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मध्य-पूर्व संघर्ष का इतिहास | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मध्य पूर्व संघर्ष का इतिहास काफ़ी पुराना और पेचीदा, इस संघर्ष ने दुनिया के अनेक देशों के लाखों-करोड़ों लोगों को प्रभावित किया है. यह इस समय दुनिया की सबसे बड़ी राजनीतिक समस्याओं में से एक है और दुनिया भर के करोड़ों मुसलमान से इसे अरबों और मुसलमानों के प्रति अन्याय के जीवंत प्रतीक के रूप में देखते हैं. संगठित और हथियारबंद यहूदियों के हमलों से फ़लस्तीनियों के पाँव उखड़ गए और हज़ारों लोग जान बचाने के लिए लेबनान और मिस्र भाग खड़े हुए. इस तरह 14 मई 1948 को सशस्त्र संघर्ष के बाद पहला यहूदी देश इसराइल अस्तित्व में आया. पीएलओ का गठन 1948 में इसराइल के गठन के बाद से ही अरब देश इसराइल को जवाब देना चाहते थे. जनवरी 1964 में अरब देशों ने फ़लस्तीनी मुक्ति संगठन, पीएलओ की स्थापना की. 1969 में यासिर अराफ़ात ने इस संगठन की बागडोर संभाल ली. इसके पहले अराफ़ात ने फ़तह नामक संगठन बनाया था जो इसराइल के विरुद्ध हमले कर काफी चर्चा में आ चुका था. 1967 का युद्ध इसराइल और इसके पड़ोसियों के बीच बढ़ते तनाव का अंत युद्ध के रूप में हुआ.
यह युद्ध 5 जून से 11 जून 1967 तक चला और एक सप्ताह की लड़ाई के नाम से जाने जाने वाले युद्ध के बाद मध्य पूर्व संघर्ष का स्वरूप बदल गया. इसराइल ने मिस्र को ग़ज़ा से, सीरिया को गोलन पहाड़ियों से और जॉर्डन को पश्चिमी तट और पूर्वी यरुशलम से बाहर धकेल दिया. इसके कारण पाँच लाख और फ़लस्तीनी बेघरबार हो गए. जब कूटनीतिक तरीकों से मिस्र और सीरिया को अपनी ज़मीन वापस नहीं मिली तो 1973 में उन्होंने इसराइल पर चढ़ाई कर दी. अमरीका, सोवियत संघ और संयुक्त राष्ट्र संघ ने संघर्ष को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. शांति समझौता मिस्र के राष्ट्रपति अनवर सादात 19 नवंबर 1977 को यरुशलम पहुँचे और उन्होंने इसराइली संसद में भाषण दिया. सादात इसराइल को मान्यता देने वाले पहले अरब नेता बने. अरब देशों ने मिस्र का बहिष्कार किया लेकिन अलग से इसराइल से संधि की. 1981 में इसराइल के साथ समझौते के कारण इस्लामी चरमपंथियों ने सादात की हत्या कर दी. फ़लस्तीनी इंतिफ़ादा इसराइल के कब्ज़े के विरोध में 1987 में फ़लस्तीनियों ने इंतिफ़ादा यानी जनआंदोलन छेड़ा जो जल्दी ही पूरे क्षेत्र में फैल गया. इसमें नागरिक अवज्ञा, हड़ताल और बहिष्कार शामिल था लेकिन इसका अंत इसराइली सैनिकों पर पत्थर फेंकने से होता था. जवाब में इसराइली सुरक्षाबल गोली चलाते और फ़लस्तीनी इसमें मारे जाते.
खाड़ी युद्ध के बाद मध्य पूर्व में शांति स्थापना के लिए अमरीका की पहल पर 1991 में मैड्रिड में शिखर सम्मेलन का आयोजन हुआ. 1993 में नॉर्वे के शहर ओस्लो में भी शांति के लिए वार्ता आयोजित की गई. इसमें इसराइल की ओर से वहाँ के तत्कालीन प्रधानमंत्री यित्ज़ाक राबिन और फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात ने हिस्सा लिया. इसके बाद तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन की पहल पर व्हाइट हाउस में शांति के घोषणा पत्रों पर हस्ताक्षर हुए. पहली बार इसराइली प्रधानमंत्री राबिन और फ़तस्तीनी नेता अराफ़ात को लोगों ने हाथ मिलाते देखा. फ़लस्तीनी प्राधिकरण 4 मई 1994 को इसराइल और पीएलओ के बीच काहिरा में सहमति हुई कि इसराइल कब्ज़े वाले क्षेत्रों को खाली कर देगा. इसके साथ ही फ़लस्तीनी प्राधिकारण का उदय हुआ लेकिन फ़लस्तीनी इलाक़ों में नाममात्र के प्रशासनिक अधिकारों के अलावा इस प्राधिकरण को कुछ नहीं मिला. गज़ा पट्टी और पश्चिमी तट के क्षेत्रों में फ़लस्तीनी चरमपंथियों के हमले और इसराइल की कड़ी सैनिक कार्रवाई जारी रही. रोडमैप वर्ष 2003 में अमरीका ने इस समस्या को सुलझाने के लिए एक योजना सामने रखी जिसे रोडमैप कहा गया. इस रोडमैप के तहत फ़लस्तीनियों को एक स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा दिया जाना था लेकिन ऐसा नहीं हो सका. वर्ष 2003 में ही इसराइली प्रधानमंत्री अरियल शेरॉन ने गज़ा पट्टी से यहूदी बस्तियाँ हटाने का प्रस्ताव रखा, संसद और मंत्रिमंडल की मंज़ूरी मिलने में लंबे विवादों की वजह से दो वर्ष लगे. अगस्त 2005 में गज़ा से 20 से अधिक यहूदी बस्तियों को हटाया गया. |
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