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करियर प्रकाशन अधिकारी का...

 शनिवार, 11 अगस्त, 2012 को 14:02 IST तक के समाचार
प्रकाशन अधिकारी.

साहित्य की किताबें प्रकाशित करने वाली किसी भी संस्था में प्रकाशन अधिकारी का पद ज़रुर होता है.

पिछले कुछ समय बीबीसी हिंदी सेवा आपकी मुलाकात कुछ ऐसे पेशेवर लोगों से करवा रही है जो लीक से हटकर काम करते हैं या वे ऐसे पेशे से जुड़े हैं जिनके बारे में आम लोगों के पास काफी कम जानकारी है...लेकिन ये काम काफी महत्वपूर्ण होते हैं.

इसी कड़ी में बीबीसी संवाददाता स्वाति अर्जुन ने बातचीत की अंबेडकर प्रतिष्ठान में प्रकाशन अधिकारी के तौर पर कार्यरत कुमार अनुपम से.

अनुपम विस्तार से बताएं कि एक प्रकाशन अधिकारी का मूल काम क्या होता है और किन-किन जगहों पर उनकी ज़रुरत होती है ?

ये सही है कि एक प्रकाशन अधिकारी के काम के बारे में लोगों को काफी कम जानकारी है लेकिन इस काम का दायरा काफी बड़ा है. प्रकाशन अधिकारी का काम प्रकाशन से जुड़े सभी कामों से होता है. इसमें टाइपिंग, प्रूफ-रीडिंग, एडिटिंग से लेकर मुद्रण और कवर डिज़ाईन तक का काम एक प्रकाशन अधिकारी के ज़िम्मे होता है.

एक प्रकाशन अधिकारी के तौर पर आपने कहां-कहां काम किया है ?

मैंने लखनऊ से निकलने वाली एक विचार एवं साहित्य की पत्रिका है शब्द-सत्ता उसमें सहायक संपादक के रुप में काम किया है, कलाओं की एक पत्रिका है कला-वसुधा उसमें कला संपादक के रुप में किया है.

इसके बाद दिल्ली स्थित प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्थान भारतीय ज्ञानपीठ में प्रकाशन अधिकारी के रुप में काम किया और अब मैं दिल्ली में ही अंबेडकर प्रतिष्ठान से जुड़ गया जहां हम बाबा साहब के साहित्य को 22 भारतीय भाषाओं में छापने की कोशिश कर रहे हैं.

आपने कब और कैसे तय किया कि आपको प्रकाशन अधिकारी ही बनना है ?

स्कूल में पढ़ाई के दौरान मैं काफी संस्कृतनिष्ठ हिंदी लिखता था तो स्कूल से ही मुझे अलग नज़र से देखा जाने लगा था. उन्हीं दिनों स्वतंत्र भारत पत्रिका में एक प्रतियोगिता होती थी जिसका नाम था बाल लेखन एवं रंग भरो प्रतियोगिता हुआ करती थी. इसमें उसमें छपी तस्वीर को रंगना होता था और उसपर कविता या कहानी लिखनी होती थी.

यहीं से एक लालच बना, जिसके बाद मैं लखनऊ चला आया और यहां आकर फ्री-लांसिग करता रहा. इस दौरान मैंने यूनिसेफ, यूएनडीपी और सर्वशिक्षा अभियान में लोकविधा विशेषज्ञ और विज़ुलाईज़र के रुप में काम किया.

"प्रकाशन अधिकारी का काम प्रकाशन से जुड़े सभी कामों से होता है. इसमें टाइपिंग, प्रूफ-रीडिंग, एडिटिंग से लेकर मुद्रण और कवर डिज़ाईन तक का काम एक प्रकाशन अधिकारी के ज़िम्मे होता है."

क्या इस पेशे में इतना पैसा है कि आप आर्थिक रुप से आत्मनिर्भर हो सके ?

अभी के समय को तो मैं लघु पत्रिकाओं का स्वर्णकाल कहता हुं. इतनी ज्यादा पत्रिकाएं हमारे देश में इससे पहले कभी नहीं आयीं. सिर्फ साहित्य की 400-500 पत्रिकाएं छपती हैं इसके अलावा कई समाचार और अन्य पत्रिकाएं हैं जिससे इस पेशे में आने वालों के लिए एक बड़ा ऑप्शन खुल गया है.

इस पद पर रहते-रहते आपको कई अलग-अलग विषयों पर काम करना पड़ता होगा. कैसे चुनते हैं आप अपनी पसंद और काबलियत के मुताबिक काम ?

जब आप किसी भी संस्था में काम करने जाते हैं तो आपकी योग्यता और रुचि को आपके अधिकारी पहचान लेते हैं. जैसे जिन दिनों मैं भारतीय ज्ञानपीठ में काम किया करता थो तो मुझे मेरी रुचि के अनुसार कविता की किताबों की ज़िम्मेदारी दे दी गई थी.

वैसे कई बार हमारी रुचि मायने नहीं भी रखती है क्योंकि हमें हर किस्म का काम आना चाहिए. अगर हम साहित्य से जुड़ी नई प्रवृत्तियों के बारे में नहीं जानेंगे तो नए रचनाकारों की रचनाओं के संपादन के साथ न्याय नहीं कर पाएंगे.

एक प्रकाशन अधिकारी बनने के लिए आपकी नज़र में किस तरह के गुण और शिक्षा की ज़रुरत होती है ?

सबसे ज़रूरी तो ये है कि हम जिस पेशे को अपना करियर बना रहे हैं उसमें हमारी प्राथमिक रुचि तो होनी ही चाहिए. जिस भाषा में वो प्रकाशन संस्था किताबें छापती हैं उस भाषा का सूक्ष्म ज्ञान तो होना ही चाहिए. इससे अलावा जो सबसे ज्यादा ज़रुरी है वो है बहुत सारे विषयों की जानकारी होना.

प्रकाशन अधिकारी

एक प्रकाशन अधिकारी के लिए भाषा का सूक्ष्म ज्ञान होना बेहद ज़रुरी है.

काम के दौरान आपको किस बात पर सबसे ज्यादा ध्यान देना होता है ?

हमारे लिए सबसे ज्य़ादा ज़रुरी ये होता है कि साहित्य और जीवन में जो परिवर्तन हो रहा है उसपर हमारी पैनी नज़र है या नहीं. क्योंकि हम साहित्य में ज्यादा छेड़छाड़ नहीं कर सकते हैं. किसी भी रचना को उसके मूल भाव और कथ्य से बदल नहीं सकते हैं. ये भी सुनिश्चित करना चाहिए कि उसमें किसी भी तरह से कोई विवादास्पद कथ्य या शब्द ना जाएं.

क्या कोई कॉलेज या संस्थान किसी इंसान को ये काम सिखा सकती है या ये एक स्वाभाविक कला है जो सिखाई नहीं जा सकती ?

अब तो ऐसे बहुत सारे संस्थान हैं जो क्रिएटिव राईटिंग, एडिटिंग और डिज़ाइनिंग के काम सिखाते हैं जो प्रकाशन से संबंधित काम है और प्राथमिक रुचि होना भी ज़रुरी है. मैं कहुंगा कि ये स्वाभाविक कला भी है और इसे थोड़ा-थोड़ा निखारा भी जा सकता है.

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