बिहार के 'ग्लोबल मीट' में नेपाल के प्रधानमंत्री

 शनिवार, 18 फ़रवरी, 2012 को 04:52 IST तक के समाचार
बिहार ग्लोबल मीट

नेपाल के प्रधानंत्री बाबूराम भट्टाराई ने बिहार ग्लोबल मीट का उद्घाटन किया.

नेपाल के प्रधानमंत्री बाबूराम भट्टराई ने 'बदलता हुआ बिहार' विषय पर शुक्रवार को पटना में आयोजित तीन दिनों के वैश्विक सम्मलेन (ग्लोबल मीट) का उद्घाटन किया.

इस मौक़े पर उन्होंने बिहार और नेपाल के घुले-मिले सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक बंधन को राजनीतिक सीमा- बंधन से अधिक मज़बूत बताया.

साथ ही ये भी कहा कि नेपाल की विशाल पनबिजली क्षमता को परस्पर लाभ में बदलने और पर्यटन क्षेत्र में भी मिलजुल कर निवेश करने की पहल दोनों पड़ोसियों को करनी चाहिए.

सम्मलेन में नेपाल की पर्यटन और परिवहन मंत्री सरिता गिरि, मॉरिशस के कला-संस्कृति मंत्री मुक्तेश्वर चुन्नी, भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर डी सुब्बाराव, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलुवालिया, जानेमाने अर्थशास्त्री प्रोफ़ेसर निकोलस स्टर्न और मेघनाद देसाई के अलावा देश-विदेश के कई शोधकर्ता और विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ मौजूद थे.

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उद्घाटन सत्र में ही ये स्पष्ट कर दिया कि यह 'ग्लोबल मीट' किसी निवेश के लिए नहीं, बल्कि बदलते बिहार में विकास के कारगर उपाय तलाशने के मक्सद से आयोजित हुआ है.

"नेपाल की विशाल पनबिजली क्षमता को परस्पर लाभ में बदलने और पर्यटन क्षेत्र में भी मिलजुल कर निवेश करने की पहल दोनों पड़ोसियों को करनी चाहिए."

बाबूराम भट्टाराई, नेपाल के प्रधानमंत्री

डी सुब्बाराव ने कहा, ''अगर बिहार में कृषि क्षेत्र की तरक्क़ी पर ज़्यादा ध्यान दिया जाय और उद्योग की तरफ़ भी वैसा ही रुझान हो, तो ऐसे माहौल में बैंकों का ऋण-जमा अनुपात यहाँ अपने आप बढेगा. वैसे, बिहार में खेती के लिए ऋण देने में कमर्शियल बैंकों की शिथिलता पर 'आरबीआइ' ने सख्ती दिखाई है.''

क़ानून-व्यवस्था

प्रोफ़ेसर निकोलस स्टर्न का कहना था, ''निवेश का वातावरण बिहार में तभी बनेगा, जब यहाँ क़ानून-व्यवस्था ठीक होने का पूरा भरोसा पैदा हो जाय. साथ ही इस राज्य के ग्रामीण इलाक़े में खेती की उखड़ती जड़ें फिर से मज़बूत हो जाने पर ही राज्य का तेज़ी से विकास हो सकेगा.''

मोंटेक सिंह अहलुवालिया ने बिहार के लिए विशेष केन्द्रीय मदद को ज़रूरी बताया, लेकिन ये भी कहा कि इसके लिए विशेष राज्य का दर्जा ही एकमात्र उपाय नहीं है.

उन्होंने केंद्र की कुछ ग़ैरज़रूरी योजनाओं का बोझ राज्यों पर से हटाने और नक़द अनुदान (कैश सब्सीडी) की व्यवस्था लागू करने संबंधी सुझावों को विचारणीय माना.

तीन दिनों के इस सम्मलेन में विभिन्न विषयों पर सौ से अधिक वक्ताओं के भाषण, सैकड़ों डेलिगेट्स के लिए आवासन, महाभोज और मनोरंजन की व्यवस्था है.

राज्य सरकार तीन करोड़ रूपए इस आयोजन पर ख़र्च कर रही है और इसके औचित्य पर उठ रहे तीखे सवालों को झेल भी रही है.

सबसे कड़वा सवाल यह है कि पांच साल पहले वाले 'ग्लोबल मीट' के निरर्थक सिद्ध होने के बावजूद फिर से महज़ बौद्धिक बहस के लिए इतना ख़र्चीला 'ग्लोबल मीट' क्यों ?

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