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ईरान: प्रतिबंधों का कितना हुआ है असर

 सोमवार, 23 जनवरी, 2012 को 20:43 IST तक के समाचार

तेहरान से 20 किलोमीटर दूर कराज में रहने वाले 40 वर्षीय फ़ेरदौन को उनकी नौकरी से हटा दिया गया है. सरकारी ऑटो कंपनी खोदरो में वे पिछले 15 साल से कम कर रहे थे.

उनके जैसे कई लोग हैं जिनकी ज़िंदगी पर परमाणु कार्यक्रम को लेकर ईरान पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों का बुरा असर पड़ रहा है.

बीबीसी से बात करते हुए फ़ेरदौन कहते हैं, “मर्सिडिज़-बैन्ज़ कारों की असेंबलिंग करने का मेरा काम था. लेकिन आर्थिक प्रतिबंध लगने के बाद डाइमलर कंपनी ने ईरान के साथ अपना संबंध तोड़ दिया है. इस वजह से मेरी नौकरी चली गई. मैंने स्वरोज़गार का रास्ता अपनाया है लेकिन गुज़ारा करना मुश्किल हो रहा है.” लेकिन फिर भी वे ख़ुद को ख़ुशकिस्मत मानते हैं कि कम से कम उनके पास अस्थाई नौकरी है.

ईरान में बेरोज़गारी तेज़ी से बढ़ रही है- ख़ासकर युवाओं में. आधिकारिक तौर पर ये 14 फ़ीसदी तक पहुँच गई है लेकिन ग़ैर-आधिकारिक आँकडें कहीं ज़्यादा हैं.

गुज़ारा हुआ मुश्किल

ऐसे ईरानियों की संख्या बढ़ती जा रही है जिनके पास आमदनी का स्थाई स्रोत नहीं है और वे गुज़ारे के लिए परिवार के दूसरे सदस्यों पर निर्भर हैं.

पिरोज़ तेहरान में प्रोफ़ेसर हैं और वे कहते हैं कि जीवन-यापन करना दिनों दिन मुश्किल होता जा रहा है.

वे बताते हैं, “मैं अकेला रहता हूँ. मैं पहले हर महीने 300 डॉलर खर्च करता था लेकिन अब मुझे 650 डॉलर से ज़्यादा ख़र्च करना पड़ता है.”

पिछले साल लागू हुए सरकारी आर्थिक सुधारों ने लोगों की मुसीबत और बढ़ा दी है. इनके तहत पेट्रोल और अन्य चीज़ों पर सब्सिडी ख़त्म कर दी गई.

लोगों की मदद के लिए सरकार ने सबको हर महीने 30 डॉलर देना शुरु किया है. लेकिन लोगों की शिकायत है कि ये काफ़ी नहीं है.

व्यवसायों से जुड़े लोगों पर भी आर्थिक प्रतिबधों का बुरा असर पड़ा है. राजनीतिक विशलेषक मोहम्मद ईरानी कहते हैं कि विदेशी बैंक ईरानी कंपनियों के लिए क्रेडिट खाते नहीं खोल रहे.

वे ख़बर ऑनलाइन वेबसाइट पर लिखते हैं, “अगर आप शिकायत करते हैं तो कहा जाता है आप इस देश में नहीं रहते? आपको पता होना चाहिए कि ये पाबंदियों के कारण है.”

विदेशों में भी ईरानी परेशान

लेकिन तेहरान में रहने वाले हूमन का हौसला बरकरार है. बीबीसी फ़ारसी के एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि वे परमाणु कार्यक्रम विकसित करने के अपने देश की कोशिश पर गर्व महसूस करते हैं.

"मैं अकेला रहता हूँ. मैं पहले हर महीने 300 डॉलर खर्च करता था लेकिन अब मुझे 650 डॉलर से ज़्यादा ख़र्च करना पड़ता है"

उनका मानना है, “प्रतिबंध ईरान की अर्थव्यवस्था का गला नहीं घोट पाएँगे क्योंकि ईरान पूरी तरह से तेल पर निर्भर नहीं है.”

