इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें तो पता चलता है कि 25 फ़रवरी के दिन कई अहम घटनाएं हुई थीं.
1956: क्रुश्चेव ने स्टालिन की घोर निंदा की

क्रुश्चेव के इस भाषण के बारे में सोवियत संघ में लोगों को पहली बार 22 वर्षों के बाद 1988 में पता चला था.
आज ही के दिन 1956 में तत्कालीन सोवियत संघ के नेता निकिता क्रुश्चेव ने जॉसेफ़ स्टालिन की जमकर आलोचना की थी. क्रुश्चेव ने उन्हें एक क्रूर तानाशाह क़रार दिया था.
कम्युनिस्ट पार्टी की 20वीं कांग्रेस को संबोधित करते हुए क्रुश्चेव ने स्टालिन के कार्यकाल के बारे में कहा था, ''स्टालिन का दौर शक, भय और आतंक का दौर था.''
सोवियत संघ के पूर्व नेता स्टालिन की तीन साल पहले यानी 1953 में मौत हो गई थी.
क्रुश्चेव ने कहा कि वो चाहते हैं कि पिछले 30 वर्षों से स्टालिन के आभामंडल से प्रभावित सोवियत संघ की जनता उससे बाहर निकले.
उन्होंने इसका भी विस्तार से वर्णन किया कि किस तरह से 193-38 के दौरान कई लोगों की हत्या की गई थी. क्रुश्चेव के अनुसार वे सारी हत्याएं स्टालिन की शह पर की गई थी.
क्रुश्चेव के अनुसार 1937-38 के बीच पार्टी की केंद्रीय समिति के 139 सदस्यों में से 98 की हत्या सीधे तौर पर स्टालिन के आदेश पर हुई थी.
उन्होंने दूसरे विश्व युद्घ के दौरान स्टालिन की विदेश नीति की भी जमकर आलोचना की.
उनके अनुसार हिटलर के सहयोगी होने के कारण स्टालिन ने ये मानने से इनकार कर दिया था कि जर्मनी भी रूस पर हमला कर सकता है हालाकिन उन्हें इस बारे में कई बार सूचनाएं दी गई थी.
उन्होंने ये भी कहा कि लेनिन अपनी आख़िरी वसीयत में नहीं चाहते थे कि स्टालिन पार्टी के महासचिव बने रहें.
1994: यहूदी युवक ने 30 फलस्तीनियों को गोली से भून डाला

हेबरॉन की इस घटना के बाद शांति वार्ता पर भी गहरा असर पड़ा था.
आज ही के दिन 1994 में एक यहूदी युवक ने हेबरॉन मस्जिद में गोलियों से 30 फ़लस्तीनियों को भून डाला था.
अमरीका में पैदा हुए 38 साल के बरूच गोल्डेस्टाइन मस्जिद मे दाख़िल हुए और वहां मौजूद लोगों पर लगभग 100 राउंड गोलियां चलाई.
मस्जिद में लोग उस समय सुबह की नमाज़ पढ़ने के लिए जमा हुए थे और रमज़ान के पवित्र महीना होने के कारण वहां लगभग 800 लोग मौजूद थे.
चश्मदीदों के अनुसार बरूच के पास एके-47 की तरह ही एक इसराइली रायफल थी और लगभग दस मिनटों तक वो गोलियां चलाते रहें.
जब गोलियां चलनी बंद हुईं तो बरूच गोल्डेस्टाइन भी मरे हुए पाए गए.
इस ख़बर के आने के बाद से लोग अस्पताल पहुंचने लगे ताकि अपने परिजनों के बारे में पता कर सकें.
थोड़ी देर के बाद गुस्साई भीड़ ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया.
भीड़ को नियंत्रित करने के लिए इसराइली सेना ने उन पर फ़ायरिंग कर दी जिसमें 12 फ़लस्तीनी मारे गए थे.

















