पाए तो फिर चुनाव कराए जाते हैं. इसे राष्ट्रपति शासन भी कहा जाता है, क्योंकि मुख्यमंत्र की जगह भारत के राष्ट्रपति शासन संभालते हैं और प्रशासनिक सत्ता राज्यपाल के हाथों में होती है. धारा 356 के आलोचकों का तर्क है कि केंद्र सरकार राज्यों में राजनीतिक प्रतिपक्षियों की सरकारों को भंग करने के लिए इसका दुरुपयोग करती है. |
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