कश्मीर को संभाल नहीं पाता भारत

 गुरुवार, 6 सितंबर, 2012 को 08:55 IST तक के समाचार

भारत और पाकिस्तान की सरकारों ने बातचीत बंद नहीं होने दी.

पाकिस्तान में एक बड़ी तब्दीली आई है. अब वहाँ के राष्ट्रीय विमर्श में कश्मीर का उस तरह जिक्र नहीं किया जाता जैसा पहले होता था.

समस्या तब पैदा होती है जब भारत कश्मीर को सँभालने में नाकाम रहता है. कश्मीर में मानवाधिकारों के सिलसिले में भारत का रिकॉर्ड बहुत अच्छा नहीं रहा है. इसकी प्रतिक्रिया पाकिस्तान में होती है. लोग कहते हैं देखिए कश्मीर में क्या हो रहा है.

तथ्य ये है कि 1971 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध के 17 वर्ष बाद तक पाकिस्तान के किसी भी राजनेता या फौजी कमांडर ने कश्मीर का नाम नहीं लिया. कश्मीर पाकिस्तान के राडार से गायब हो गया था.

लेकिन कश्मीर के मामले को ठीक से हिंदुस्तान सँभाल नहीं पाया. इसके बाद 1989 में पाकिस्तान ने लश्करे तैयबा वगैरह बनाया. अब बरगद जैसी इस समस्या की जड़ें इतनी पुरानी हो चुकी हैं उन्हें निकालते निकालते समय लगेगा.

पर सबसे सुकून देने वाली बात ये है कि संबंधों को सामान्य बनाने के लिए भारत और पाकिस्तान अब जो उपाय कर रहे हैं वो पहले कभी नहीं किए गए.

एक दूसरे के देश में बैंक खोलना, आने जाने वालों को आसानी से वीजा देने के बारे में सोचना, व्यापार की पेचीदगियाँ दूर करना आदि बहुत सकारात्मक चीजें हैं.

ये सच है कि नवंबर 2008 को मुंबई में हुआ हादसा बड़ा हादसा था. पहले जैसा माहौल होता तो इस वजह से दोनों देशों के बीच हासिल किया गया सब कुछ खत्म हो जाता. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

जब अबू जंदल को गिरफ्तार किया गया तो भारत में उस मामले को काफी उछाला गया. कोई दूसरा समय होता तो उससे ही सब कुछ बर्बाद हो जाता. पर ऐसा नहीं हुआ.

बदलाव की आहट

विश्लेषक मानते हैं कि भारत और पाकिस्तान के संबंध सामान्य होने से तरक्की होगी.

पाकिस्तान में एक बुनियादी बदलाव आया है जिसे समझना जरूरी है.

अफगानिस्तान और कबायली इलाकों में जो जंग जारी है, उसके कारण पाकिस्तानी फौज का ध्यान वहाँ ज्यादा जा रहा है.

पिछले 65 साल में पहली बार पाकिस्तानी फौज हिंदुस्तान की ओर नहीं देख रही है. वो अपने इलाक़ों में उलझी हुई है. इससे एक खिड़की खुलती है कि हिंदुस्तान के साथ संबंध ठीक हो सकते हैं.

अतिवादी तत्व दोनों तरफ हैं. पर एक फर्क है. पाकिस्तान में ये तत्व हाशिए पर हैं. वहाँ की मुख्यधारा की पार्टियाँ भारत से संबंध ठीक रखना चाहती हैं.

यहाँ मामला अलग है. यहाँ यानी भारत में मुख्यधारा के राजनीतिक विमर्श में पाकिस्तान के खिलाफ दुश्मनी का भाव बहुत है. मैं आरएसएस या शिवसेना की बात नहीं कर रहा. मैं बीजेपी की बात कर रहा हूँ.

समस्याए पाकिस्तान में जरूर हैं. पर एक कोशिश है कि अतिवादी तत्वों को शिकस्त देकर आगे बढ़ें. पाकिस्तानी फौजें पहले अपने घरेलू अतिवादी तत्वों के साथ युद्ध नहीं करती थी. पर अब वो उनके खिलाफ जंग की हालत में है.

उसकी सोच में फर्क आया है. उसे हालात ने मजबूर किया है. एक मुंबई की बात क्या की जाए वहाँ अक्सर मुंबई जैसी घटनाएँ होती रहती हैं. वहाँ हालात बहुत खराब है.

अफगानिस्तान युद्ध का मैदान बना हुआ है. कोई नहीं जानता कि 2014 में अमरीकी फौजों के हटने के बाद वहाँ क्या होगा.

इसलिए अगर पाकिस्तानी फौज का ध्यान हिंदुस्तान से हट रहा है तो इसकी तारीफ की जानी चाहिए.

(बीबीसी संवाददाता राजेश जोशी से बातचीत पर आधारित)

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