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व्यापार बढ़ा लेकिन क़दम छोटे-छोटे
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भारत और दक्षिण अफ़्रीका के बीच भारत की आज़ादी के पहले से व्यापार संबंध थे पर यहां की सरकार की रंगभेद नीति के कारण भारत ने
1948 में दक्षिण अफ़्रीका से सभी रिश्ते तोड़ दिए थे.
यहां लोकतांत्रिक सरकार की स्थापना के साथ ही 1994 में रिश्ते फिर गर्माए और फिर क्या था, छोटे-बड़े व्यापारी यहां आने लगे. जैसै जोहान्सबर्ग के फोर्ड्सबर्ग के मोहम्मद ज़ुबैर. वे कहते हैं, "मै 2004 में गुजरात से आया. मै यहां चिकन टिक्का बेचता हूँ और मेरी एक नकली गहनों की भी दुकान भी है. कमाई अच्छी है." और टाटा समूह, रैनबैक्सी, महिंद्रा जैसी बड़ी कंपनियों ने भी यहां क़दम रखा. दोनों देशों के बीच व्यापार 180 करोड़ अमरीकी डॉलर से वर्ष 2001-02 में शुरु हुआ जो 2006-07 में 470 करोड़ अमरीकी डॉलर तक पहुंच गया. सोना, हीरे जवाहरात एल्युमिनियम, जैविक रसायन भारत भारत यहाँ से ख़रीदता है तो इस्पात, लोहे, मशीन, गाड़ियां और दवाइयां जैसी चीज़ें दक्षिण अफ़्रीका को बेचता है. धीरे-धीरे बदलाव दक्षिण अफ़्रीका ने भारत में अपने ब्रांड को बेचने के लिए अंतरराष्ट्रीय मार्केटिंग काउंसिल का दफ़्तर खोला है.
भारत में इसके प्रतिनिधि गोविन रेड्डी कहते है, "शुरू में भारतीय व्यापारियों ने पारंपरिक उद्योगो में धन लगाया. फिर उन्होंने नए धंधों में हाथ डाला. आज आप जोहान्सबर्ग में भारत से आयातित पॉंम्फ़्रेट और झींगा मछली खा सकते है. यानी बदलाव धीरे-धीरे आ रहा है" और आप इस बदलाव को टाटा समूह के व्यापार से आँक सकते है. टाटा यहाँ फ़ेरोक्रोम प्लांट चलाता है, बसें बनाता हैं, गाड़ियों का उत्पादन करना चाहता है और अब टेलीकॉम क्षेत्र में नियोटेल के ज़रिए भी दाख़िल हो गया है. नियोटेल के प्रबंध निदेशक अजय पांडे कहते है कि मुश्किल ज़्यादा नहीं है पर प्रशिक्षित लोगों की कमी ज़रुर है. पांडे बताते हैं, "यहां वैसे कोई दिक़्क़त नहीं है पर प्रशिक्षित लोगों की बहुत कमी है. दक्षिण अफ़्रीका के रंगभेद के इतिहास ने शिक्षा पर असर डाला और लोग प्रशिक्षित नहीं हुए. हमें पहले लोगों को तैयार करना पड़ता है और कई बार बाहर से भी लोग लाने पड़ते हैं. भ्रष्टाचार ज़्यादा नहीं भ्रष्टाचार की समस्या उतनी नहीं है. जहां तक काम में आसानी का सवाल है, भारत से यहाँ आसान है व्यापार करना.
आप नीति निर्धारकों से फ़ोन उठा कर बात कर सकते हैं जो भारत में नहीं हो पाता. पर यहां अपराध एक बड़ी समस्या है. केजीके डायमंड ने यहाँ 400 करोड़ का निवेश किया है. कंपनी डी बीयर्स की साइट होल्डर है और कंपनी के वित्त निदेशक सुनील अग्रवाल कहते हैं कि उनके लिए सुरक्षा का मसला सबसे अहम है. उनकी ईमारत को उन्होंने जेल से भी ज़्यादा सुरक्षा घेरा दे रखा है. साथ ही हीरा के खदानों के केवल दोहन की प्रथा भी कंपनी तोड़ने की कोशिश कर रही है. अग्रवाल कहते हैं, "हम यहां कटिंग, पॉलिशिंग सब करते है. हमारा मानना है कि आप तभी मुनाफ़ा कमा सकते हैं जब आप समाज को कुछ दें." वे बताते हैं, "हमने कई लोगों को हीरे तराशने जैसे काम सिखाए हैं. हमारे यहां कुछ काली अफ़्रीकी महिलाएँ पहले झाड़ू लगाती थीं लेकिन आज क्वालिटी कंट्रोल मैनेजर बन गई हैं." चीनी कंपनियाँ भी भारत ही नहीं, चीन के उघोग भी यहां तेज़ी से जगह बना रहे हैं. सोफिया लियु, हुआ वे टेक्नोलॉजी की ब्रांड मैनेजर हैं.
लियु का मानना है कि व्यापार के लिए यहां के समाज को समझना ज़रूरी है. यहां ग़रीब-अमीर का फ़ासला बहुत गहरा है और आप को तय करना होता है कि आप का ध्येय क्या है. वे कहती हैं, "मुझे लगता है कि दक्षिण अफ़्रीका सरकार भारत और चीन के साथ व्यापार में बहुत फूँक-फूँक के क़दम रख रही है. ख़ास तौर पर ऐसे माहौल में, जब विदेशियों पर हमले हुए हैं. सरकार ऐसे निवेश का स्वागत कर रही है जो 2010 के विश्व कप फुटबाल तक देश की प्रगति में मददगार हो और आम आदमी को नाराज़ भी न करे." भारत और दक्षिण अफ़्रीका के व्यापार का अध्ययन कर रहे अर्थशास्त्री स्टीफन गेल्ब कहते हैं कि व्यापार के लिए समय सही है. उनका कहना है, "दक्षिण अफ़्रीका की तीस-चालीस कंपनियों ने भारत में निवेश किया है. लेकिन भारत भी इन कंपनियों के लिए नया है, इसलिए छोटे-छोटे कदम उठाए जा रहे है." फिर बॉलीवुड का टशन, पर्यटन की रेस और क्रिकेट का जुनून भी तो है दोनों देशों की आपसी समझ बढ़ाने के लिए. |
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