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नाइजीरिया की दोस्ती की चाहत!
 

 
 
नाइजीरिया
नाइजीरिया को अफ्रीका महाद्वीप का उगता सितारा कहा जाता है
आ जाओ मैंने धूल से माथा उठा लिया
आ जाओ मैने छील दी आखों से गम की छाल
आ जाओ मैंने दर्द से बाजू छुड़ा लिया
आ जाओ अफ्रीका

मशहूर शायर फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने 1955 में जब अफ्रीकी देशों मे राष्ट्रवादी चिंगारी की पहली सुगबुगहाट पर ये कविता लिखी थी तो शायद दुनिया को भी अंदाज़ा न था कि ये महाद्वीप जिसके साथ धरती धड़कती है, दरिया और जंगल थिरकते है, उसकी ताल पर एक दिन दुनिया भी थिरकेगी.

नाइजीरिया को इस महाद्वीप का उगता सितारा कहा जाता है, इसके बावजूद कि वह दुनिया के सबसे ग़रीब देशों की सूची में आता है.

चौदह करोड़ की आबादीवाले इस महाद्वीप के सबसे बड़े देश और अफ्रीका में सबसे ज्यादा तेल के मालिक से आख़िर कौन दोस्ती नहीं करना चाहेगा.

और बदलते दौर में जब तेल सोना है तो भारत भी पीछे नही है. नाइजीरिया 25 लाख बैरल हर दिन तेल का उत्पादन करता है.

पार्वती वासुदेवन अबुजा स्थित टीकाकार है और उनका मानना है कि वर्ष 2000 से भारत नाइजीरिया संबधों में ज्यादा गर्मी देखने को मिल रही है.

दोनों देशों के बहुत से आर्थिक तकनीकी और सामरिक हित आपस में जुड़े हैं.

नाइजीरिया मे भारत के कार्यवाहक उच्चायुक्त अनिल त्रिगुनायत दोनों देशों के रिश्ते को पिछले कुछ वर्षों का नही बल्कि ऐतिहासिक मानते है और उसे ‘स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप’ की संज्ञा देते है.

वो कहते हैं कि व्यापार के लिहाज से अफ्रीका में नाइजीरिया भारत का सबसे बड़ा सहयोगी है.

पिछले साल दोनों देशो के बीच आठ अरब अमरीकी डालर का कारोबार हुआ था.

ये ज़रूर है कि ऊर्जा के क्षेत्र मे नाइजीरिया बहुत ही महत्वपूर्ण साथी है.

लेकिन ये दोस्ती केवल तेल और ऊर्जा की नहीं है. नाइजीरिया के लिए भारत चौथा सबसे बड़ा ग़ैर तेल सहयोगी भी है.

व्यापारिक रिश्ते

नाइजीरिया में भारत की मौजूदगी ख़ासी है. खास तौर पर दवाइयों के क्षेत्र में, रेलवे, इलेक्ट्रीक मशीनरी, चावल, लोहा, स्टील, प्लास्टिक और रक्षा के क्षेत्र में भी काफ़ी सहयोग रहा है.

अनिल त्रिगुनायत
भारत के कार्यवाहक उच्चायुक्त अनिल त्रिगुनायत कहते हैं कि भारत और नाइजीरिया के लिए सुनहरे दिन हैं

कई भारतीय कंपनियों की मौजूदगी भी आप देख सकते है. इसमें कोई शक नहीं कि व्यापारिक रिश्तों में गर्मी है.

आंकड़े बताते है कि भारत इस देश से जो आयात करता है, उसका 96 प्रतिशत कच्चा तेल होता है.

यहाँ की अर्थव्यवस्था में दिलचस्पी रखने वाले और जाने माने निवेशक पैडी नजोकू हालांकि भारत की भूमिका से खुश नहीं हैं.

