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बर्मा में 48 साल बाद मीडिया सेंसरशिप खत्म

 सोमवार, 20 अगस्त, 2012 को 14:16 IST तक के समाचार
अखबार विक्रता

बर्मा में 1964 में प्रेस सेंसरशिप लगाई गई थी

बर्मा में नागरिक सरकार ने राजनीतिक सुधारों में बड़ा कदम उठाते हुए लगभग 48 साल के बाद मीडिया से सेंसरशिप हटाने की घोषणा की है.

बर्मा में पिछले साल नागरिक सरकार ने सत्ता संभाली थी.

सरकार के प्रेस छानबीन और पंजीकरण विभाग यानी पीएसआरबी के अधिकारियों का कहना है कि पत्रकारों को अब से अपने काम को प्रकाशित करने से पहले सेंसर बोर्ड को नहीं दिखाना पड़ेगा.

पीएसआरबी के उप महानिदेशक टिंट स्वे का कहना था, '' हमने सेंसरशिप प्रणाली को खत्म कर दिया है लेकिन प्रेस छानबीन और पंजीकरण बोर्ड काम करेगा.लेकिन बोर्ड मीडिया का पंजीकरण प्रकाशन के बाद ही करेगा.नई सरकार के गठन के बाद सूचना मंत्रालय की दो नीतियां है जिसमें पहला नए मीडिया कानून पर मसौदा तैयार करना है और इसके लागू होने से पहले हम लोग कोशिश कर रहे हैं कि सेंसरशिप नीति नए संविधान के साथ तालमेल बिठाए.''

प्रेस छानबीन और पंजीकरण विभाग की टिंट स्वे ने बताया, "सेंसरशिप छह अगस्त 1964 को शुरु हुई थी और 48 साल, दो हफ्ते के बाद खत्म हो गई है."

बर्मा में पिछले पांच साल से सैन्य शासन के दौरान अखबारों से लेकर गानों के शब्दों को सेंसर किया जाता था.

अनुमति

हालांकि पिछले साल ही कुछ प्रतिबंधों में ढील दी गई थी. लेकिन इस मंत्रालय के एक अधिकारी ने समाचार एजेंसी एएफपी को बताया कि फिल्मों को अब भी सेंसर किया जाएगा.

लगभग 300 अखबारों और पत्रिकाओं को कम संवेदनशील मुद्दों पर बिना सेंसरशिप के खबरें प्रकाशित करने की अनुमति दी गई है और लगभग 30 हजार इंटरनेट साइटों पर से प्रतिबंध उठा लिए गए हैं.

ओपन न्यूज़ विकली के मुख्य संपादक थीह सा का कहना था,'' हां अब बर्मा में सेंसरशिप नहीं है लेकिन अभी भी हमारे पास पंजीकरण प्रणाली नहीं है.ऐसे में राजनीतिक अखबार अर्थव्यवस्था के बारे में नहीं लिख सकते हैं और आर्थिक अखबार प्रेम संबंधों के बारे में नहीं लिख सकते हैं.दूसरी बात ये कि हमें कुछ कॉपियां पंजीकरण कराने के लिए भी भेजनी होंगीं.1962 का कानून ही काम करेगा जब तक नया मीडिया कानून नहीं आ जाता.''

बर्मा में पत्रकारों को को दिशानिर्देश देते हुए विवादास्पद समाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर लिखने की अनुमति दी है जिसके बारे में पिछले सैन्य शासन के दौरान सोचना भी मुमकिन नहीं था.

पिछले साल अक्तुबर में स्वे ने कहा था कि सेंसरशिप को समाप्त किया जाएगा क्योंकि लोकतांत्रिक प्रक्रिया के साथ तालमेल नहीं खाती है.

कुछ पत्रकारों ने इस बात को लेकर चिंता जताई थी कि अगर सरकार उनके प्रकाशित काम में कोई गलती पाएंगी तो क़ानून का उनके खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है

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