'अंकल मेरे पापा को नौकरी दिला दो...'

 बुधवार, 22 फ़रवरी, 2012 को 05:46 IST तक के समाचार
तरुण

तरुण और उसके पिता दोनों के पास चाह कर भी करने के लिए कुछ नहीं है

कानपुर की सुदर्शन हरिजन बस्ती. कई घरों पर राजनीतिक पार्टियों के झंडे लहरा रहे हैं. क्या बसपा, क्या सपा, क्या भाजपा और क्या कांग्रेस. किसी के कम किसी के ज़्यादा, लेकिन सभी प्रमुख पार्टियाँ अपने लहराते झंडों के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है.

सड़क सँकरी है और दोनों ओर मकान माचिस के डब्बे की तरह लगते हैं. एक से सटे एक और एक के ऊपर एक. लोगों से बातचीत का सिलसिला शुरू ही हुआ कि भीड़ जमा हो गई.

लोगों ने अपनी समस्याएँ खुल कर बताईं. सड़कें अच्छी नहीं, साफ़-सफ़ाई नहीं. मोहल्ले में बहुत कुछ काम बाक़ी है. इस बस्ती में कई युवा इधर-उधर घूमते नज़र आए, जैसे उन्हें कोई काम नहीं.

अभी लोगों से मेरी बात हो ही रही थी कि एक आठ साल का बच्चा मेरे पास आया और मेरी अंगुली खींचते हुए बोला- अंकल मुझे भी आपसे बात करनी है. अंकल, मुझे भी कुछ बोलना है.

"पापा नौकरी नहीं करते. माँ बंगले पर काम करती है. घर में मैं हूँ और मेरी बहन. पढ़ाई नहीं कर पाता, क्योंकि पढ़ाई के पैसे नहीं हैं. इसी तरह मोहल्ल में घूमता-फिरता खेलता-कूदता रहता हूँ"

तरुण

मैं किसी और से बात कर रहा था, लेकिन जब मैंने उस बच्चे की ओर देखा, तो पता नहीं क्यों दिल धड़क उठा. क्या कहना चाहता है ये छोटा बच्चा.....क्या इसे राजनीति की समझ है, क्या इसे मायावती या मुलायम में रुचि है? कई सवाल मेरे मन में थे.

जब मैंने उस बच्चे की ओर रुख़ किया तो उस बच्चे ने पहली बार में सिर्फ़ दो पंक्ति बोली- अंकल, अंकल, मेरे पापा को नौकरी दिला दो.

पता नहीं क्यों उस मासूम बच्चे के ये वाक्य काफ़ी देर तक मेरी कानों में गूँजते रहे. क्या होगी उसके घर की हालत, जो ये बच्चा अपने पापा के लिए इस तरह नौकरी मांग रहा है.

जब आगे का सवाल पूछने की कोशिश की, तो पहले तो तरुण नाम का ये बच्चा सकुचाया, फिर बोला- पापा नौकरी नहीं करते. माँ बंगले पर काम करती है. घर में मैं हूँ और मेरी बहन. पढ़ाई नहीं कर पाता, क्योंकि पढ़ाई के पैसे नहीं हैं. इसी तरह मोहल्ल में घूमता-फिरता खेलता-कूदता रहता हूँ.

जाते-जाते फिर बोल गया- मैं सिर्फ़ ये कहना चाहता हूँ कि मेरे पिता को नौकरी मिल जाए, बस मैं जा रहा हूँ.....

मैंने उसके पिता से मिलने की इच्छा जताई, तो जवाब मिला कि वो सुबह-सबेरे अपने घर से निकल जाते हैं. शायद नौकरी की तलाश में.

मुझे पता नहीं, इस बच्चे की मुराद कब पूरी होगी. लेकिन तरुण की ये पंक्तियाँ शायद ही मेरा पीछा करना कभी छोड़े.

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