
ब्राज़ील की राजधानी ब्रासीलिया में हलाल माँस की दो फ़ैक्ट्रियों के ख़िलाफ़ मुक़दमे दायर हुए हैं
तालिबान को रिश्वत ना देने पर मौत की धमकी मिलने के बाद महमूद ने अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान की सीमा पर अपने शहर से भागने का फ़ैसला किया.
उसने मानव तस्करी करनेवालों को पाँच हज़ार अमरीकी डॉलर दिए जिन्होंने उसे एक ऐसे देश भेजने का वादा किया जिसके बारे में उसे बहुत कम जानकारी थी मगर जहाँ उन्होंने कहा कि वो शरण लेकर नई शुरूआत कर सकता है, वो देश था – ब्राज़ील.
ब्राज़ील पहुँचने के कुछ हफ़्ते बाद ही उसने अपने आपको एक फ़ूड प्रोसेसिंग फ़ैक्ट्री में बेहद कड़े हालात में फँसा हुआ पाया. चार महीने भी नहीं हुए होंगे, जब उसने नए शहर में सहज होना शुरू ही किया था, कि उसके मालिकों ने उसका तबादला दूसरे राज्य में कर दिया.
इस दौरान उसे हमेशा विदेशियों के साथ छोटी बैरकों में रहना पड़ा जहाँ लोगों को बारी-बारी से बिस्तर मिला करते थे.
फ़ैक्ट्री के भीतर उसका केवल एक काम था, तेज़ छुरी से एक मिनट के भीतर 75 मुर्गियों को हलाल करना ताकि ब्राज़ील से माँस को इस्लामी देशों में निर्यात किया जा सके.
महमूद कहता है,"इतना काम था कि पसीना भी पोछ पाना नामुमकिन था."
एक दिन जब उसका एक सहयोगी बीमार पड़ा तो उसे दो पालियों में काम करने के लिए कहा गया. शिकायत करने पर उसे हटा दिया गया, उसकी जगह एक दूसरे विदेशी को रख लिया गया.
आज, जब वो ब्राज़ील में शरणार्थी बनने के अपने आवेदन के फ़ैसले की प्रतीक्षा कर रहा है, वो धार्मिक केंद्रों में जाकर खाता है और हर किसी से मदद माँगता है.
वो कहता है,"उन्होंने मुझसे कहा था मैं ब्राज़ील में सुकून से रह सकूँगा मगर मैं यहाँ ग़ुलाम बन गया हूँ और भिखारियों की तरह रह रहा हूँ."
महमूद के अलावा बीबीसी ब्राज़ील ने दो और ऐसे मज़दूरों से बात की जिन्होंने कहा कि वो भी ब्राज़ील के कसाईघरों में इसी तरह शोषित हो रहे हैं.
ब्राज़ील के ब्यूरो ऑफ़ फ़ॉरेन ट्रे़ड के अनुसार ब्राज़ील से पिछले वर्ष मुस्लिम देशों में लगभग पाँच अरब डॉलर चिकेन का निर्यात किया गया.
शोषण
"उन्होंने मुझसे कहा था मैं ब्राज़ील में सुकून से रह सकूँगा मगर मैं यहाँ ग़ुलाम बन गया हूँ और भिखारियों की तरह रह रहा हूँ"
महमूद, ब्राज़ीलियाई शरणार्थी
बीबीसी ब्राज़ील ने जिन मज़दूरों से बात की वे ब्राज़ील की सबसे बड़ी फ़ूड कंपनी बी आर फ़ू़ड्स ग्रुप की एक फ़ैक्ट्री में काम करते हैं जो समामबाया नामक शहर में स्थित है.
लगभग सभी मज़दूर दो घरों में रहते हैं जिनमें एक की तस्वीरें बीबीसी ब्राज़ील ने हासिल की हैं जिनसे पता चलता है कि मज़दूर किन कठिन परिस्थितियों में रह रहे हैं.
अधिकारियों के अनुसार ब्राज़ील में केवल तीन कंपनियाँ हलाल खाने के सर्टिफ़िकेट जारी करती हैं जिनमें एक धार्मिक संस्था सीडीआइएएल शामिल है.
इस संस्था का कहना है कि उसके हलाल कसाईघरों में लगभग साढ़े तीन सौ कर्मचारी काम करते हैं जिनमें 90 प्रतिशत पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश, इराक़ जैसे एशियाई और सेनेगल, सोमालिया जैसे अफ़्रीकी देशों के लोग हैं.
क़ानूनविद रिकार्डो बैलारिनी ने बताते हैं कि समामबाया के मज़दूरों की स्थिति की तुलना ग़ुलामी से की जा सकती है. उन्होंने ऐसे दो कंपनियों के ख़िलाफ़ मुक़दमे दायर किए हैं.
वे कहते हैं,"कंपनी उनके देशों की बुरी परस्थिति का लाभ उठाती हैं, उन्हें लगातार एक फ़ैक्ट्री से दूसरी जगह भेजने से वे उनको जमने नहीं देतीं ताकि वे जान-पहचान ना बढ़ा सकें और पुलिस को शिकायत ना कर सकें."
आरोपों के सामने आने के बाद ब्राज़ील में श्रम मामलों के विभाग ने कहा है कि जाँच के लिए एक अधिकारी को नियुक्त किया जाएगा.
श्रम मंत्रालय ने भी कहा है कि वो कसाईघरों में शोषण रोकने के लिए दिशानिर्देश बनाने का प्रयास करेगी.

















