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फिर से कड़क हुए मनमोहन सिंह, पर क्यों?

 सोमवार, 17 सितंबर, 2012 को 19:36 IST तक के समाचार

दिल्ली से छपने वाले प्रमुख आर्थिक अखबार इकॉनॉमिक टाइम्स ने प्रधानमंत्री को एथलीट के तौर पर दिखाया है (तस्वीर- इकॉनॉमिक टाइम्स)

क्या ये पश्चिमी मीडिया की ओर से मनमोहन सिंह पर बोले गए तगड़े हमले का चमत्कार था कि वो अचानक धूल झाड़ कर और आँखें पोंछते हुए उठ खड़े हुए हैं?

ठीक दो महीने पहले 16 अगस्त को अमरीका की टाइम पत्रिका ने मनमोहन सिंह को ‘फिसड्डी’ करार दिया था.

सितंबर की पाँच तारीख को अमरीकी अखबार ‘द वॉशिंगटन पोस्ट’ ने बताया कि भारत का ‘खामोश’ प्रधानमंत्री कैसे ‘दयनीय’ बन चुका है.

सिर्फ नौ दिन बाद यानी 14 सितंबर को मनमोहन सिंह मंत्रिमंडल ने खुदरा क्षेत्र, उड्डयन और प्रसारण के क्षेत्र में विदेशी पूँजी के लिए दरवाजे खोलने की वो घोषणाएँ कर डालीं जिन्हें उनकी सरकार पिछले एक अर्से से टालती चली आ रही थी.

दिल्ली से निकलने वाले आर्थिक अखबारों ने मनमोहन सिंह के फैसले को हाथों हाथ लिया है. ईकनॉमिक टाइम्स ने उत्साह के चरम में पहुँचकर मनमोहन सिंह को एथलीट की तरह कूदते फाँदते दिखा दिया.

आलोचक कहते हैं कि मनमोहन सिंह हमेशा पश्चिमी देशों के अखबारों की आलोचना ज्यादा चुभती हैं और भारतीय अखबारों में की गई आलोचना की वो कोई परवाह नहीं करते.

उनका कहना है कि मनमोहन सिंह की नींद तब खुली जब पश्चिमी अखबारों ने उन्हें ‘निकम्मा’ करार दे दिया. उन्होंने खुदरा क्षेत्र में सीधे विदेशी निवेश की इजाजत देने का फैसला तभी किया जब पश्चिमी मीडिया ने उन्हें एक कोने में खड़ा कर दिया.

काम करने का तरीका

"मनमोहन सिंह के काम करने का तरीका बिलकुल भी राजनीतिक नहीं है. उनका काम करने का तरीका बाबुओं वाला है. वो सोचते हैं कि फाइल पर मैंने आदेश दे दिया तो बाकी लोग उसे मान लें"

भारत भूषण, वरिष्ठ पत्रकार

पर मनमोहन सिंह के पास क्या और कोई चारा था?

जिस आर्थिक विकास की दर के लिए दुनिया ने उनका लोहा माना, वो सुस्त पड़ रही है. बारहवीं पंचवर्षीय योजना बनाने वालों का कहना है कि विकास की दर 8.2 प्रतिशत होगी पर उसकी कोई गारंटी नहीं है. हालात ऐसे ही रहे तो ये दर गिर कर पाँच प्रतिशत तक भी हो सकती है.

लेकिन याद करें तो आप पाएँगे कि पहले भी मनमोहन सिंह ने कुछ बड़े फैसले सर्वसम्मति से नहीं बल्कि एक तरह की प्रतिक्रिया और जुनून में किए हैं.

अपने पहले कार्यकाल में उन्होंने वो अमरीका के साथ असैन्य परमाणु समझौते के लिए कमर कस चुके थे, पर सरकार को बाहर से समर्थन दे रही वामपंथी पार्टियाँ अपना हाथ खींच लेने की धमकी देकर इसे नहीं होने दे रही थीं.

एक बार ऐसा लगने लगा था कि भारत और अमरीका के बीच में ये समझौता नहीं हो पाएगा. खुद मनमोहन सिंह ने लगभग हथियार डालते हुए कहा था, “काँग्रेस सिर्फ एक ही मुद्दे की पार्टी नहीं है.”

उनका मतलब था कि अगर परमाणु समझौता नहीं हो पाता है तो वो इसे स्वीकार करके आगे बढ़ेंगे.

