अमर सिंह गिरफ़्तार, न्यायिक हिरासत में

अमर सिंह

अमर सिंह कहते रहे हैं कि वे निर्दोष हैं

'नोट के बदले वोट' मामले में नाटकीय घटनाक्रम में समाजवादी पार्टी के पूर्व महासचिव और राज्यसभा के सांसद अमर सिंह को गिरफ़्तार करके 19 सितंबर तक की न्यायिक हिरासत में तिहाड़ जेल भेज दिया गया है.

उनके साथ ही भारतीय जनता पार्टी के दो पूर्व सांसदों, फ़ग्गन सिंह कुलस्ते और महाबीर सिंह भगोरा को भी न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है.

इस मामले में वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी के पूर्व सलाहकार सुधीन्द्र कुलकर्णी के ख़िलाफ़ भी सम्मन जारी किया गया था लेकिन वे अदालत में नहीं पहुँचे क्योंकि वे देश से बाहर हैं.

इन चारों के ही ख़िलाफ़ 'नोट के बदले वोट' मामले में दिल्ली पुलिस ने आरोप पत्र दाखिल किया था.

इस मामले में दिल्ली पुलिस शामिल भाजपा के मौजूदा सांसद अशोक अर्गल के ख़िलाफ़ भी मामला दर्ज करना चाहती है और इसके लिए लोकसभा के अध्यक्ष से अनुमति मांगी गई है.

भाजपा और अन्य विपक्षी दलों ने इन गिरफ़्तारियों के बाद कहा है कि जाँच इस बात की भी होनी चाहिए कि वोट ख़रीदे जाने से किसे लाभ पहुँचा.

जबकि कांग्रेस ने कहा है कि उन्हें सरकार बचाने के लिए वोटों की ज़रुरत ही नहीं थी.

ज़मानत याचिका ख़ारिज

नोट लहराते सांसद

भाजपा ने अपने सांसदों को नोट के साथ संसद में भेजने का फ़ैसला किया था

पहले कहा जा रहा था कि अमर सिंह अदालत में नहीं आ रहे हैं क्योंकि उन्होंने अपनी बीमारी की वजह से अदालत में पेश होने से छूट का आवेदन किया था.

लेकिन वे अचानक तीस हज़ारी कोर्ट में उपस्थित हुए और उन्होंने अपने गुर्दे की बीमारी का हवाला देते हुए ज़मानत देने की अपील की. अदालत ने उनसे बीमारी से संबंधिक ताज़ा कागज़ात मांगे तो उन्होंने कहा कि ये कागज़ात लाने के लिए समय चाहिए होगा.

इस पर तीस हज़ारी कोर्ट की विशेष जज संगीता धींगरा ने उनकी ज़मानत याचिका ख़ारिज करते हुए उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया.

अदालत के इस फ़ैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अमर सिंह के वकील ने कहा कि अमर सिंह के ख़िलाफ़ अभियोजन पक्ष के पास को ठोस सबूत नहीं है.

उनका कहना था, "चार्ज शीट में हमारे ख़िलाफ़ कुछ है ही नहीं तो हम क्या कहें, हमारे ख़िलाफ़ सिर्फ़ सह-अभियुक्त का बयान भर है जिसकी क़ानून की नज़र में कोई अहमियत नहीं है. क़ानून ये कहता है कि इस बयान पर सबूत जुटाया जाना चाहिए वरना इसकी कोई अहमियत नहीं है."

उनका कहना है कि वे जल्दी ही बीमारी के आधार पर अंतरिम ज़मानत की याचिका लगाएँगे और 19 सितंबर को नियमित ज़मानत का आवेदन करेंगे.

भाजपा भी नाराज़

हम अगर भ्रष्टाचार करते तो हम क्या टीवी कैमरा लगवाते या पार्लियामेंट के भीतर आते ये बताने के लिए कि कांग्रेस की सरकार किस तरह से बच रही है. पूरे देश को मालूम है कि जब मनमोहन सिंह की सरकार अल्पमत में आ गई थी तो उसके क्या-क्या हथकंडे अपनाए, उसी के कारण ये सब हो रहा है

अशोक अर्गल, भाजपा सांसद

इस गिरफ़्तारी से भाजपा के दो पूर्व सांसदों फग्गन सिंह कुलस्ते और महाबीर सिंह भगोरा के वकील संजीव सोनी भी नाख़ुश दिखे.