 भारतीय नाइजीरिया में उस तरह से निवेश नहीं कर रहे हैं जैसा कि वो दूसरी जगह करते हैं. मैं निराश हूं कि नाइजीरिया भारत की सूची में वहां नहीं जहाँ कई देश हैं. जबकि ये देश बहुत बड़ा बाज़ार है. भारत की मौजूदगी और दिखनी चाहिए
 
पैडी नजोकू, निवेश विशेषज्ञ

वो बिना लाग लपेट के कहते हैं,'' भारतीय नाइजीरिया में उस तरह से निवेश नहीं कर रहे हैं जैसा कि वो दूसरी जगह करते हैं. मैं निराश हूं कि नाइजीरिया भारत की सूची में वहां नहीं जहाँ कई देश हैं. जबकि ये देश बहुत बड़ा बाज़ार है. भारत की मौजूदगी और दिखनी चाहिए.''

अनुमान है कि भारत की ऊर्जा और तेल की ज़रूरत जबर्दस्त तरीके से बढ़ेगी.

आने वाले वर्षों में सबसे ज्यादा ईंधन का उपयोग करने वाले देशों में भारत का स्थान चौथा होगा.

अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार भारत की तेल के आयात पर निर्भरता वर्ष 2020 तक 90 प्रतिशत से ज्यादा हो जाएगी तो जाहिर है उसकी पूर्ति के लिए पश्चिमी एशिया पर केवल निर्भर करना बुद्धिमानी नहीं होगी.

कुछ इसी समझ से काम कर रहे हैं बाकी विकसित और विकासशील देश.

भारत के ठीक सामने है चीन. वो भी अपनी पकड़ तेज बनाने की कोशिश में है.

केवल वर्ष 2006 में चीन ने नाइजीरिया में 2.6 अरब अमरीकी डालर का निवेश किया. और नाइजीरिया की तेल नीति में अपनी पहुँच भी बनाने की कोशिश में है.

तो किसकी चित होगी और किसकी पट. भारतीय राजदूत अनिल त्रिगुनायत भारत चीन की इस तुलना से खुश नहीं है.

उनका मानना है कि दोनों देशों का राजनीतिक आर्थिक ढांचा अलग है.

भारत के साथ सहयोग

ये ज़रूरी है कि तेल और ऊर्जा दोनों देशों को चाहिए लेकिन जहाँ तक नाइजीरिया का सवाल है तो उसके लिए पहले भारत है फिर चीन.

पार्वती वासुदेवन
पार्वती वासुदेवन मानती हैं कि भारत नाइजीरिया के साथ दूरगामी रिश्ते बनाना चाहता है

अब आम नाइजीरियाई के लिए पहले कौन है ये जानना तो मुश्किल है, लेकिन स्थानीय विश्लेषक पैडी नजोकू, चीन की मौजूदगी के लिए भारत को दोषी मानते है.

वो कहते हैं कि चूँकि भारत यहाँ आ नही रहा है तो चीन आ रहा है. आप कुछ नहीं कर सकते. अगर करना है तो आकर चीन के साथ मुक़ाबला कीजिए.

पार्वती वासुदेवन भी मानती हैं कि भारत नाइजीरिया के साथ तेल के लिए दूरगामी रिश्ते बनाना चाहता है तो उसे तेल से इतर भी रिश्ता बनाना पड़ेगा. मसलन सड़क निर्माण में, रिफायनरी में और विद्युत क्षेत्र में ज़रूर निवेश होना चाहिए.

पर सवाल ये है कि आख़िर पूरी दुनिया मे अफ्रीका के लिए इतनी होड़ क्यों मची है.

प्रेक्षक मानते है कि नए तेल के कुओं के मिलने और पूरी दुनिया में तेल की ज़रूरत कल्पना से ज्यादा बढ़ जाने से इस महाद्वीप और नाइजीरिया जैस तेल सम्पन्न देशों के लिए मांग तो बढ़ी है लेकिन साथ ही साथ अस्थिरता भी आई है.

लेकिन अनिल त्रिगुनायत कहते हैं कि भारत और नाइजीरिया के लिए सुनहरे दिन हैं.

उन्हें भरोसा है कि आने वाली सदी अफ्रीका की होगी और उस लिहाज से नाइजीरिया की भूमिका पूरी दुनिया के मंच पर महत्वपूर्ण हो जाएगी.

आने वाली सदी अफ्रीका की होगी. नाइजीरिया यात्रा के बाद तो हम इस दुआ पर आमीन ज़रूर कहना चाहेंगे.

 
 
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