पर अचानक एक दिन कोलकाता से निकले वाले टेलीग्राफ अखबार की मानिनी चटर्जी को दिए एक इंटरव्यू में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वामपंथियों को लगभग मुँह चिढ़ाने के अंदाज़ में कहा कि “वामपंथी चाहें तो सरकार से समर्थन वापिस ले सकते हैं.”

नतीजा ये हुआ कि वामपंथी पार्टियों ने सरकार से समर्थन वापिस ले लिया. मगर मनमोहन सिंह की सरकार फिर भी नहीं गिरी क्योंकि तब मुलायम सिंह की समाजवादी पार्टी ने उन्हें बचा लिया.

बाद में बीजेपी के सांसदों ने संसद में नोटों के बंडल लहरा कर आरोप लगाया कि सरकार बचाने के लिए काँग्रेस ने गलत तौर तरीकों का सहारा लिया. पर मनमोहन सिंह इस आलोचना के लिए भी तैयार थे.

भारत भूषण कहते हैं, “मनमोहन सिंह के काम करने का तरीका बिलकुल भी राजनीतिक नहीं है. उनका काम करने का तरीका बाबुओं वाला है. वो सोचते हैं कि फाइल पर मैंने आदेश दे दिया तो बाकी लोग उसे मान लें.”

झटके में फैसला

टाइम पत्रिका के कवर पर मनमोहन सिंह

अमरीकी पत्रिका टाइम ने दो महीने पहले मनमोहन सिंह को फिसड्डी करार दिया था.

यही वजह है कि प्रधानमंत्री पहले लंबे समय तक खामोश रहते हैं लेकिन फिर जब उन्हें लगता है कि बात उनके हाथ से निकलती जा रही है या फिर उनकी योजना के मुताबिक काम नहीं हो रहा है तो वो आनन फानन में फैसले कर लेते हैं, भले ही वो कितने ही अलोकप्रिय हो.

पर मनमोहन सिंह देश के सामने आ रही हर चुनौती पर इस तरह की चुस्ती नहीं दिखाते.

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों में कहा गया है कि दुनिया भर में पाँच साल से कम उम्र के सबसे ज्यादा बच्चे असमय भारत में मरते हैं. यहाँ गरीबी है, कुपोषण है, लोगों के पास शौचालय नहीं है, पीने का साफ पानी उपलब्ध नहीं है, भ्रष्ट देशों में भारत का शुमार सबसे ऊपर होता है.

लेकिन प्रधानमंत्री ने इन मुद्दों को सुलझाने में कभी वैसी तेजी नहीं दिखाई जैसी तेजी वो आर्थिक मुद्दों पर दिखाते हैं.

भारत भूषण कहते हैं, "मैं ये नहीं कह रहा हूं कि पश्चिमी देशों के हित में भारत का हित नहीं है. पर ये पारस्परिक हित सिर्फ आर्थिक सुधार, परमाणु समझौता और विदेश नीति के क्षेत्र में ही मिलते हैं. इनमें मनमोहन सिंह काफी सक्रिय हो जाते हैं. पर दूसरे मामलों से उन्हें कोई मतलब नहीं. राष्ट्रमंडल खेलों के दौरान घोटाला हुआ, टेलीकॉम घोटाला इनके समय में हुआ, कोयला घोटाला इनके रहते हुए हुआ."

मनमोहन सिंह 79 वर्ष के हो चले हैं. उन्होंने राजनीति में रहते हुए सिर्फ एक बार आम जनता की कसौटी का सामना किया था पर उसमें बुरी तरह फेल रहे. दक्षिण दिल्ली से लोकसभा चुनाव हारने का झटका लगने के बाद फिर उन्होंने कभी उस रास्ते जाने के बारे में नहीं सोचा.

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में वो पहले प्रधानमंत्री हैं जिन्हें जनता ने नहीं चुना है बल्कि वो राज्यसभा के रास्ते अप्रत्यक्ष तरीके से संसद पहुँचे हैं.

अब सबसे दिलचस्प ये देखना होगा कि वॉलमार्ट जैसी विदेशी कंपनियों को भारत के बाजार में किराना बेचने की इजाजत देने के बाद पश्चिमी अखबार और पत्रिकाएँ इस 'फिसड्डी', 'सुस्त', 'दुविधाग्रस्त' और 'दयनीय' प्रधानमंत्री के बारे में अपनी राय कैसे बदलते हैं !

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