तैयार है 'दर्द-रहित' इंजेक्शन

 रविवार, 25 मार्च, 2012 को 05:31 IST तक के समाचार
सुई

नए यंत्र के इस्तेमाल से दर्द का एहसास नहीं होगा.

हममें से शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा हो जो ये न चाहे कि उसे सुई लगवाते वक्त दर्द न हो.

त्वचा को भेदती हुई सुई के शरीर में प्रवेश करने का विचार किसी को भी नहीं भाता, न ही ये उन चिकित्सकों को अच्छा लगता है जिन्हें सुई से डरने वाले मरीजों से दो चार होना पड़ता है.

वैज्ञानिक इस समस्या पर लंबे समय से काम कर रहे हैं. लेकिन ब्रिटेन के सोमरसेट में रहने वाले एक युवा ब्रिटिश आविष्कारक ने शायद इसका हल ढ़ूढ़ लिया है.

ओलिवर ब्लैकवेल ने जो यंत्र बनाया है वो किसी भी आम सिरिंज की तरह ही दिखता है लेकिन दोनों में एक खास फर्क है.

इस सिरिंज में एक छोटी सुई भी है जो पहले लोकल एनस्थिसिया देकर इंजेक्शन वाली जगह को सुन्न कर देता है, इसलिए जब बड़ी सुई त्वचा में जाती है तो दर्द का अहसास नहीं होता.

यानी, सिरिंज में दो सुईयां हैं - पहली छोटी सुई जिसमें एनस्थिसिया होता है उससे कोई दर्द नहीं होता, और दूसरी सुई के लगते वक्त तक वो जगह सु्न्न हो चुकी होती है.

मक्खी

ओलिवर ब्लैकवेल का कहना है कि पहली सुई का अहसास ठीक उतना ही होता है जैसे आपकी हथेली पर कोई मक्खी बैठ रही हो.

ओलिवर ब्लैकवेल के अनुसार उनके आविष्कार से चिकित्सा क्षेत्र में काम कर रहे हजारों लोगों को मदद मिलेगी. इस नई तरह की सुई का इस्तेमाल करने से इलाज के दौरान उन चिकित्सकों ना सिर्फ काफी सहूलियत होगी बल्कि संक्रमण और गड़बड़ी से भी बचा जा सकेगा.

इस समय किसी भी मरीज़ को एनसथिसिया देने के लिए अलग से एक इंजेक्शन लगाना पड़ता है जिसके लिए दोहरी तैयारी और मेहनत दरकार होती है.

ब्लैकवेल ने ये सुई विशेषज्ञों, दो चिकित्सकों और रॉयल कॉलेज ऑफ एनसथेटिस्ट्स के पूर्व निदेशक की मदद से बनाई है.

"इस सिरिंज में एक छोटी सुई भी है जो पहले लोकल एनस्थिसिया देकर इंजेक्शन वाली जगह को सुन्न कर देती है, इसलिए जब बड़ी सुई त्वचा में जाती है तो दर्द का अहसास नहीं होता, यानी, सिरिंज में दो सुईयां हैं - पहली छोटी सुई जिसमें एनस्थिसिया होता है उससे कोई दर्द नहीं होता, और दूसरी सुई के लगते वक्त तक वो जगह सु्न्न हो चुकी होती है."

सेल्फ वैक्सिनेशन

लंदन के रॉयल फ्री हॉस्पिटल के वरिष्ठ एनस्थेटिस्ट डॉ एलन मैकग्लेनन कहते हैं,''सुई लगवाना किसी को भी पसंद नहीं है लेकिन मेरा काम कुछ ऐसा है कि मुझे किसी ना किसी को ये दर्द देना ही पड़ता है.''

मैक्गलेनन आगे कहते हैं,''मुझे हर हफ्ते कोई एक ऐसा ऐसा आदमी ज़रुर मिलता है, जिसका रक्तचाप सुई लगवाने के डर से ही बढ़ जाता है और 12 साल से कम उम्र के बच्चें तो खासकर सुई का नाम सुनकर ही सहम जाते हैं.''

लेकिन इस पूरे मामले में सच्चाई कम और अवधारणा ज्य़ादा असर करती है क्योंकि कई लोगों में सुई लगवाने का डर मनोवैज्ञानिक होता है.

कई साल पहले जापान के कुछ वैज्ञानिकों ने एक ऐसी छोटी सीरिंज का आविष्कार करने का दावा किया था जिसके इस्तेमाल से बिना दर्द के इंजेक्शन दिए जा सकते थे.

ये उन लोगों के लिए बड़ी राहत की खबर थी जो मधुमेह जैसी बीमारी से पीड़ित थे और जिन्हें रोज़ इनसुलिन का इंजेक्शन लेना पड़ता था.

जांच

ब्रिटेन के परोपकार संगठन 'चैरिटी डायबीटीज़' के मुताबिक वहां डॉक्टर की सलाह पर मरीज़ों को सुई रहित उपकरण दिया जाता है.

'इनसुजेट' नाम का ये उपकरण उन लोगों के लिए बनाया गया है जो सुई लगवाने से डरते हैं.

ब्लैकवेल का आविष्कार कई तरह की जांच के गुज़र चुका है, इसके बावजूद उसे अभी कई और परीक्षण से गुज़रना होगी तभी जाकर बड़े पैमाने पर इसका उत्पादन संभव हो सकेगा.

ब्लैकवेल को इससे पहले डिज़ाईन के लिए पुरस्कार मिल चुका है और वे कई तरह के नई आविष्कारों पर काम कर रहे हैं, जिनमें कृषि से लेकर बिजली और चिकित्सीय उपकरण शामिल हैं.

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