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लंदन: भारतीय छात्रों का भविष्य अधर में

 गुरुवार, 30 अगस्त, 2012 को 21:13 IST तक के समाचार

यूनिवर्सिटी में बड़ी संख्या में हर साल विदेशी छात्र आते रहे हैं

ब्रिटेन में विदेशी लोगों के आगमन को नियंत्रित करने वाली संस्था यूके बोर्डर एजेंसी (यूकेबीए) ने लंदन की मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी के लगभग तीन हज़ार छात्रों का वीज़ा रद्द कर दिया है.

यूकेबीए का कहना है कि जाँच के बाद पाया गया कि यूनिवर्सिटी ने नियमों की अनदेखी करके बहुत सारे ऐसे लोगों को ब्रिटेन आने दिया जिनका मूल उद्देश्य पढ़ाई नहीं, बल्कि नौकरी करना था.

मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी में 2009 से 2012 के बीच पढ़ने आए सभी विदेशी छात्र इस निर्णय से प्रभावित हुए हैं जिनमें 500 से अधिक भारतीय छात्र हैं.

लंदन मेट्रोपॉलिटन स्टूडेंट्स यूनियन के उपाध्यक्ष और इंजीनियरिंग के छात्र वसीम जावेद कोलकाता से पढ़ाई करने दो साल पहले लंदन आए थे.

वसीम कहते हैं, "हमसे कहा गया है कि हम साठ दिनों के भीतर दूसरी यूनिवर्सिटी ढूँढ लें या फिर अपने-अपने देश वापस चले जाएँ, जो सरासर ग़लत है. हम यहाँ फ़ीस भरकर पढ़ाई करने के लिए आए हैं, ग़लती चाहे जिसकी भी हो, छात्रों की तो बिल्कुल नहीं है मगर सबसे बुरी तरह से वे ही प्रभावित हो रहे हैं."

"हमसे कहा गया है कि हम साठ दिनों के भीतर दूसरी यूनिवर्सिटी ढूँढ लें या फिर अपने-अपने देश वापस चले जाएँ, जो सरासर ग़लत है"

वसीम जावेद, छात्र

जानकारों का कहना है कि कोर्स के बीच कोई दूसरी यूनिवर्सिटी इन छात्रों को स्वीकार करेगी इसकी संभावना बहुत कम है क्योंकि यह अपने-आप में बहुत पेचीदा होगा, हर यूनिवर्सिटी के कोर्स एक-दूसरे से अलग हैं, ग्रेडिंग की प्रणाली, फ़ीस वग़ैरह में भी बहुत अंतर है.

अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इस निर्णय की चपेट में जो सैकड़ों ईमानदार छात्र फँस गए हैं, उनका क्या होगा. ब्रितानी सरकार ने ऐसे ज़रुरतमंद छात्रों की मदद करने के लिए एक विशेष टास्क फोर्स का गठन करने की घोषणा की है.

गुरुवार को लगभग 100 विदेशी छात्रों ने लंदन में ब्रितानी प्रधानमंत्री के घर के बाहर मूक प्रदर्शन किया और उनके कार्यालय को एक अर्ज़ी सौंपी. वसीम कहते हैं, "जो छात्र इतनी बड़ी रकम ख़र्च करके पढ़ाई करने आए हैं यह उनके भविष्य के साथ मज़ाक है, यह ब्रिटेन में उच्च शिक्षा के नाम पर एक काला धब्बा है."

क्यों हुआ ऐसा निर्णय?

ब्रिटेन के कई बड़े शिक्षण संस्थानों को हाइली ट्रस्टेड स्टेटस (एचटीएस) दिया गया है, यह व्यवस्था 2009 में लागू की गई थी जिसके तहत लंदन मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी जैसे संस्थान विदेशों से आने वाले छात्रों को सीधे स्टूडेंट वीज़ा दे सकते थे, इसे टियर-4 वीज़ा भी कहा जाता है.

लंदन को उच्च शिक्षा का अंतरराष्ट्रीय केंद्र माना जाता है

यूकेबीए ने पिछले कई महीनों तक चली जाँच के बाद पाया कि यूनिवर्सिटी ने वीज़ा नियमों की बड़े पैमाने पर अनदेखी की थी और ऐसे बहुत सारे लोगों को देश में आने दिया था जिन्हें कोर्स करने लायक अँगरेज़ी नहीं आती थी, या जो क्लास अटेंड नहीं कर रहे थे या फिर नियम तोड़कर कहीं काम कर रहे थे.

इसके बाद यूकेबीए ने एचटीएस के तहत पिछले तीन वर्षों में लंदन मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी की ओर से दिए गए सभी स्टूडेंट वीज़ा रद्द कर दिए और यूनिवर्सिटी का एचटीएस दर्जा छीन लिया.