विदेशों में रहने वाले ईरानियों पर भी आर्थिक प्रतिबंधों का असर पड़ा है. भारत में रहने वाली एक ईरानी छात्रा नेज़ी कहती हैं कि ईरान से उन्हें पैसे भेजने में परिवारवालों को बहुत मुश्किल होने लगी है.

नेज़ी ने बताया, “जब ईरानी मुद्रा को रुपए में बदलना होता है तो एजेंट ख़ूब कमिशन खाते हैं और मनमर्ज़ी का रेट लेते हैं.”

पिछले कुछ हफ़्तों में ईरानी मुद्रा की दर डॉलर के मुकाबले काफ़ी गिरी है. सुरक्षा कारणों से ईरान में डॉलर की बिक्री पर रोक लगा दी गई है.

सेंट्रल बैंक ने भी आगाह किया है कि जिस किसी के पास भी विदेशी मुद्रा है उसे बैंक की रसीद दिखानी होगी वरना उसे हिरासत में ले लिया जाएगा.

17 वर्षीय हामिद ब्लैक में लोगों को अन्य देशों की मुद्रा बेचते हैं. सरकारी एजेंसी फ़ार्स से बातचीत में वे कहते हैं, “मैं पुलिस से नहीं डरता. अपने पिता की तरह मैं डॉलर बेचता हूँ. मेरे पिता इस तरह डॉलर बेचने में माहिर हैं, मैं भी वैसा ही बनूँगा. पैसा कमाउँगा और अमीर बनूँगा.”

हौसला बरकरार

ईरानी मुद्रा की गिरती दर और बैंक में भरोसे की कमी के कारण कई ईरानी अपना पैसा सोने में या डॉलर ख़रीदने में लगा रहे हैं.

ईरान में सोने के सिक्कों की क़ीमत रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गई है. ईरान में सोने के सिक्कों की काफ़ी अहमियत है, ख़ासकर निकाह के समय.

कड़ा रुख़ अपनाने के लिए पहचाने जाने वाला केहान अख़बार ने एक तलाकशुदा आदमी की अपील छापी थी जो तलाक के बाद अपनी पत्नी को दिए जाने वाले सोने के सिक्के नहीं दे पा रहा है.

व्यक्ति ने लिखा था, “सोने के सिक्कों की बढ़ती की़मतों के लिए कौन ज़िम्मेदार है ? जब मैने तलाक दिया था तो एक सिक्के की क़ीमत 200 डॉलर थी लेकिन अब ये और महंगे हो गए हैं. अब पूर्व पत्नी को और भुगतान करना मेरे लिए मुश्किल हो रहा है.”

ईरान में लोगों को पता चला है कि एक्सचेंज रेट दर्शाती वित्तीय वेबसाइटों को प्रशासन ने ब्लॉक कर दिया है और एसएमएस के ज़रिए अगर डॉलर शब्द भेजना हो तो भी मुमकिन नहीं है.

एक सरकारी कर्मचारी मालेक ने रॉयटर्स को बताया,"मैं और मेरे सहयोगी दफ़तर में एक दूसरे को टेक्सट करने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन इन संदेशों में डॉलर जैसे शब्द थे वो एसएमएस जा ही नहीं रहे थे."

लेकिन तमाम मुश्किलों के बावजूद कई ईरानियों को उम्मीद है कि उनका देश ये दबाव झेलने में सफल रहेगा और चीज़ें बेहतर होंगी.

कार कंपनी से निकाले गए फ़ेरदौन ने भी हिम्मत नहीं हारी है. वे कहते हैं, “हालात मुश्किल है. पाबंदियों के कारण मैं बेरोज़गार हो गया हूँ. लेकिन भविष्य तो हमारा ही है. मेरे देश के ख़िलाफ़ मनोवैज्ञानिक युद्ध है. लेकिन हम दबाव झेलेंगे. अगली पीढ़ी, मेरे बेटे की पीढ़ी एक मज़बूत ईरान में रह पाएगी.”

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