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कहाँ गई आपके हिस्से की बिजली?

 मंगलवार, 31 जुलाई, 2012 को 17:10 IST तक के समाचार

पॉवर ग्रिड फेल होने से आधे हिंदुस्तान में त्राहि त्राहि मच गई है.

इक्कीसवीं शताब्दी के उभरते भारत में चौबीस घंटे के भीतर दो बार पॉवर ग्रिड फेल होने के कारण त्राहि-त्राहि मच गई. पर ये हुआ क्यों?

पॉवर ग्रिड को एक बाँध की तस्वीर से समझा जा सकता है.

जिस तरह बाँध में नदियों का पानी एकत्रित किया जाता है उसी तरह बिजलीघरों में पैदा की गई बिजली भी एक जगह इकट्ठा होती है.

बिजली के इस बाँध से हाई टेंशन तारों के ज़रिए देश के अलग अलग हिस्सों में बिजली सप्लाई की जाती है.

इसी ताने बाने को पॉवर ग्रिड कहा जाता है.

कल्पना कीजिए कि पानी के बाँध से निकलने वाली नहरों को पूरी तरह खोल दिया जाए तो कुछ समय बाद बाँध सूख जाएगा.

इसी जब बिजली के भंडार से भारी मात्रा में बिजली खींच ली जाती है तो ग्रिड फेल हो जाता है.

फिक्की के महासचिव राजीव कुमार ने बीबीसी को बताया, "बिजली शरीर में बहने वाले खून की तरह होती है. ये हमारी आर्थिक प्रगति के लिए जरूरी है और अगर आपके शरीर में खून की कमी होगी तो आप कुछ नहीं कर सकते. वैसे ही बिजली कम होगी तो अर्थव्यवस्था काम नहीं करेगी."

कौन ज़िम्मेदार?

केंद्रीय ऊर्जा मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने सफाई दी है कि ग्रिड इसलिए फेल हुए क्योंकि कुछ राज्यों ने ज़रूरत से ज़्यादा बिजली खींच ली.

तो क्या बिजली खींचने पर किसी तरह की कोई रोकटोक नहीं है? क्या राज्य जितनी चाहें उतनी बिजली खींच सकते हैं?

दरअसल यही कारण है कि चौबीस घंटे में भारत के सामने इतना बड़ा संकट पैदा हो गया.

पॉवर ग्रिड से ज्यादा बिजली खींच लिए जाने के कारण बिजली का भट्ठा बैठता है.

राज्यों को अपने हिसाब से बिजली लेने से नहीं रोका जा सकता. अगर कोई राज्य ज़्यादा बिजली खींचता है तो उसे आर्थिक दंड के तौर पर ज़्यादा कीमत अदा करनी पड़ती है.

लेकिन उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य ज़्यादा बिजली तो खींचते ही हैं, आर्थिक दंग भरने में भी आनाकानी करते हैं.

पूर्व ऊर्जा सचिव आर वी शाही ने बीबीसी को बताया कि 2002 में उत्तर भारत में ग्रिड फेल हुआ था जिसके बाद एक योजना का खाका बनाया गया था जिसके जरिए बंबई और दिल्ली को गड़बड़ी से बचाए रखने की योजना थी.

यानी अगर ग्रिड फेल भी हो जाता है तो इन शहरों में आम व्यवस्था सामान्य रूप से चलती रहे.

श्री शाही ने कहा, “मैं नहीं जानता कि उस योजना को लागू क्यों नहीं किया गया. ”

उन्होंने बताया कि विद्युत कंपनियाँ बिजलीघरों को चलाने को तैयार नहीं हैं क्योंकि उसके लिए कोयला चाहिेए और अगर पर्याप्त कोयला उपलब्ध नहीं है तो उसे आयात करना पड़ेगा.

शाही ने कहा, “कंपनियाँ कोयला खरीदने को तैयार नहीं होतीं क्योंकि वो उपभोक्ताओं से कीमत नहीं वसूल पातीं.”

भारत में इस समय 2,05,340.26मेगावॉट बिजली पैदा करने की क्षमता है लेकिन कोयले के अभाव में ऐसा नहीं हो पाता.

नजर कैसे रखें?

"कंपनियाँ कोयला खरीदने को तैयार नहीं होतीं क्योंकि वो उपभोक्ताओं से कीमत नहीं वसूल पातीं."

पूर्व ऊर्जा सचिव, आर वी शाही

पॉवर ग्रिड सुचारु ढंग से काम करता रहे इसके लिए कंप्यूटरों के जरिए उन पर निगाह रखी जाती है.

इनका काम होता है ग्रिड में बिजली घरो से डाली जाने वाली बिजली और उसकी सप्लाई के अनुपात पर नजर रखना.

जितना बड़ा ग्रिड होता है उसकी स्थिरता भी उतनी ही सुनिश्चित रहती है.

लेकिन इसका मतलब ये भी होता है कि अगर कहीं बड़े पॉवर ग्रिड में गड़बड़ी हुई तो उसका असर भी उतने ही व्यापक इलाके में पड़ता है.

पर ऐसा नहीं है कि ये समस्या सिर्फ भारत में ही हुई हो. पॉवर ग्रिड के भतिक जाने की घटनाएँ दुनिया के कई देशों में हुई हैं.

जानकार कहते हैं कि कुल मिलाकर विद्युत अनुशासन ज़रूरी है. उतनी ही बिजली इस्तेमाल करें जितनी जरूरी हो.

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