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फिल्म विवाद: क्या ओबामा ने खुद से सवाल पूछा?

 रविवार, 16 सितंबर, 2012 को 07:11 IST तक के समाचार

तीन वर्ष से ज्यादा समय पहले की बात है जब अमरीकी राष्ट्रपति क्लिक करें बराक ओबामा ने काहिरा में लोगों को संबोधित करते हुए कहा था कि ''हम ऐसे समय मिल रहे हैं जब अमरीका और दुनियाभर के मुसलमानों के बीच जबर्दस्त तनाव चल रहा है.''

उनके भाषण का शीर्षक था- एक नयी शुरुआत जिसमें क्लिक करें बुश के शासनकाल की घटनाओं को भुलाने की कोशिश की गई थी.

इस हफ्ते समूचे मध्य एशिया और उससे परे भी क्लिक करें हिंसक प्रदर्शन हुए हैं. ऐसे में राष्ट्रपति ओबामा खुद से सवाल पूछ सकते हैं कि क्या गलत हुआ?

सच तो ये है कि इसका कोई एक जवाब नहीं हो सकता है.

एक जवाब ये है कि इसके लिए पिछले साल की राजनीतिक उठापटक जिसे अरब स्प्रिंग कहा गया, जिम्मेदार है.

विरोध प्रदर्शन मिस्र से ही शुरू हुए जहां से बीते साल अरब लोकतंत्र की बयार लीबिया पहुंच गई थी.

अरब स्प्रिंग की वजह से कानून-व्यवस्था का ढांचा भी चरमराया और ऐसे राजनीतिक माहौल में विरोध प्रदर्शन शुरू करना शायद आसान रहा होगा. इससे हिंसक तत्वों को भी मौका मिल गया और सुरक्षाबलों की मुश्किलें बढ़ गईं.

फिल्म के 'बहाने'

लेकिन सूडान में हिंसा क्यों हुई, कतर जो आमतौर पर शांत रहता है, वहां विरोध-प्रदर्शन क्यों हुए, इन सवालों का जबाव इस व्याख्या में नहीं मिलता है.

फिर इस तरह की घटनाएं तो मध्य पूर्व में तब भी होती रहीं जब वहां तानाशाह शासक थे.

उदाहरण के लिए साल 2006 में डेनमार्क के अखबार में पैगम्बर मोहम्मद का कार्टून छापने के विरोध में भी यहां हिंसक प्रदर्शन हुए थे.

दूसरा तर्क ये है कि अमरीका-विरोधी भावनाएं तेज़ी से बढ़ रही हैं और इसमें मजहबी कट्टरपंथी भी शामिल हैं. विवादित फिल्म ने जैसे अमरीका के विरोध की एक वजह और दे दी.

जून 2012 के प्यू सर्वे के मुताबिक, मुस्लिम देशों के महज 15 प्रतिशत लोग अमरीका के पक्ष में राय रखते हैं जबकि साल 2009 में इन लोगों की संख्या 25 प्रतिशत थी.

सर्वेक्षण बताते हैं कि इसकी कई वजहें हैं जिनमें इसराइल-फलस्तीन संघर्ष के प्रति अमरीकी नीति और मध्य-पूर्व में अमरीकी युद्ध जैसे और भी कई कारण हैं.

विडम्बना ये है कि एक तरफ जहां कई आलोचक, क्रांतियों के समर्थन के लिए ओबामा को आड़े हाथों लेते हैं, वहीं अरब के ज्यादातर लोग उनकी कार्रवाई को बहुत कम और देर से की गई कार्रवाई मानते हैं.

उदाहरण के लिए ट्यूनीशिया में केवल एक तिहाई लोग मानते हैं कि उनकी क्रांति के प्रति अमरीकी रुख सकारात्मक था.

बहरहाल हमें अमरीका के विरोध और धार्मिक चरमपंथ को अलग-अलग रखना चाहिए.

विचारों में अंतर

हालांकि अभिव्यक्ति की आज़ादी संबंधी अरब विचार पश्चिमी विचारों से अलग हैं. जैसे मिस्र के लगभग 84 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि मुस्लिम धर्म छोड़ने वालों को मौत की सजा मिलनी चाहिए.

