
करतार सिंह दुग्गल की रचनाओं का कई भाषाओं में अनुवाद किया गया
पंजाबी, हिंदी और उर्दू भाषाओं में लिखने वाले जाने माने साहित्यकार करतार सिंह दुग्गल का 94 वर्ष की आयु में निधन हो गया है.
उन्होंने दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्था में गुरुवार को अंतिम साँसे लीं.
पद्म भूषण और साहित्य अकादमी सम्मान सहित कई सम्मानों से नवाजे गए दुग्गल ने उपन्यास, कहानियां , और नाटक लिख कर अपने लिए साहित्य की दुनिया में जगह बनाई.
ऐसा कहाँ से लाऊं कि तुझसा कहें उसे

करतार सिंह दुग्गल पंजाबी लेखन का एक नगीना है. यूं तो उन्होंने नॉवेल, कहानियाँ लिखीं, अनुवाद किए पर वो पहचाने जाएंगें पंजाबियत के कारण. पंजाबियत उनके साहित्य की रूह है. खास तौर पर पंजाबी औरत के दर्द को समझने वाले बहुत कम लोग दुग्गल साहब जैसे थे.
मुझे उनकी सबसे अच्छी किताब उनकी जीवनी लगती है. वो एक निर्माता भी थे. वो जब नेशनल बुक ट्रस्ट के संचालक बने तब उन्होंने विश्व पुस्तक मेले का आग़ाज़ किया जो आज तब जारी है. भारत का सबसे बड़ा पुस्तकालय आन्दोलन, राजा राममोहन रॉय फाउंडेशन, भी दुग्गल साहब के हाथों क़ायम हुआ.
सबसे बड़ी बात जो मेरी नज़र में दुग्गल साहब में थी वो उनकी मोहब्बत और इंसानियत थी.
- गोपीचंद नारंग, पूर्व अध्यक्ष साहित्य अकादमी
दुग्गल ने आकाशवाणी के निदेशक के रूप में कार्य किया था.
दुग्गल के परिवार में उनकी पत्नी आयशा और एक पुत्र हैं.
माहिर फ़नकार
दुग्गल के साहित्य को जानने वाले लोग उन्हें एक माहिर फ़नकार के तौर पर याद करते हैं.
उनके चार दशकों के लेखकीय जीवन में कहानियों के 24 संकलन प्रकाशित हुए.
इसके अलावा दुग्गल की कलम से दस उपन्यास भी उपजे. दुग्गल का लेखन मानवीय संबंधों की गुत्थियों के ताने बाने पर थिरकता है.
दिल्ली पंजाबी साहित्य अकादमी के सचिव रवैल सिंह करतार सिंह दुग्गल को पंजाबी लेखकों में पहली पंक्ति के सिपाही मानते हैं. वे दुग्गल को गुरु ग्रंथ साहब के नए काव्य संस्करण के लिए भी याद करते हैं.
दुग्गल ने सात नाटक भी लिखे. उनके दो कविता संग्रह और एक आत्मकथा भी पाठकों तक पहुँची. उनकी पुस्तकें कई विश्वविद्यालयों में पाठ्क्रम का हिस्सा बनीं और कई रचनाओं का अन्य भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ.
दुग्गल का जन्म पहली मार्च, 1917 को तत्कालीन अविभाजित पंजाब के रावलपिंडी में हुआ था.
दुग्गल ने लाहौर के फोरमैन क्रिस्चियन कॉलेज से अंग्रेज़ी में एमए किया था. उसके बाद दुग्गल ने आकाशवाणी में नौकरी कर ली और पंजाबी सहित कई अन्य भाषाओं के कार्यक्रमों पर काम किया.
दुग्गल ने आकाशवाणी के अलावा नेशनल बुक ट्रस्ट के संचालक के रूप में भी काम किया. भारत की शीर्ष साहित्य संस्था साहित्य अकादमी ने उन्हें अपनी फ़ेलोशिप से भी नवाज़ा.
वर्ष 1988 में दुग्गल को पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. भारत के राष्ट्रपति ने उन्हें राज्य सभा के लिए भी नामांकित किया था.
अमरीका की लाइब्रेरी ऑफ़ कांग्रेस में उनकी 118 किताबें रखी हुई हैं.

















