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 प्रेमचंद की 125वीं वर्षगाँठ
शुक्रवार, 29 जुलाई, 2005 को 21:08 GMT तक के समाचार
 
प्रेमचंद 
 
गोपीचंद नारंग की दृष्टि में जो विरासत प्रेमचंद अपनी रचनाओं के माध्यम से छोड़ गए हैं वही असली विरासत है और इसी के सहारे कई लेखक बड़े हुए हैं.
 
 
 
 
एक कलाकृति 
 
 
नामवर सिंहपहले प्रगतिशील लेखक
नामवर सिंह का कहना है कि प्रेमचंद ने कबीर की परंपरा का विकास किया.
राजेंद्र यादवप्रासंगिकता बनी रहेगी
राजेंद्र यादव कहते हैं प्रेमचंद काफ़ी लंबे समय तक प्रासंगिक रहेंगे
निर्मल वर्मासमय बदल गया है
निर्मल वर्मा मानते हैं समय बदलने के बाद भी प्रेमचंद की परंपरा बची हुई है.
 
 
प्रेमचंद 
 
विश्वनाथ त्रिपाठी कहते हैं कि प्रेमचंद को आज भी इसलिए पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि वह अपने समय के इतिहास का जीवंत विवरण देते हैं.
 
 
प्रेमचंद 
 
लेखक-समीक्षक सुधीश पचौरी मानते हैं कि हिंदी समाज ने प्रेमचंद की परंपरा को आगे बढ़ाने की जगह उनके नाम पर दुकान चलाकर मलाई खाई गई.
 
 
प्रेमचंद 
 
मन्नू भंडारी का कहना है कि लेखक की रचना दृष्टि की प्रासंगिकता पर ध्यान देना चाहिए, इस तरह से प्रेमचंद इस समय भी प्रासंगिक दिखाई देते हैं.
 
मुक्तिबोधदलितों को बाहर से देखा
श्योराज सिंह बेचैन कहते हैं कि प्रेमचंद दलित लेखन के विकल्प नहीं हो सकते
विष्णु खरेअखिल भारतीय दृष्टिकोण
प्रेमचंद के भीतर अखिल भारतीय दृष्टिकोण था. यह कहना है विष्णु खरे का.
महादेवी वर्माप्रेमचंद और महादेवी
कवयित्री महादेवी वर्मा ने लिखा है कि प्रेमचंद को लेकर वे क्या सोचती थीं
 

 
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