...जो जूझ रहे हैं स्वास्थ्य समस्याओं से

डब्लूटीसी

न्यूयॉर्क के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 11 सितंबर 2001 को हुए हमलों के बाद धूल-मिट्टी से संबंधित बीमारियों के कारण 18 हज़ार से ज़्यादा लोग प्रभावित हैं.

ये आँकड़े 9/11 के हमलों के कारण प्रभावित हुए आपातकालीन कर्मचारी, स्वयंसेवक और स्थानीय निवासियों की निगरानी और इलाज कार्यक्रम से जुड़े सरकारी विभाग के हैं.

प्रभावित लोगों में सबसे आम बीमारी है साँस की समस्या, जिसमें अस्थमा और साइनसाइटिस भी शामिल है. लेकिन इसके अलावा मांसपेशियों और आँत से जुड़ी समस्याएँ भी सामने आई हैं.

11 सितंबर के हमलों के बाद से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के आँकड़े रखने वाले एक वरिष्ठ अमरीकी अधिकारी का कहना है कि हमलों के दौरान बच गए कई लोगों की जान जल्दी जा सकती है.

प्रभाव

इसके कारण आपमें ऑक्सीजन लेने और कार्बन डाइ ऑक्साइड छोड़ने की क्षमता कम हो सकती है और फिर साँस लेने में परेशानी आ सकती है

जॉन हावर्ड

नेशनल इंस्टीट्यूट फ़ॉर ओकुपेशनल सेफ़्टी एंड हेल्थ के निदेशक डॉक्टर जॉन हावर्ड ने बीबीसी न्यूज़ को बताया कि ये विश्वसनीय लगता है कि धूल-मिट्टी के कारण लोगों की मौत हो जाए.

उन्होंने इस कारण फेफड़े के नुक़सान को ख़तरनाक बताया और कहा कि ये इसका सबसे गंभीर प्रभाव हो सकता है.

जॉन हावर्ड ने बताया, "इसके कारण आपमें ऑक्सीजन लेने और कार्बन डाइ ऑक्साइड छोड़ने की क्षमता कम हो सकती है और फिर साँस लेने में परेशानी आ सकती है."

11 सितंबर के हमलों के बाद दोनों ट्रेड टॉवर गिर गए थे और धूल-मिट्टी का आवरण कई दिनों तक देखा गया था. जानकारों का कहना है कि इसमें ख़तरनाक रसायनों की मात्रा भी पाई गई थी.

शोधकर्ताओं को उच्च स्तर के अल्कलाइन कण मिले हैं. इनके अलावा एस्बेस्टस, पारे और सीसे जैसे भारी धातु भी मिले हैं.

11 सितंबर को हुए हमलों में क़रीब तीन हज़ार लोग मारे गए थे. लेकिन जो लोग वहाँ सहायता के लिए पहुँचे, वे भी विषैले रसायनों से प्रभावित हुए.

कार्यक्रम

डब्लूटीसी

हमलों के बाद ग्राउंड ज़ीरो पर लाखों टन मलबा जमा था

अमरीकी सरकार की ओर से गठित डब्लूटीसी के स्वास्थ्य कार्यक्रम के तहत 60 हज़ार से ज़्यादा लोग रजिस्टर्ड हुए हैं, जो स्वास्थ्य संबंधी ख़तरे का सामना कर रहे हैं.

इस कार्यक्रम का कहना है कि इसमें कोई संदेह नहीं कि हज़ारों लोग इस घटना के कारण प्रभावित हुए हैं और कई लोगों में ये समस्या स्थायी हो सकती है. इन लोगों में सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए हैं फ़ायर कर्मचारी, जो राहत और बचाव के लिए लंबे समय तक लगे रहे.

न्यूयॉर्क के फ़ायरफ़ाइटर्स पर हुए एक बड़े अध्ययन में ये पता चला है कि इन लोगों के फेफड़े की क्षमता में भारी कमी हुई है. ये अध्ययन वर्ष 2010 में न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ़ मेडिसिन में छपा है.

सबसे विवादित सवाल ये है कि क्या धूल के कारण हुई समस्या के कारण अभी तक किसी की मौत हुई है या नहीं.

वर्ष 2006 में न्यू जर्सी के एक पैथोलॉजिस्ट ने दावा किया कि डिटेक्टिव जेम्स ज़डरोगा की मौत फेफड़े की बीमारी के कारण हुई.

बाद में न्यूयॉर्क मेडिकल एक्ज़ामिनर ने इस अध्ययन को चुनौती दी. लेकिन डिटेक्टिव ज़डरोगा का मामला इतना गंभीर ज़रूर माना गया कि उनके नाम पर एक नया क़ानून आया.

दिसंबर 2010 में ज़डरोगा एक्ट पास हुआ और जनवरी में क़ानून बना. इस क़ानून के तहत पीड़ितों की निगरानी, इलाज और मुआवज़े के लिए 4.7 अरब डॉलर की राशि अधिकृत की गई.

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