तालिबान के हमले का संदेश: राजनीतिक सहमति जरूरी

 सोमवार, 16 अप्रैल, 2012 को 17:15 IST तक के समाचार

अफगानिस्तान में सितंबर 2011 के अमरीकी दूतावास के हमले के बाद ये सबसे बड़ा हमला था

अफगानिस्तान की राजधानी काबुल और तीन अन्य प्रांतों में रविवार को पूर्वसंयोजित तरीके से हुए हमलों से संकेत मिलते हैं कि विद्रोही कितने तालमेल के साथ काम कर रहे हैं.

तालिबान और उसके समर्थकों का तर्क होगा कि वो ऐसी कार्रवाई को अंजाम दे पाए - और वो भी काबुल में - दर्शाता है कि काबुल में सुरक्षा स्थिति कितनी बद्तर है.क्लिक करें

इसी तरह अफगान सरकार और उसके नेटो सहयोगियों ने अफगान सुरक्षाकर्मियों की कारगुजारी की सराहना की है.

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पर्यवेक्षकों का कहना है कि अपनी कार्रवाई में अफगान सुरक्षा बलों को नेटो हेलिकॉप्टरों और विशेष दस्तों से मदद लेनी पड़ी.

संदेश: नेटो की मदद उपलब्ध रहे

"कुल मिलाकर देखा जाए तो ये स्पष्ट होता है कि ताकत के दम पर कुछ खास हासिल होने वाला नहीं है. इससे ये भी संदेश मिलता है कि यदि अफगानिस्तान का कोई भविष्य संभव है तो उसे राजनीतिक सहमति से ही सुनिश्चित करना होगा - लेकिन वो क्षितिज पर कहीं दूर ही नजर आती है"

जोनाथन मार्कस, रक्षा और कूटनीतिक मामलों के संवाददाता

कई सैन्य पर्यवेक्षक कहेंगे कि रविवार के हमले का असली संदेश ये है कि नेटो की मदद अफगान सुरक्षा बलों को उपलब्ध रहनी चाहिए जब तक वे खुद को सक्षम नहीं महसूस करते हैं.

इस तरह कुल मिलाकर हर कोई सितंबर 2011 को अमरीकी दूतावास पर हुए हमले के बाद रविवार को काबुल में हुए सबसे खतरनाक हमले से वो निर्णय करेगा जो उसे फायदेमंद लगता है.

अपने आप से कुछ नहीं बदला है.

विद्रोहियों ने कोई महत्वपूर्ण नई क्षमता नहीं दिखाई है.

कुछ लोगों का कहना है कि इस हमले में हक्कानी नेटवर्क की कार्रवाई की झलक मिलती है. हक्कानी नेटवर्क तालिबान की एक ऐसी शाखा है जिसके अधिकतर सदस्य पाकिस्तान में स्थित है.

यदि ये सच साबित होता है तो ये अमरीका-पाकिस्तान के रिश्तों में एक और कांटा होगा.

लेकिन कुल मिलाकर देखा जाए तो ये स्पष्ट होता है कि ताकत के दम पर कुछ खास हासिल होने वाला नहीं है.

इससे ये भी संदेश मिलता है कि यदि अफगानिस्तान का कोई भविष्य संभव है तो उसे राजनीतिक सहमति से ही सुनिश्चित करना होगा - लेकिन वो क्षितिज पर कहीं दूर ही नजर आती है.

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