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क्या होगा मिस्र की खुफिया पुलिस का?

 गुरुवार, 7 जून, 2012 को 05:19 IST तक के समाचार

मिस्र में खुफिया पुलिस के सुधार की बात जोर पकड़ रही है

मिस्र में कुछ हफ्तों में नए राष्ट्रपति शपथ ग्रहण करेंगे. नए राष्ट्रपति से लोगों को सबसे बड़ी उम्मीद ये होगी की वो मिस्र की खुफिया पुलिस का सुधार करें.

पूर्व राष्ट्रपति होस्नी मुबारक द्वारा स्थापित सीक्रेट पुलिस यानी खुफिया पुलिस का काफी आतंक था.

पिछले साल मार्च में प्रदर्शनकारियों ने खुफिया पुलिस के मुख्यालय पर कब्जा कर लिया था और कुछ फाइलें भी गायब कर दी थीं.

लोगों को उम्मीद थी की मुबारक के बाद खुफिया पुलिस में बदलाव आएगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं है.

खुफिया पुलिस में बदलाव के लिए मिस्र में जनता के संघर्ष की ये कहानी पिछले साल मार्च में शुरु हुई जब सैकड़ों प्रदर्शनकारी कई सुरक्षा कार्यालयों के दफ्तरों को तोड़कर अंदर घुस आए.

सुपरमैन

इन कार्यकर्ताओं को खबर मिली थी की खुफिया पुलिस के दफ्तर में आग लग गई है और दस्तावेजों को जलाया जा रहा है.

उनमें तीस साल के होसम अल हमालवी भी शामिल थे.

अंदर आए कई कार्यकर्ताओं को सुरक्षा भवन और बंदीगृह की जानकारी थी क्योंकि वो पहले वहां बंद रह चुके थे.

होसाम ने भी वहां दस साल गुजारे थे जहां खुफिया पुलिस ने कैदियों को कई यातनाएं दी थी. उनकी आंखों पर पट्टी बांधकर उन्हें पीटा जाता था.

सुरक्षा दफ्तर के अंदर होसाम और उनके साथी फाइलों को ढूंढ रहे थे. उन्हें कुछ फाइलें मिली लेकिन हजारों को जला दिया गया था.

होसाम को दो डीवीडी मिलीं जिनमें खुफिया पुलिस अफसरों की तस्वीरें थी. वो खुशी से पागल हो उठे.

उस पल को याद करके होसाम कहते हैं, "ये सशक्तीकरण का अहसास दिलाता है. हमने राज्य की पुलिस को हरा दिया है. ऐसा लग रहा था कि मैं सुपरमैन हूं - मैं उड़ सकता हूं, उंची इमारतों से कूद सकता हूं. वो एक खूबसूरत अहसास था."

खुशी की लहर

उस घटना के कुछ हफ्तों बाद मिस्र की खुफिया पुलिस को भंग कर दिया गया था. मिस्र के समाज में भी खुशी की लहर दौड़ गई थी.

एक गायक ने गीत लिखा जिसके बोल थे बहुत हो चुका, अब मेरे फोन टैप नहीं होंगे, हम अब डर के साये में नहीं रहेंगे..

लेकिन क्या ये आशावादिता सही थी?

सुरक्षा दफ्तरों में घुसने के बाद एक साल से ज्यादा वक्त हो गया है लेकिन सिवाए उन फाइलों को जो कार्यकर्ता वहां से उड़ा ले आए, बाकी सभी दस्तावेज अभी भी सेना के पास हैं.

किसी को पता नहीं कि उन दस्तावेजों को उजागर किया भी जाएगा या नहीं.

और इससे काहिरा में लोगों में गुस्सा बढ़ रहा है.

कुछ दिनों पहले ही एक युवक सड़कों पर तस्वीरें उतार रहा था तो उसे अगवा कर लिया गया. छह घंटो बाद जब उसे छोड़ा गया तो उसने कहा कि उसे खुफिया पुलिस लेकर गई थी.

गलत रिपोर्ट

71 साल के मोहमम्द अब्दुल हकीम पत्रकार है और पिछले साल मार्च में वो भी सुरक्षा दफ्तर तोड़कर अंदर गए थे.

लोगों में गुस्सा है कि उनके बारे में गलत जानकारियां पुलिस की फाइलों में लिखी गई

वहां से वो एक अनोखी चीज़ लेकर लौटे- पुलिस द्वारा बनाई गई उनकी अपनी खुफिया फाइल .

मोहम्मद कहते हैं, "फाइल में उन्होंने लिखा की राष्ट्रपति सादत की हत्या के बाद मैं और मेरा परिवार बहुत खुश हुआ था. ये सही नहीं है.

आगे लिखते हैं कि मैं बाद में दक्षिण लेबनान चला गया जहां मै एक सैन्य दल के साथ जुड़ गया और उनका नेतृत्व किया. ये भी गलत है. मैं कभी भी लेबनान नहीं गया और बंदूक चलाना तो मुझे आता ही नहीं.

दरअसल मोहम्मद हकीम चालीस साल पहले अमरीका चले गए थे और वहां से वापस तभी लौटे जब मुबारक ने सत्ता छोड़ दी थी.

इस संबंध में गृह मंत्रालय और सत्ताधारी सैन्य परिषद ने कोई भी टिपण्णी नहीं दी.

लेकिन खुफिया पुलिस के पूर्व उपाध्यक्ष फावद आलम बात करने को राज़ी हुए.

वकालत

हैरानी की बाद है कि आलम भी खुफिया पुलिस के दस्तावेजों को उजागर करने की वकालत करते हैं.

आलम कहते हैं, "मिस्र के लोगों को अपना इतिहास जानना जरूरी है ताकि वो अपनी गलतियों को न दोहराए. लेकिन मुझे नहीं लगता कि ये फाइल कभी बाहर आएंगी."

ऐसे हालात में होसाम जैसे कार्यकर्ताओं ने अपने हाथों में ही जिम्मेवारी ली है. उन्होंने पिगिपीडिया नाम की वेबसाइट खोली है जहां वो खुफिया पुलिस अधिकारियों की तस्वीरे लगा रहे हैं.

इन कार्यकर्ताओं को उम्मीद है कि सरकार कुछ कदम उठाएगी और उन्हें इंसाफ मिलेगा.

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