"ताज़ा जाँच में हमने 61 प्रतिशत से अधिक मामलों में गड़बड़ियाँ पाईं जिसके बाद हमारे पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था"

यूकेबीए का बयान

यूकेबीए की ओर से जारी बयान में कहा गया है, "लंदन मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी का विदेशी छात्रों को देश में लाने का लाइसेंस छीन लिया गया है क्योंकि छह महीने पहले हुई जाँच में पाई गई गड़बड़ियों को उसने ठीक नहीं किया. ताज़ा जाँच में हमने 61 प्रतिशत से अधिक मामलों में गड़बड़ियाँ पाईं जिसके बाद हमारे पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था."

ब्रिटेन के नेशनल स्टूडेंट यूनियन ने इस फ़ैसले की आलोचना की है, यूनियन का कहना है कि "अंतरराष्ट्रीय छात्रों के नाम पर राजनीति हो रही है" जिससे उच्च शिक्षा का कारोबार प्रभावित हो सकता है.

लेबर पार्टी के भारतीय मूल के सासंद कीथ वाज़ ने कहा है, "दुनिया भर में उच्च शिक्षा के मामले में ब्रिटेन का जो नाम है वह इस निर्णय से ख़राब हो सकता है, इस निर्णय की वजह से हज़ारों छात्रों का भविष्य अधर में लटक गया है. शिक्षण सत्र की शुरुआत के समय ऐसी स्थिति पैदा होना निश्चय ही दुर्भाग्यपूर्ण है."

मगर बीबीसी को दिए गए एक इंटरव्यू में इमिग्रेशन मामलों के मंत्री डेमियन ग्रीन ने कहा, "बहुत बड़े पैमाने पर चल रहे स्टूडेंट वीज़ा के दुरुपयोग को रोकने के लिए उठाया गया यह एक सही क़दम है."

'फँस गए ईमानदार छात्र'

वसीम जावेद कहते हैं कि "कुछ गड़बड़ी करने वालों की वजह से ईमानदार छात्रों की जान मुसीबत में फँस गई है, जाँच करके सिर्फ़ ग़लत तरीक़े से आए लोगों का वीज़ा रद्द करना चाहिए था न कि सभी छात्रों का".

ब्रिटेन में वीज़ा नियम सख़्त कर दिए गए हैं

मेट्रोपॉलिटन यूनिवर्सिटी में सितंबर से पढ़ाई के लिए कोलकाता से आने की तैयारी कर रहे छात्र अभिमन्यु अग्रवाल कहते हैं, "हमारा करियर, पढ़ाई, जमा पूंजी सब कुछ दाँव लग गया है. मैं बहुत बड़ी उलझन में फँस गया हूँ, मुझे समझ में नहीं आ रहा कि क्या करूँ, मेरी लंदन की फ्लाइट भी बुक हो चुकी है. मैंने ये सोचकर फ़ीस वापसी की माँग नहीं की थी कि मामला सुलझ जाएगा."

वे कहते हैं, "लंदन का बड़ा नाम है, यही सोचकर मैंने कहीं और अप्लाई नहीं किया, अब हर जगह नामांकन बंद हो चुका है, कम से कम यह साल तो बर्बाद हो ही गया. यह अच्छा संकेत नहीं है, इससे तो यही संदेश जाएगा कि ब्रिटेन में विदेशी छात्रों के लिए जगह नहीं है."

"हमारा करियर, पढ़ाई, जमा पूंजी सब कुछ दाँव लग गया है. मैं बहुत बड़ी उलझन में फँस गया हूँ, मुझे समझ में नहीं आ रहा कि क्या करूँ, मेरी लंदन की फ्लाइट भी बुक हो चुकी है"

अभिमन्यु अग्रवाल, छात्र

पिछले कुछ वर्षों में ब्रिटेन ने इमिग्रेशन के नियम काफ़ी कड़े कर दिए हैं, अक्सर स्टूडेंट वीज़ा के दुरुपयोग की ख़बरें आती रहती हैं लेकिन अब तक इतने बड़े पैमाने पर इतनी सख़्त कार्रवाई पहले नहीं की गई.

ब्रिटेन में उच्च शिक्षण संस्थानों में विदेशी छात्रों से घरेलू छात्रों के मुक़ाबले अधिक फ़ीस ली जाती है, विदेशी छात्र ज़्यादातर संस्थानों की आय का मुख्य स्रोत हैं. कुछ ही समय पहले ब्रितानी मीडिया में बहस छिड़ी थी कि सिर्फ़ ऊँची फ़ीस की वजह से कम योग्य विदेशी छात्रों को घरेलू छात्रों के ऊपर तरजीह दी जा रही है.

हर वर्ष विदेशी छात्र ब्रितानी अर्थव्यवस्था में अरबों पाउंड का योगदान करते हैं, चीन के बाद भारत ही वो देश है जहाँ से सबसे अधिक छात्र पढ़ाई करने ब्रिटेन आते हैं.

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