|
चीनी वर्चस्व की चिंता सता रही है
|
|||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
कीनिया के भारतीय व्यापारियों से बात करें तो आपको उनके स्वर में चिंता साफ़ नज़र आएगी. उनकी चिंता अफ़्रीका में चीन की बढ़ते
असर के बारे में है.
उनका कहना है कि भारत सरकार की अफ़्रीका के प्रति कथित ढुलमुल नीति से चीन को अफ़्रीका में अपना असर बढाने का मौका मिल रहा है. एक व्यापारी ने बताया कि जितनी भी सडकें कीनिया में बन रही हैं, ज़्यादातर सड़कें चीन के लोग बना रहे हैं, वो सस्ते मज़दूर चीन से लेकर आ रहे हैं. एक दूसरे व्यापारी ने कहा कि अफ़्रीका के देशों के लिए चीन से व्यापार करना और मदद लेना आसान है क्योंकि अमरीका और अन्य पश्चिमी देशों के साथ व्यापार करने में कई शर्तों का पालन करना पड़ता है, जबकि चीन के साथ ऐसा नहीं है. योगेश डावड़ा कुसूमू के रहने वाले हैं. कुसूमू कीनिया का वो शहर है जहां पिछले दिसंबर को चुनाव के बाद भड़की हिंसा में भारतीय व्यापारियों को भारी क्षति उठानी पड़ी थी. योगेश भारत की अफ़्रीका के प्रति नीति से बेहद क्षुब्ध हैं, उनका केमिकल्स का व्यापार है. वे कहते हैं कि उनके जैसे कई व्यापारी भी अब चीन से सामान मंगवाना ज़्यादा पसंद करते हैं. उनका कहना है कि कीनिया में ही नहीं, "तंज़ानिया और युगांडा में भी ,जहाँ मैं आता-जाता रहता हूँ, वहाँ चीन का दखल बढ़ रहा है. अब ज़्यादातर लोग चीन से कच्चा सामान मंगवाना ज़्यादा पसंद करते हैं और युगांडा जैसे देशों मे चीन के लोगों को काम का परमिट लेना बेहद आसान हो गया है. चीन के लोग कीनिया में सस्ते घर बना रहे हैं". अफ़्रीका और चीन के व्यापार में तेज़ी से बढ़ोत्तरी हुई है. ऐसा नहीं है कि भारत अफ्रीका में चीन के बढते असर को देखते हुए खुद इस दिशा में कोशिश नहीं कर रहा. भारत की कोशिश इसी वर्ष अप्रैल में भारत में अफ़्रीका समिट का आयोजन किया गया जहां अफ्रीका को दिए जाने वाले कर्ज़ को बढाए जाने के अलावा अन्य तरह के मदद देने की घोषणाएं की गईं, लेकिन सवाल है कि क्या इतना काफ़ी है?
कीनिया में एशियाई मूल के सांसद शकील शब्बीर अहमद का कहना है कीनिया सहित अफ़्रीका की अन्य सरकारों की कोशिश है कि उन्हें ज्यादा से ज्यादा मदद मिल पाए, चाहे वो चीन से हो या भारत से. वे कहते हैं कि एक तरफ़ जहाँ चीन की सरकार अफ़्रीका में बड़ी तेज़ी से आ रही है, भारत से लोग एक-एक कर आ रहे हैं. भारत से व्यापारी व्यक्तिगत स्तर पर अफ़्रीका में व्यापार करने आ रहे हैं और वो जल्द से जल्द पैसा बनाना चाहते हैं, जबकि चीन की निगाहें भविष्य में लाभ कमाने पर टिकी हैं. तो आखिर अफ़्रीका के देश चीन और भारत को तुलनात्मक तौर पर कैसे देखते हैं, मैंने यही सवाल रखा कीनिया के उपराष्ट्रपति कालोंज़ो मुसयोका के सामने, लेकिन इस बारे में उन्होंने ज़्यादा कुछ कहने से परहेज़ किया, "दोनों ही देशों ने अफ़्रीका को ध्यान में रखकर आयोजन किए हैं, दोनों ही देशों ने आर्थिक तरक्की की है और ऐसा लगता है कि उनका कहना है कि सबको अफ़्रीका में गरीबी से मुकाबला करना है और ये अच्छी बात है". तुलना कीनिया में भारतीय उच्चायुक्त पीएस रंधावा का कहना है कि भारत और चीन के काम करने के तरीके में फ़र्क है. उनका कहना है कि चीन में केंद्रीय प्रणाली है जिससे फैसले लेने में ज्यादा वक्त नहीं लगता जबकि भारत में ऐसा नहीं है. वे कहते हैं, "हो सकता है कि हम अफ़्रीका से कच्चा माल खरीदने में कमज़ोर हों, या हम अफ्रीका में मौकों का पूरा फ़ायदा उठाने में हम उतने कामयाब नहीं हो, लेकिन हमारी कंपनियों के काम करने में कोई कमी नहीं है".
अप्रैल में आयोजित अफ़्रीका शिखर सम्मेलन में भारत ने अफ्रीका को दिए जाने वाले कर्ज़ को बढ़ाकर 5.4 अरब डॉलर कर दिया. जानकारों का कहना है कि भारत धन देने के मामले में शायद चीन की बराबरी न कर पाए लेकिन वो अफ़्रीका को खेती, सूचना प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग, शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में भी मदद कर सकता है. भारत का मानना है अफ्रीकी देशों के बीच सहयोग से आपसी समन्वय बढ़ेगा और उसे भी अपने सामान बेचने के लिए अफ़्रीका जैस बड़ा बाज़ार मिल जाएगा लेकिन हर क्षेत्र में भारत की टक्कर चीन से है. नैरोबी विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर पूर्णा सामंत का कहना है कि "चीन के बढते कदमों को अफ़्रीका में शक की निगाह से भी देखा जा रहा है. पिछले कुछ दिनों में अख़बारों मे कई लेख पढ़े हैं जिनमें लोगों ने चीन के अफ़्रीका आने पर शक का इज़हार किया गया है". कीनिया के भारतीय व्यापारियों का भी मानना है कि भारत अफ़्रीका से अपने पुराने संबंधों के भरोसे आगे नहीं बढ़ सकता, अगर वो यहां अपना प्रभाव बढ़ाना चाहता है तो उसे अफ़्रीका की तरफ़ ख़ास ध्यान देने की ज़रूरत है. |
इससे जुड़ी ख़बरें
एक भारत कीनिया में भी...09 जून, 2008 | पहला पन्ना
इतिहास रचते बराक ओबामा 04 जून, 2008 | पहला पन्ना
'ज़िम्बाब्वे में ख़तरनाक संकट है'20 अप्रैल, 2008 | पहला पन्ना
कीनिया सरकार और विपक्ष में सहमति28 फ़रवरी, 2008 | पहला पन्ना
'कीनिया में भारतीय सुरक्षित हैं'02 जनवरी, 2008 | पहला पन्ना
शहर की सफाई के लिए गधों को लंगोट19 जुलाई, 2007 | पहला पन्ना
|
|||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
|
||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||