'मुसलमान डरा हुआ है कुछ बोलेगा नहीं'

 रविवार, 22 अप्रैल, 2012 को 13:43 IST तक के समाचार
गोधरा का पलोन बाज़ार

गोधरा में पलोन बाज़ार के केसरी चौक में 2005 के बाद हर दिन तिरंगा फहराया जाता है.

गोधरा में अगर कोई कुछ न कहे तो समझिए वो बहुत कुछ कहना चाहता है.

यहां रिपोर्टिंग के लिए बहुत कुछ लोगों की आंखों में पढ़ना पड़ता है और बाक़ी इस तर्क में कि वो बात नहीं कर सकते.

गोधरा बंटा हुआ शहर है. हिंदू और मुस्लिमों के इलाक़ों में साफ-साफ बंटवारा है. मेरे ड्राईवर को जैसे ही पता चला मैं पत्रकार हूं और मुस्लिमों से मिलना चाहता हूं तो उसका पहला सवाल था- आप हिंदू हो या मुसलमान.

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दूसरा सवाल आप तो डब्बेश्वर महाराज को भी देखोगे. डब्बेश्वर महाराज यानी साबरमती एक्सप्रेस का जला हुआ डिब्बा.

मैंने कहा पहले लोगों से मिलूंगा.

मुस्लिम इलाक़े में प्रवेश करते ही ड्राईवर के दो शब्दों ने बहुत कुछ कह दिया- इधर हिंदुस्तान और आगे छोटा कराची है यानी मुसलमानों का इलाक़ा.

तिरंगा

मुस्लिम आबादी वाले पलोन बाज़ार इलाक़े में केसरी चौक है जहां 2005 के बाद हर दिन तिरंगा झंडा फहराया जाता है. झंडा पहराने का काम फ़ारुक़ केसरी का है जो नरेंद्र मोदी के पुरज़ोर समर्थक हैं.

'शुरूआत कैसी हुई'

"मेरा नाम मत छापना लेकिन असल बात ये है कि मुसलमान बहुत डरा हुआ है. इतना डरा हुआ है कि कुछ बोलेगा नहीं. मोदी जी विकास कर रहे हैं लेकिन शुरुआत कैसे हुई ये भी सोचिए."

गोधरा का एक मुसलमान

वो कहते हैं, ‘‘इधर लोगों का नाम बहुत बदनाम था तो 2005 में जो ज़िलाधीश थे उन्होंने कहा कि यहां तिरंगा फहराओ हर दिन ताकि आप लोग एक संदेश दे सको कि आप भी हिंदुस्तानी हो.’’

यह पूछे जाने पर कि क्या ये पलोन बाज़ार के मुसलमानों से हिंदुस्तानी होने का सर्टिफिकेट मांगे जाने जैसा नहीं है, वो कहते हैं, ‘‘नहीं नहीं इससे हम दिखाते हैं कि हम हिंदुस्तान का सम्मान करते हैं. यहां के हिंदुस्तानी हैं हम लोग सभी. मोदी जी बहुत अच्छा काम करते हैं.’’

फ़ारुक़ केसरी की बाइकों की दुकान है और वो गर्व से बताते हैं कि उनके 99 प्रतिशत ग्राहक हिंदू हैं.

फ़ारुक़ केसरी से बातचीत के दौरान वहीं सामने बैठा एक युवक मुस्कुराता रहा.

साबरमती एक्सप्रेस

साबरमती एक्सप्रेस का जला हुआ डिब्बा एस-6 जिसके बाद से गुजरात में दंगे शुरू हुए थे.

रिकार्डर बंद करते ही बोला, ‘‘मेरा नाम मत छापना लेकिन असल बात ये है कि मुसलमान बहुत डरा हुआ है. इतना डरा हुआ है कि कुछ बोलेगा नहीं. मोदी जी विकास कर रहे हैं लेकिन शुरुआत कैसे हुई ये भी सोचिए.’’

गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस का डिब्बा जलने के बाद शहर में दंगे तो नहीं हुए लेकिन आसपास के इलाक़ों में ज़बर्दस्त दंगे हुए थे जिसकी दहशत हर मुसलमान के चेहरे पर दिखती है.

रिकार्डर और कैमरा बंद होते ही ज़बान खुलती है और ये दोनों खुलते ही ज़ुबान बंद. उनकी आंखें बहुत कुछ कहती हैं लेकिन इन आंखों की ज़ुबान समझ पाना मुश्किल है.

यक़ीन

उधर विश्व हिंदू परिषद के स्थानीय नेता साफ़ साफ़ कहते हैं.

'अविश्वास का वातावरण'

"यहां का हिंदू गोधरा के मुसलमानों पर यक़ीन नहीं करता. दो महीने पहले एक हिंदू कन्या को मुसलमान लेकर गया था फिर हमने उसे छुड़ाया. सारे मुसलमान ऐसे नहीं हैं लेकिन ऐसे लोग हैं जो ग़लत काम करते हैं इसलिए विश्वास नहीं बन पाता है. यहां का घांची समुदाय राष्ट्रविरोधी है."

शंभू भाई शुक्ल, विहिप के प्रांत सहमंत्री

विहिप के प्रांत सहमंत्री शंभू भाई शुक्ल कहते हैं, ‘‘दोनों समुदायों के बीच रिश्ते सामान्य दिखाई देते हैं लेकिन अविश्वास का वातावरण है. यहां का हिंदू गोधरा के मुसलमानों पर यकीन नहीं करता. दो महीने पहले एक हिंदू कन्या को मुसलमान लेकर गया था फिर हमने उसे छुड़ाया. सारे मुसलमान ऐसे नहीं हैं लेकिन ऐसे लोग हैं जो ग़लत काम करते हैं इसलिए विश्वास नहीं बन पाता है. यहां का घांची समुदाय राष्ट्रविरोधी है.’’

गोधरा में 90 से अधिक लोगों को साबरमती एक्सप्रेस का डिब्बा जलाने की साज़िश में गिरफ्तार किया गया था जिसमें 63 लोग रिहा हो गए हैं. 31 अभी जेल में हैं जिनमें से कुछ को फांसी और कुछ को आजीवन कारावास की सज़ा मिली है.

लोगों से मुलाक़ात के बाद मुझे भी याद आई डब्बेश्वर महाराज यानी साबरमती एक्सप्रेस के जले हुए डिब्बे की.

स्टेशन से काफ़ी दूर सुनसान में खड़े इस डिब्बे के सही स्थान के बारे में एक स्थानीय पत्रकार से पूछा तो उसका जवाब था- अरे डब्बेश्वर महाराज, चलो मैं दिखा लाता हूं.

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