जैसा हिंदुस्तान, वैसा ही है रूस भी

 शुक्रवार, 2 मार्च, 2012 को 05:20 IST तक के समाचार

रूस में चुनाव से पहले पुतिन-विरोधी प्रदर्शन चल रहे हैं

भारत में भ्रष्टाचार का मुद्दा पिछले साल जिस तरह चर्चा में रहा था, वैसी ही गूंज रूस में अब सुनने को मिल रही है.

हज़ारों लोग यहां चुनाव से पहले प्रधानमंत्री व्लादिमिर पुतिन के खिलाफ नारे लगा रहे हैं. वे जानते हैं कि चुनाव व्लादिमिर ही जीतेंगें, लेकिन अपरिहार्य को चुनौती देने से कतरा नहीं रहे हैं.

बात साफ है – चार तारीख को राष्ट्रपति पद के चुनाव में पुतिन को हराना है. 59 वर्षीय व्लादिमिर पुतिन साल 2000 से 2008 तक रूस के राष्ट्रपति थे, और पिछले चार सालों से प्रधानमंत्री के पद पर बने हुए हैं.

रविवार के चुनाव में वे फिर से उम्मीदवार बन चुके हैं और उन्हीं को हराने के लिए हज़ारों की संख्या में लोग सड़कों पर उतरे हैं.

पुतिन के विरोध में इतने लोग क्यों सड़क पर उतर आए? वजह समझने के लिए मैंने मोर्चे के सामने खड़ी एक कामकाजी महिला ओल्गा से बातचीत की.

ओल्गा का कहना था, “बच्चों का स्कूल में दाखिला करवाने के लिए बहुत से पैसे की ज़रूरत होती है. आमतौर पर स्कूली दाखिले के लिए एक लंबी वेटिंग लिस्ट होती है. लेकिन अगर आप मोटी घूस दें, तो आपके बच्चे का दाखिला आराम से हो सकता है.”

भ्रष्टाचार से त्रस्त

"बच्चों का स्कूल में दाखिला करवाने के लिए बहुत से पैसे की ज़रूरत होती है. आमतौर पर स्कूली दाखिले के लिए एक लंबी वेटिंग लिस्ट होती है. लेकिन अगर आप मोटी घूस दें, तो आपके बच्चे का दाखिला आराम से हो सकता है."

ओल्गा, रूसी नागरिक

ओल्गा की समस्या बच्चों को स्कूल में दाखिला करवाने की है. वे उलझन में हैं कि रूस में आज प्राथमिक शिक्षा मुफ़्त कैसे नहीं है.

जबकि ओल्गा जब बड़ी हो रही थी, तब सोवियत संघ में शिक्षा के लिए घूस खिलाने की ज़रूरत नहीं होती थी और शिक्षा पूरी तरह से मुफ्त थी.

पास ही एक कॉफी शॉप में मैंने 23 साल के मैक्स गॉर्बचेव से भी बात की. मैक्स अंतरराष्ट्रीय संबंधों के छात्र हैं.

मैक्स का कहना था, “एक बार मुझे एक डॉक्टर के पास जाना था और मैं बहुत जल्दी में था. वहां लंबी कतार लगी हुई थी, लेकिन मैंने सभी लोगों से आगे जाकर डॉक्टर को 2000 रुबल दिए और अपना इलाज करवाया. वो डॉक्टर मेरे पिताजी का दोस्त था. मैं जानता हूं ये सही नहीं था, लेकिन मुझे ऐसा करना पड़ा.”

इसी कॉफी शॉप में एक बहुराष्ट्रीय परफ्यूम कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मुझसे मिलने आए.

इनका नाम एरिक बेचेनिट है. ये वोटर तो नहीं हैं, लेकिन ये कई सालों से मॉस्को में बिज़नेस करते हैं.

विरोध या स्वीकार्यता?

प्रॉफेसर विक्टर क्रेमेन्यक को लगता है कि शहरों में पुतिन का दबदबा खत्म होता जा रहा है

स्विट्ज़रलैंड के नागरिक एरिक ने हमें बताया कि मॉस्को में बिज़नेस चलाने में किस तरह की दिक्कतें आती हैं.