यहां पीढ़ियों के बीच बड़ा अंतर है. जिनकी उम्र 35 साल से कम है, उन्होंने अरब स्प्रिंग में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया.

ये लोग दिन में कई बार नमाज नहीं पढ़ते हैं, नियमित रूप से मस्जिद नहीं जाते हैं, हर दिन कुरान भी नहीं पढ़ते हैं. उनकी रूचि धर्म में कम राजनीति में ज्यादा है.

मिस्र के 35 प्रतिशत लोग अमरीका के साथ अच्छे संबंध चाहते हैं. बीस प्रतिशत लोग मजबूत संबंधों की बात करते हैं.

इसी तरह ट्यूनीशिया के 60 प्रतिशत लोगों का कहना है कि उन्हें लोकतंत्र के बारे में अमरीकी विचार पसंद आते हैं.

इस वर्ष के एक गैलप सर्वेक्षण से पता चलता है कि लीबिया के 54 प्रतिशत लोग अमरीकी नेतृत्व को मंजूर करते हैं.

बेनगाज़ी में अमरीकी दूतावास पर हमला होता है तो लीबिया में इसका विरोध भी होता है.

शायद सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य ये है कि अरब देशों में इस हफ्ते दूतावासों में तोड़फोड़ करने वालों की संख्या, उन लोगों के अपेक्षाकृत बहुत कम थी जिन्होंने तानाशाहों को उखाड़ फेंका था.

जहां ज्यादा विरोध-प्रदर्शन हुए, वहां भी अमरीका-विरोधी भावनाएं हिंसा की एकमात्र वजह नहीं थी.

कई मामलों में प्रदर्शनकारियों की स्थानीय धार्मिक और राजनीतिक लोगों ने मदद की. जैसे खार्तूम में नमाजियों को प्रदर्शन स्थल तक ले जाने के लिए बसों की व्यवस्था की गई.

लीबिया में अमरीकी दूतावास पर हमला हुआ, राजदूत क्रिस स्टीवेंसन मारे गए. ये हमला शायद एक सोची समझी योजना के तहत किया गया जिसके पीछे अलकायदा से जुड़े संगठित चरमपंथी समूहों का हाथ हो सकता है.

दूरगामी परिणाम

हिंसा की इन तमाम घटनाओं के दूरगामी परिणाम होंगे. अमरीका के पास इस भड़काऊ फिल्म को सेंसर करने के लिए कोई वैधानिक हथियार नहीं है.

ये सब तब हो रहा है जब अमरीका में आठ हफ्ते बाद राष्ट्रपति चुनाव होना हैं. राष्ट्रपति ओबामा भी बचकर चलना चाहेंगे.

लेकिन इन घटनाओं की वजह से अमरीकी विदेश नीति में कोई बड़ा बदलाव नहीं होगा.

इसराइल-फलस्तीनी संघर्ष में दखल, ओबामा के लिए अच्छा अनुभव नहीं रहा. ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर भी शांति योजना कारगर नहीं हुई.

वहीं मिस्र के राष्ट्रपति मोहम्मद मुरसी पर अमरीकी भरोसा बुरी तरह डगमगाया है.

सैन्य और वित्तीय मदद के लिए अमरीका पर निर्भरता के बावजूद मोहम्मद मुरसी इन विरोध प्रदर्शनों की भर्त्सना करने में संकोच करेंगे.

उधर राष्ट्रपति ओबामा ने भी कहा है कि ''मैं नहीं समझता कि हम मिस्र को एक सहयोगी समझेंगे, लेकिन हम उन्हें दुश्मन नहीं मानेंगे.''

अमरीका पर फिर दबाव पड़ेगा कि वो मध्य एशिया से दूर जाए और एशिया पर ध्यान लगाए.

रही बात 'अरब-स्प्रिंग' वाली सरकारों की, तो उन्हें क्रांति के बाद तमाम संस्थाओं को मूर्त रूप देने के लिए मदद की जरूरत है और उनकी आबादी का एक छोटा हिस्सा इस काम को मुश्किल बना रहा है.

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