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गणित का सरताज जो समय से हारा

 सोमवार, 2 जुलाई, 2012 को 05:07 IST तक के समाचार

साल 1954 में जब इंग्लैंड के गणितज्ञ एलन ट्यूरिंग की मौत हुई उस वक्त उनका नाम सिर्फ पढ़े-लिखे वर्ग में और खुफिया पुलिस को मालूम था. आज उन्हें आधुनिक कंप्युटिंग का पिता माना जाता है.

दूसरे विश्व युद्ध में जर्मन कोड को तोड़ने में उनकी भूमिका ने भी उन्हें काफी ख्याति दिलाई थी. लेकिन इन बेमिसाल मुकामों को हासिल करने के कुछ साल बाद ही उन्होंने आत्महत्या कर ली थी.

कुछ दिनों पहले इंग्लैंड मे ट्युरिंग की सौवीं वर्षगांठ मनाई गई.

पिछले साल लंदन में अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने ब्रिटेन और अमरीका के मिले-जुले इतिहास की बात की थी. ओबामा ने आइंस्टाइन और एडिसन जैसे महान वैज्ञानिकों की श्रेणी में ट्यूरिंग का भी नाम लिया.

विश्व युद्ध में भूमिका

लेकिन कई सालों तक कोई भी राजनेता अपने भाषणों में ट्यूरिंग का नाम लेना ठीक नहीं समझता था. चाहे वो वैज्ञानिक सफलताओं के बारे में ही क्यों न हो. पचास के दशक में जब उनकी मौत हुई थी तब ब्रिटेन ने उन्हें सेक्स जीवन में सीमाओं को लांघने का दोषी माना था, जबकि इसके ठीक एक दशक पहले उनकी भूमिका ब्रिटेन को बचाए रखने में बेहद अहम रही थी.

इससे बड़ी भूमिका का परिचय विंसेंट चर्चिल के बयान से मिलता है जिसमें उन्होंने कहा था “अटलांटिक की युद्ध हमें जीतनी है. हम अपनी पूरी शक्ति और विज्ञान की मदद से इस युद्ध से निपटने की तैयारी कर रहे हैं.”

दरअसल चर्चिल जिस साइंस या विज्ञान की बात कर रहे थे वो लंदन के ब्लेच्ली पार्क के एक गुप्त मकान में पूरी की गई थी.

ब्लेचली पार्क में आज दर्शकों का तांता लगा रहता है जो ये जानने की कोशिश करते हैं कि किस तरह जर्मनी के एनिगमा कोड को यहां तोड़ा गया था.

आधुनिक कंप्यूटर

"वो जीनियस थे. कॉलेज में ही उन्होंने एक मशीन की कल्पना की थी जो अपने आप में पूरी हो और तमाम सवालों का जबाव दे सके. जैसा कि आज का कंप्यूटर है. लेकिन उन्हें अपने ब्लेचली पार्क के ठिकाने से ज्यादा लगाव नहीं था. वो बार बार किंग्स कॉलेज आते थे"

इतिहासकार लॉर्ड ब्रिग्स

इस एनिगमा को जिसने तोड़ा था उसका नाम था एलन ट्यूरिंग और वो उस वक्त तीस साल के भी नहीं थे. जर्मनी के एनिगमा कोर्ड को तोड़ने के लिए ट्यूरिंग ने अपनी खास मशीन बनाई जिससे युद्द की कूट भाषा को समझा जाने लगा

इसके अलावा ट्यूरिंग ने शुरुआती कंप्यूटरों के अविष्कार में भी बड़ी भूमिका निभाई थी .

उनकी जीवनी लिखने वाले लेखक एंड्रू हॉज्स कहते हैं, “पर्सनल कंप्यूटर का अविष्कार किसने किया इसके लिए किसी एक का नाम नहीं लिया जा सकता. लेकिन उन नामों में एलन ट्यूरिंग का नाम प्रमुखता से लिया जाएगा.”

वहीं ट्यूरिंग की बौद्धिकता और उनेक जीवन के पहलू के बारे इतिहासकार लॉर्ड ब्रिग्स कहते हैं, “वो जीनियस थे. कॉलेज में ही उन्होंने एक मशीन की कल्पना की थी जो अपने आप में पूरी हो और तमाम सवालों का जबाव दे सके. जैसा कि आज का कंप्यूटर है. लेकिन उन्हें अपने ब्लेचली पार्क के ठिकाने से ज्यादा लगाव नहीं था. वो बार-बार किंग्स कॉलेज आते थे.”

दरअसल किंग्स कॉलेज में ट्यूरिंग के समलैंगिक होने को ज्यादा गलत नजरों से नहीं देखा जाता था, हालांकि ब्रिटेन में उस वक्त समलैंगिक संबंध बनाना गैरकानूनी था.

वर्ष 1952 में ट्यूरिंग की मुलाकात एक युवक के साथ होती है जिसके साथ वो एक रात गुजारते हैं. लेकिन उसी रात उनके घर में चोरी हो जाती है. जांच में ट्यूरिंग को अभद्र व्यवहार का दोषी माना जाता है.

एलन ट्यूरिंग ने जर्मनी के कोड को तोड़ा था

एंड्रू हॉज्स कहते हैं कि ट्यरिंग अपने व्यव्हार को गलत नहीं मानते थे और गहरे अवसाद में चले गए थे.

दो साल बाद जब 42 साल के ट्युरिंग की जहर खाने से मौत हुई तो उसे आत्महत्या का मामला माना गया. कई लोगों का मानना है कि उनकी मौत उनपर चले कोर्ट केस की वजह से हुई

मौत

लेकिन उनके मौत के हालात पर अभी भी राय बंटी हुई है

अब लंदन के साइंस म्यूजियम में ट्यूरिंग की जन्मशती पर खास प्रदर्शनी लगाई गई है. उनके भतीजे डरमॉट कहते हैं कि ट्यूरिंग पर लोगो में रूचि पहले से बढ़ी है.

लेकिन इसके बावजूद ट्यूरिंग की मौत के 58 साल बाद भी उनके जीवन और मौत का रहस्य उस तरह खुल नहीं पाया है जिस तरह उन्होंने विश्व युद्ध में अटूट माने जाने वाले कोड को खोल कर रख दिया था.

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