उन्होंने मुझे बताया, “मैं 15 साल पहले यहां आया था और उस समय यहां सड़कों पर कई गुंडे-मवाली होते थे. सरकारी दफ्तरों में हर काम के लिए अधिकारी घूस मांगते थे. अगर मुझे अपनी कंपनी के लिए मशीनें आयात करवानी होती थी, तो मुझे उन्हें मोटा पैसा देना पड़ता था और उसके बाद भी मुझे महीनों का इंतज़ार करना पड़ता था. आजकल रूस में बिना घूस दिए कोई काम नहीं हो सकता.”

आम नागरिक हो या जाने-माने व्यापारी, सब घूसखोरी या भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं. जैसी परिस्थिति हिंदुस्तान में है, वैसी ही रूस में भी.

लेकिन इतने विरोध के बावजूद भी इस बात की पूरी संभावना है कि व्लादिमिर पुतिन ये चुनाव जीत जाएंगें.

हांलाकि जनमत समीक्षा गलत भी होती है. लेकिन रुस में वो ज़्यादातर सही होती है.

हर समीक्षा में राष्ट्रपति पुतिन की लोकप्रियता 65 प्रतिशत से ऊपर है.

सिर्फ यही नहीं, राष्ट्रपति पुतिन के विरोधी भी ये मानते हैं कि पुतिन की लड़ाई अपने आप से ही है.

रुसी या भारतीय बाहुबली?

"पुतिन बड़े शहरों में तो चुनाव हार जाएंगें, क्योंकि बड़े शहरों में लोगों की सोच नए मध्यम-वर्गीय तबके से प्रभावित है. लेकिन छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में उनकी एक अलग ही छवि है. जो भी गांव वाले उनसे मांगते हैं, वे उन्हें दे देते हैं. अगर वो एक ब्रिज बनाने के लिए पैसे मांगते हैं, तो पुतिन बिना सोचे उन्हें तुरंत पैसा दे देते हैं."

प्रॉफेसर विक्टर क्रेमेन्यक, समाज शास्त्री

रुस के जाने-माने समाज शास्त्री और पुतिन के विरोधी प्रॉफेसर विक्टर क्रेमेन्यक ने जो कारण हमें बताया, उससे लगा कि पुतिन रूस के नहीं, उत्तरी भारत के कोई बाहुबली हैं.

विक्टर ने कहा, “पुतिन बड़े शहरों में तो चुनाव हार जाएंगें, क्योंकि बड़े शहरों में लोगों की सोच नए मध्यम-वर्गीय तबके से प्रभावित है. लेकिन छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों में उनकी एक अलग ही छवि है. जो भी गांव वाले उनसे मांगते हैं, वे उन्हें दे देते हैं. अगर वो एक ब्रिज बनाने के लिए पैसे मांगते हैं, तो पुतिन बिना सोचे उन्हें तुरंत पैसा दे देते हैं.”

प्रॉफेसर क्रेमेन्यक के साथ बातचीत में काफी वक्त गुज़रा. जब हम कॉफी शॉप से बाहर निकले तो देखा कि रेवोल्यूशन स्क्वेयर में प्रदर्शन खत्म हो चुका था.

प्रदर्शनकारी स्क्वेयर में गाना बजा कर नाच रहे थे.

मुझे कोलकाता में बिताए अपने कॉलेज के दिन याद आ गए. वहां पर कम्युनिस्ट पार्टी यानि सापीआई-एम के खिलाफ नारेबाज़ी करके जब छात्र थक जाते थे, तब ऐसे ही गाना-बजाना कर लेते थे.

लेकिन उसके बाद भी पश्चिम बंगाल में कम्युनिस्ट सरकार 34 साल रही. शायद यहां भी राष्ट्रपति पुतिन और प्रदर्शनकारियों में वैसा ही नफरत और मजबूरी का रिश्ता दिखता है.

जो भी हो, इस बार का चुनाव देखने लायक होगा. कुछ यही सोचते हुए मैं निकल पड़ा अपने होटल की तरफ. मुझे रात की आखिरी ट्रेन जो पकड़नी थी.

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