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इच्छामृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला
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अमरीकी सुप्रीम कोर्ट ने ऑरेगन प्रांत के उस क़ानून को सही ठहराया है जिसके तहत मृत्युशैया पर पड़े लोगों को डॉक्टर उनकी सहमति
से मरने में सहायता कर सकते हैं.
सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले को बुश प्रशासन के लिए एक झटका माना जा रहा है क्योंकि अमरीकी राष्ट्रपति ऐसे प्रावधानों के ख़िलाफ़ रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट के जजों ने तीन के मुक़ाबले छह मतों से इस क़ानून को सही ठहराया, इस क़ानून के तहत ऑरेगन में अब तक 208 लोगों की डॉक्टर मरने में मदद कर चुके हैं. सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद संभव है कि दूसरे अमरीकी प्रांत भी इस तरह का क़ानून बनाएँ, यह क़ानून अभी तक सिर्फ़ ऑरेगन प्रांत में लागू है. अमरीकी सुप्रीम कोर्ट के नवनियुक्त मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स इस मामले में अल्पमत में आ गए और वे उन तीन लोगों में शामिल थे जिन्होंने इस क़ानून को ग़लत माना था. धार्मिक आधार पर कई लोग इस क़ानून का सख़्त विरोध कर रहे हैं क्योंकि उनका मानना है कि जीवन देने और लेने का हक़ सिर्फ़ ईश्वर को है. मुक़दमा इस मामले को अदालत के सामने जॉर्ज बुश के निकट सहयोगी पूर्व एटॉर्नी जनरल जॉन एशक्रॉफ्ट ने रखा था और वे चाहते थे कि ऑरेगन प्रांत के क़ानून को अवैध घोषित किया जाए. वर्ष 1997 में ऑरेगन प्रांत में एक जनमत संग्रह के बाद यह क़ानून पारित किया गया था, इस क़ानून के तहत अब तक मौत का विकल्प चुनने वाले ज़्यादातर लोग कैंसर के रोगी रहे हैं. इस क़ानून को काफ़ी कड़े मानदंड के तहत लागू किया जाता है जिसमें मौत को चुनने वाले व्यक्ति को लिखित अर्ज़ी देनी होती है, उसकी मानसिक अवस्था की कम से कम दो डॉक्टर जाँच करते हैं कि यह निर्णय पूरे होशोहवास में लिया गया है. इसके बाद जब एक तय अवधि गुज़र जाने पर भी रोगी जीवन से छुटकारा पाना चाहता है तो डॉक्टर के निर्देश पर व्यक्ति को प्राणघातक दवा दी जाती है लेकिन उसे ख़ुद ही उसका सेवन करना होता है. सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद इच्छामृत्यु के सवाल पर अमरीकी समाज में एक बार फिर बहस तेज़ हो गई है. |
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