
अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने टो टूक शब्दों में भारतीय ओलंपिक संघ के डाओ केमिकल्स के विरोध को ख़ारिज कर दिया है
लंदन में होने वाले ओलंपिक के प्रायोजकों की सूची से डाओ केमिकल्स को हटाए जाने की भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए) की मांग को खारिज करते हुए अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) ने कहा है कि वर्ष 2000 तक तो डाओ केमिकल्स का यूनियन कार्बाइड से कोई संबंध ही नहीं था.
अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक संघ का कहना है कि डाओ केमिकल्स से उसके संबंध 30 वर्ष पुराने हैं. उसने कहा है,"जब डाओ के साथ पार्टनरशिप की बात हो रही थी तब हम भोपाल गैस त्रासदी के मामले से अवगत थे."
अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने भारतीय ओलंपिक संघ को दो टूक शब्दों में कह दिया है कि डाओ केमिकल्स को इस आयोजन से हटाया नहीं जा सकता है.
अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने कहा है कि वो 1984 में हुई भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों के लिए भारतीय ओलंपिक समिति की चिंता को समझते हैं लेकिन डाओ केमिकल्स का वर्ष 2000 तक यूनियन कार्बाइड में कोई मालिकाना हक़ नहीं था.
भारतीय ओलंपिक संघ ने बार-बार अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के सामने डाओ केमिकल्स को इस आयोजन का प्रायोजक बनाए जाने पर ऐतराज़ जताया है.
भारतीय ओलंपिक संघ का तर्क था कि इस समय डाओ केमिकल्स के पास भोपास गैस कांड के लिए दोषी यूनियन कार्बाइड का मालिकाना हक़ है इसलिए डाओ केमिकल्स को लंदन ओलंपिक के आयोजन से दूर रखा जाना चाहिए.
दो टूक जवाब
"सरकारें बहुराष्ट्रीय कंपनी के दबाव में काम कर रही हैं और अब ये भारत सरकार की नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है कि जो कंपनी भोपाल के लोगों की अपराधी है और अपनी जवाबदेही नहीं मानती, तब वे क्यों नहीं लंदन ओलंपिक्स के आयोजन का बहिष्कार करते हैं"
अब्दुल जब्बार, भोपाल गैस पीड़ितों के काम करने वाले समाजसेवी
भारतीय ओलंपिक संघ के कार्यकारी अध्यक्ष विजय कुमार मल्होत्रा को लिखे एक पत्र में अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के अध्यक्ष ज्याक रॉग ने कहा है, ''अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति मानती है कि साल 1984 में हुई भोपाल गैस त्रासदी भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए एक भयावह घटना थी. समिति इस हादसे में पीड़ित हुए परिवारों की तकलीफ़ों के लिए सहानुभूति प्रकट करती है और वहां के लोगों को अब तक जिस तकलीफ़ का सामना करना पड़ रहा है उसका हमें खेद है.''
रॉग के अनुसार, ''अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति और ओलंपिक एवं पैरालंपिक खेलों का आयोजन करने वाली लंदन आयोजन समिति को डाओ के साथ साझेदारी तय करने के दौरान भोपाल गैस त्रासदी की जानकारी थी. डाओ की यूनियन कार्बाइड में हादसे के 16 साल बाद तक और सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुआवज़े की रकम तय करने तक कोई हिस्सेदारी नहीं थी.''
रॉग कहते हैं, ''सुप्रीम कोर्ट ने इस फ़ैसले को 1991 और 2007 में दो बार बरकरार रखा है, हालांकि हम ये भी जानते हैं कि कोर्ट अब इस फ़ैसले पर तीसरी बार विचार कर रहा है और हम इसमें डाओ के अलावा सभी पार्टियों की संवेदनशीलता को समझते हैं.''
रॉग के अनुसार,''हम सिर्फ उन संस्थाओं के साथ साझेधारी करते हैं, जिनके बारे में हमें लगता है कि वे ओलंपिक के इस आयोजन से जुड़े मूल्यों के अनुसार काम करते हैं. डाओ पूरी दुनिया में काम कर रही एक अग्रणी कंपनी है और अपनी सभी व्यापारिक ज़िम्मदारियों का निर्वाह करती है. डाओ के पिछले 30 सालों से ओलंपिक आयोजनों से जुड़ने के बाद ओलंपिक खेलों की गुणवत्ता में काफी सुधार आया है.''
असंतुष्ट
भावनाएँ
"भारतीय ओलंपिक संघ, अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के जवाब से संतुष्ट नहीं है और हम चाहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति भारत के लोगों की भावनाओं को समझें और डाओ को लंदन ओलंपिक का प्रायोजक ना बनाएं"
विजय कुमार मल्होत्रा, कार्यवाहक अध्यक्ष- आईओए
रॉग के पत्र पर प्रतिक्रिया देते हुए भारतीय ओलंपिक संघ के कार्यकारी अध्यक्ष विजय कुमार मल्होत्रा ने कहा है, ''भारतीय ओलंपिक संघ, अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के जवाब से संतुष्ट नहीं है और हम चाहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति भारत के लोगों की भावनाओं को समझें और डाओ को लंदन ओलंपिक का प्रायोजक ना बनाएं.''
बीबीसी संवाददाता स्वाति अर्जुन से बात करते हुए विजय कुमार मल्होत्रा ने कहा,''अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के इस जवाब से हम निराश हैं क्योंकि डाओ केमिकल्स ने जब यूनियन कार्बाइड को ख़रीदा था तब वे इस कंपनी की संपत्ति और इसकी ज़िम्मेदारियों के बारे में ज़रूर जानते होंगे और इस कंपनी की भारत में ज़िम्मेदारी अभी खत्म नहीं हुई है, कंपनी पर अब भी भारत में मुकदमा चल रहा है.''
जबकि भोपाल में गैस पीड़ितों के हक के लिए लड़ाई लड़ रहे समाजसेवी अब्दुल जब्बार कहते हैं,''अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति का जवाब बताता है कि सरकारें बहुराष्ट्रीय कंपनी के दबाव में काम कर रही हैं और अब ये भारत सरकार की नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है कि जो कंपनी भोपाल के लोगों की अपराधी है और अपनी जवाबदेही नहीं मानती है तो वो क्यों नहीं लंदन ओलंपिक के आयोजन का बहिष्कार करते हैं.''
विजय मल्होत्रा ये भी कहते हैं,''जब डाओ केमिकल भारत में सरकार की मर्ज़ी से काम कर रही है तब इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन में उनकी सहभागिता पर विरोध करने के मुद्दे पर सरकार गेंद ओलंपिक संघ के पाले में क्यों फेंक देती है? सरकार को इस मुद्दे पर अपना पक्ष साफ करना चाहिए."

















