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‘रुश्दी को रोकने की माँग अभारतीय’

 मंगलवार, 10 जनवरी, 2012 को 21:03 IST तक के समाचार

सलमान रुश्दी पहले भी जयपुर लिटरेरी फ़ेस्टिवल में शिरकत कर चुके हैं

देवबंद की सलमान रुश्दी को भारत आने से रोकने की मांग के ख़िलाफ़ साहित्य और इस्लामी जगत के दिग्गजों की आवाजें भी उठ रही हैं.

सलमान रुश्दी भारतीय मूल के ब्रितानी लेखक हैं. उनकी 1988 में एक किताब आई थी 'सैटेनिक वर्सेज़' यानी 'शैतान की आयतें' किताब ख़ासी विवादित साबित हुई.

ईरान के तत्कलीन सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्लाह खुमैनी ने रुश्दी के खिलाफ़ फतवा जारी कर दिया. खुमैनी की बात से इतना हंगामा उठा की ब्रिटेन और ईरान की सरकारों के बीच ताल्लुकात ही खत्म हो गए.साल 2005 खुमैनी के उत्तराधिकारी आयतुल्लाह रुहुल्ला ख़ामनई ने भी रुश्दी के खिलाफ़ फ़तवे को दोहराया. किताब आने के बाद से 24 साल बीत गए. लगने लगा कि लोग इस विवाद को भूल गए.

रुश्दी ख़ुद कई बार भारत आए जयपुर लिटरेरी फ़ेस्टिवल में भी उन्होंने शिरकत की.

'माँग अभारतीय'

" इस तरह तो राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ भी कहता है कि मुसलमानों को भारत में रहने का हक़ नहीं है तब यह लोग संविधान की बात करते हैं. रूश्दी को रोकने की मांग तो संविधान के खिलाफ़ है. अगर इनकी मांग मानी जाए तो फिर आरएसएस की मांग भी क्यों ना मानी जाए"

इस्लामी विद्वान मौलाना वहीदुद्दीन खान

हिंदी के बड़े कवियों में से एक अशोक वाजपयी ने नौमानी के खिलाफ़ कड़ी प्रतिक्रया दी है.

उनका कहना है कि रुश्दी को भारत आने से रोकने की मांग ना केवल अलोकतांत्रिक है बल्कि अभारतीय भी है.

अशोक वाजपेयी ने अफ़सोस जताया कि जिस देवबंद ने भारत के विभाजन के खिलाफ़ इतना सख्त रुख अपनाया हो और भारत की स्वतंत्रता के पक्ष में नारा दिया हो वहां से इस तरह की मांग उठे.

वाजपेयी को इस बयान में सियासी साज़िश दिखती है.

'मांग असंवैधानिक'

कई इस्लामी विद्वानों ने भी मौलाना नौमानी की मांग विरोध किया है. जाने माने इस्लामी विद्वान मौलाना वहीदुद्दीन खान ने भी मौलाना नौमानी की मांग का कड़ा विरोध किया उसे बेतुका बताया.

मौलाना वहीदुद्दीन खान ने कहा " इस तरह की मांग अजीब है. इस तरह तो राष्ट्रिय स्वयंसेवक संघ भी कहता है कि मुसलामानों को भारत में रहने का हक़ नहीं है तब यह लोग संविधान की बात करते हैं. रुश्दी को रोकने की मांग तो संविधान के खिलाफ़ है. अगर इनकी मांग मानी जाए तो फिर आरएसएस की मांग भी क्यों ना मानी जाए."

'रुश्दी महान किस्सागो'

जयपुर लिटरेरी फ़ेस्टिवल के मुख्य आयोजकों में से एक और भारतीय इतिहास पर कई किताबें लिख चुके इतिहासकार और पत्रकार और लेख विलियम डालरिम्पल भी मौलाना नौमानी की इस बात से चकित हैं.

डालरिम्पल का कहना है, "रुश्दी भारत आते रहे हैं, रुश्दी यहाँ पैदा हुए हैं वो जयपुर सम्मलेन में भी शरीक हो चुके हैं. उन्होंने लोगों का भरपूर मनोरंजन किया है. कभी कहीं कोई ज़रा भी शिकायत नहीं उठी. इस सबसे ऊपर रुश्दी एक महान किस्सागो हैं उनकी कहानियाँ कुलांचें भरतीं हैं."

डालरिम्पल रुश्दी को सत्तर के दशक में अंग्रेज़ी में भारतीय लेखन के एक आंदोलन की शुरुआत करने का श्रेय भी देते हैं.

"रूश्दी ने भारतीय लेखकों को दुनिया के पटल पर रखा उनके बाद ही विक्रम सेठ और अमिताव घोष जैसे भारतीय लेखक उभर कर आये"

जयपुर लिटरेरी फ़ेस्टिवल के आयोजक विलियम डालरिम्पल

डालरिम्पल के अनुसार "रुश्दी ने भारतीय लेखकों को दुनिया के पटल पर रखा उनके बाद ही विक्रम सेठ और अमिताव घोष जैसे भारतीय लेखक उभर कर आए."

डालरिम्पल ने यह भी कहा कि जो लोग रुश्दी का विरोध कर रहे हैं उन्होंने उनकी किसी किताब का एक पन्ना भी नहीं पढ़ा है. सारा विरोध केवल कहा सुनी पर ही आधारित है.

यह प्रकरण किसी लिहाज़ से बहुत सुखद नहीं कहा जा सकता.

पर गनीमत अभी तक यह है कि हर पक्ष केवल बयान ही दे रहा है बात कर रहा है.

इस वक़्त रुश्दी को पढ़ कर उनका विरोध करने से ज़्यादा ज़रूरी है इस बहस के सभी तर्कों को सुनने की. क्योंकि अगर सबने सबको सुन लिया तो शायद किसी को ग़ुस्सा हो कर बोलने की ज़रुरत ही नहीं रहेगी.

देखें क्या होता है.

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