बर्मा उपचुनावों में आंग सान सू ची जीतीं

 रविवार, 1 अप्रैल, 2012 को 17:34 IST तक के समाचार

बर्मा में आंग सान सू ची की पार्टी का कहना है कि सू ची संसद के लिए हुए उपचुनावों में जीत गई हैं.

उपचुनावों में 45 सीटों के लिए मतदान हुआ था और उसके तुरंत बाद मतगणना हुई थी. हालांकि अभी अधिकारियों ने सू ची की जीत की पुष्टि नहीं की है लेकिन पार्टी का कहना है कि सू ची को जीत मिली है.

सू ची कावमू से चुनाव लड़ रही थीं. सू ची की पार्टी 1990 के बाद पहली बार चुनाव लड़ रही हैं.

आंग सान सू ची की नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) सभी 45 सीटों पर चुनावी मैदान पर है. 1990 के बाद से पहली बार पार्टी चुनाव लड़ रही है.
पहली बार विदेशी पर्यवेक्षकों और पत्रकारों को इतने बड़े पैमाने पर चुनाव को इतने करीब से देखने की अनुमति दी गई. आसियान, यूरोपीय संघ और अमरीका से कुछ प्रतिनिधियों को मतदान की निगरानी के लिए निमंत्रित किया गया था.

भारतीय विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता के मुताबिक भारत ने चुनाव आयोग के दो वरिष्ठ अधिकारी और भारतीय राजदूत को मतदान पर निगरानी रखने के लिए भेजा था. प्रवक्ता के अनुसार बर्मा में भारत के राजदूत वीएस शेषाद्री, असम के मुख्य चुनाव आयुक्त मनिंदर सिंह और मणिपुर के मुख्य चुनाव आयुक्त पीसी लामकुंगा मतदान पर नजर रख रहे हैं.

सू ची मतदान में गड़बड़ियों की आशंका जता चुकी हैं. आंग सान सू ची ने शुक्रवार को कहा था कि उप-चुनावों में अनियमितताएं हो सकती हैं.
उनकी पार्टी ने कहा था कि आंग सान सू ची के चुनाव क्षेत्र में सैंकड़ों मृत लोगों के नाम चुनाव सूची में दर्ज हैं जबकि कम से 1300 जीवित लोगों के नाम सूची से गायब हैं.

बर्मा की नेशनल लीग ऑफ़ डेमोक्रेसी की नेता के रंगून के दक्षिण-पश्चिम में स्थित कावमू नाम की सीट पर जीतने की संभावना है.

अहम चुनाव

कहने को केवल 45 सीटों पर ही मतदान हुआ है लेकिन इन उप-चुनावों को बर्मा की राजनीतिक सुधारों की यात्रा में एक मील का पत्थर माना जा रहा है. ये चुनाव सेना समर्थित सरकार के सत्ता में आने के एक साल बाद हुए हैं.

अगर ऐसा माना जाता है कि ये चुनाव निष्पक्ष तरीके से हुए हैं तो यूरोपीय संघ कह चुका है कि वो बर्मा पर से कुछ प्रतिबंध हटा सकता है. यानी इन चुनावों को लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति बर्मा सरकार की प्रतिबद्वता का संकेत माना जाएगा.

आंग सान सू ची साल 1990 से अपने घर में नज़रबंद रही थीं. उसी वर्ष उनकी पार्टी ने चुनावों में प्रचंड बहुमत हासिल किया था. लेकिन सेना ने उनकी पार्टी को सत्तारूढ़ नहीं होने दिया था.

सू ची की नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी ने साल 2010 में हुए चुनावों का बहिष्कार किया था. उन चुनावों के बाद सैन्य प्रशासकों के स्थान पर सेना समर्थित राष्ट्रपति थीन सेन की सरकार अस्तित्व में आई थी.

इन चुनावों के बाद नवंबर 2010 में आंग सान सू ची को नज़रबंदी से रिहा कर दिया गया था. वे कावमू नाम के ग्रामीण कस्बे से चुनाव लड़ी हैं.
साल 2008 में रंगून और इरावदी डेल्टा में आए नर्गिस नाम के चक्रवात में कावमू सबसे अधिक प्रभावितों होने वाले कस्बों में से एक था.

ये लगभग तय है कि उपचुनावों के बाद वे संसद में पहुंचेंगीं और उनकी पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी बर्मा आधिकारिक विपक्ष का स्थान लेगी.
ये उपचुनाव ऐसे दौर में हो रहे हैं जब पश्चिमी देश एक बार फिर बर्मा के साथ संबंध स्थापित कर रहे हैं.

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