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दुनिया आपकी मगर चलाता कौन है? | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लोकतंत्र, आज़ादी, सुधार. इन शब्दों पर ध्यान दें तो पाएंगे कि आजकल किसी भी राजनेता का भाषण इन शब्दों के बिना पूरा नहीं होता. ये ऐसे शब्द हैं जो आपको विश्व से जुड़े होने का अहसास कराते हैं. ये वही शब्द हैं जो युगांडा के एक किसान को कंबोडिया के खेतिहर से और कैलिफोर्निया में बैठे सॉफ्टवेयर डिजाइनर को यूक्रेन के कोयला खनिक से जोड़ देते हैं. लेकिन क्या इन शब्दों के कुछ मायने भी हैं. क्या लोकतंत्र के आज भी वही मायने हैं जो इस शब्द का पहली बार इस्तेमाल करने वाले ग्रीक बुद्धिजीवियों के दिमाग में था. वो मानते थे कि लोकतंत्र का अर्थ कोई भी फैसला करने में हर व्यक्ति की भागीदारी लेकिन आजकल हमारे लिए कुछेक चंद चुने हुए लोग फैसले कर रहे हैं. आज़ादी से अभिप्राय क्या था. किससे आज़ादी. क्या अभिव्यक्ति की आज़ादी भूख से आज़ादी से बड़ी है. सुधार का क्या अर्थ हो सकता है. यूक्रेन के सुधार सऊदी अरब में स्वीकार नहीं हो सकते मतलब सुधार सुंदरता जैसी है जो देखने वाले पर निर्भर करती है. 18 वीं सदी के जाने माने दार्शनिक रुसो ने लिखा था कि मनुष्य पैदा तो स्वतंत्र हुआ था लेकिन वो जहां कहीं भी है बेड़ियों में जकड़ा हुआ है. 1776 में अमरीका के प्रसिद्ध आज़ादी के घोषणापत्र में लिखा गया था " हम इस बात को सत्य मानते हैं कि सभी मनुष्य बराबर हैं और सबको समान अधिकार हैं. जीवन, आज़ादी और खुशियां हासिल करने का हक." कैसी आज़ादी
कितने आज़ाद हैं हम इस दुनिया में. यह कठिन प्रश्न है. कौन हमारी ज़िदगी से जुड़े फैसले करता है. क्या हम अभी भी जंज़ीरों में जकड़े हुए हैं. क्या हम आज़ाद हैं अपने अधिकारों का उपयोग करने के लिए. कुछ देशों में लोग स्वतंत्र है लेकिन सभी देशों पर यह बात लागू नहीं है. वैश्वीकरण और मुक्त व्यापार के इस दौर में आज़ादी भी निर्यात का सामान बन गई है. उसी तरह जैसे कोई कैमरा या टी शर्ट. अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश कहते हैं " अमरीका दुनिया भर में लोकतांत्रिक आंदोलनों और संस्थानों को बढ़ावा देने का काम जारी रखेगा ताकि दुनिया से तानाशाही ख़त्म हो सके. " दूसरे शब्दों में अमरीका अपनी सीमाओं से बाहर भी लोकतंत्र को बढ़ावा देगा लेकिन अपने स्वार्थ के लिए. बुश कहते हैं " हमारी ज़मीन पर आज़ादी को बचाए रखना इस बात पर निर्भर करती है कि दूसरे देशों में आज़ादी कितनी सफल होती है. " लेकिन दुनिया भर में लोगों की ज़रुरतें तकरीबन एक जैसी हैं. सर पर छत, परिवार के लिए रोटी और बच्चों के लिए शिक्षा. अगर उन्हें ये सब मिले तब वो सोचते हैं उस चीज़ के बारे में जिसे हम आज़ादी कहते हैं. लेकिन ज़ाहिर है पूरी आज़ादी कहीं नहीं हो सकती. विकसित लोकतंत्र में क़ानून की बंदिशें होती हैं. तानाशाही में तानाशाह के क़ानून भी तो होते हैं. नयी चेतना और नयी ताक़त
तो फिर चलाता कौन है हमारी दुनिया. सरकारें, कारपोरेशन, शक्तिशाली समूह या ऐसे लोग जो अपने स्वार्थों के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं. या फिर यह विभिन्न स्वार्थों का एक जटिल संजाल है जिसमें कुछ लोगों के बीच ताक़त का बंटवारा रहता है और कुछ इसे पाने के लिए संघर्ष करते हैं. बच जाते हैं आम नागरिक जो इन दोनों के फैसलों के बीच पिसता रहता है. लेकिन क्या संचार के नए माध्यमों के बढ़ने से नयी लोकतांत्रिक शक्ति नहीं आ रही है. मोबाइल फोन, इंटरनेट, वेबलॉग्स क्या हैं ये सब. क्या ये चीज़ें पैसों से अधिक शक्तिशाली होकर उभरी हैं. क्या यूक्रेन और जार्जिया में क्रांति इनके बिना हो सकती थी. राष्ट्रपति बुश के लिए आज़ादी और लोकतंत्र एक साथ चलते हैं लेकिन जाने माने लेखक फरीद ज़कारिया के लिए आज़ादी और लोकतंत्र सिर्फ़ चुनावों तक सीमित नहीं है. अपनी पुस्तक फ्यूचर ऑफ फ्रीडम में ज़कारिया लिखते हैं " पश्चिम के लोगों के लिए लोकतंत्र का अर्थ उदार लोकतंत्र है. ऐसी राजनीतिक प्रणाली जो सिर्फ़ स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों से नहीं बल्कि क़ानून के साथ साथ अभिव्यक्ति, धर्म, संपत्ति की रक्षा से भी जुड़ी है. " लेकिन क्या ऐसा लोकतंत्र आज़ादी सुनिश्चित करता है. शायद तभी चर्चिल ने 1947 में कहा था कि शासन की सबसे बुरी प्रणाली लोकतंत्र है. |
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