उनका कहना है कि जिन लोगों ने भ्रष्टाचार को उजागर करना चाहा उन्हें ही मुल्ज़िम बना दिया गया है, "आजकल ये चल रहा है कि जो भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाता है वही कहीं न कहीं भ्रष्टाचार के मामले में फँसा दिया जाता है, तो यही हुआ है. जो लोग विसिल ब्लोवर थे, जो ये पैसा नहीं रखना चाहते थे उन्हें ही मुल्ज़िम बना दिया गया है."

भाजपा के नेताओं ने भी सवाल उठाया है कि जिन्होंने मामले को उजागर किया उन्हें पकड़ लिया गया और जिसने घूस दी उन्हें भी पकड़ लिया गया लेकिन जिसकी सरकार बची और जिसे फ़ायदा हुआ उसकी जाँच नहीं की जा रही है.

संसद में नोट लहराने वाले सांसदों में से एक अशोक अर्गल ने कहा, "हम अगर भ्रष्टाचार करते तो हम क्या टीवी कैमरा लगवाते या पार्लियामेंट के भीतर आते ये बताने के लिए कि कांग्रेस की सरकार किस तरह से बच रही है. पूरे देश को मालूम है कि जब मनमोहन सिंह की सरकार अल्पमत में आ गई थी तो उसके क्या-क्या हथकंडे अपनाए, उसी के कारण ये सब हो रहा है."

यही सवाल सीपीएम और सीपीआई ने भी उठाए हैं.

ये मामला वर्ष वर्ष 2008 का है जब वाम दलों के समर्थन वापस लेने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार के विश्वास प्रस्ताव पर मतदान होना था.

ये अटकलें लगाई जा रही थीं कि यूपीए की सरकार बचेगी या नहीं और बहुमत किस तरह से जुटेगा.

कांग्रेस को वोट की ज़रुरत नहीं थी, आप रिकॉर्ड निकाल कर देखिए कि कितने वोटों से कांग्रेस जीती थी. इनके एक-दो वोटों की हमें क्या ज़रुरत थी. कचहरी में मसला है, साबित हो जाएगा सब कुछ

पवन बंसल, संसदीय कार्यमंत्री

22 जुलाई को मतदान से कुछ घंटे पहले ही भाजपा के तीन सांसदों ने लोक सभा में नोटों की गड्डियां पेश की. इन तीन सांसदों अशोक अर्गल, फग्गन सिंह कुलस्ते और महावीर भगोरा का आरोप था कि अमर सिंह के सहयोगियों ने विश्वास मत में हिस्सा न लेने के लिए उन्हें एक करोड़ रूपए रिश्वत में दिए गए.

तहक़ीकात के बाद दिल्ली पुलिस इस नतीजे पर पहुंची कि अमर सिंह ने सांसदों का समर्थन ख़रीदने की योजना ज़रूर बनाई थी लेकिन पुलिस ये नहीं बता पाई है कि आख़िर वे सरकार को मदद करने के लिए ऐसी योजना क्यों बनाऐंगे जिस सरकार को उनकी पार्टी ने केवल बाहर से समर्थन दिया था.

आरोप है कि इन तीन सांसदों को तीन-तीन करोड़ रूपए देने की पेशकश गई थी. एडवांस के तौर पर मतदान से पहले उन्हें एक करोड़ रूपए दिए गए थे.

सुप्रीम कोर्ट की देखरेख में पुलिस की तहक़ीकात चल रही है. अदालत का कहना है कि अब पुलिस के लिए ये ज़रूरी है कि वो इन पैसों के स्रोत का पता करे.

लेकिन कांग्रेस ने आज इस आरोप को सिरे से ख़ारिज कर दिया कि इस मामले से उसका कोई लेना देना है.

कांग्रेस नेता और संसदीय कार्यमंत्री पवन बंसल, "कांग्रेस को वोट की ज़रुरत नहीं थी, आप रिकॉर्ड निकाल कर देखिए कि कितने वोटों से कांग्रेस जीती थी. इनके एक-दो वोटों की हमें क्या ज़रुरत थी. कचहरी में मसला है, साबित हो जाएगा सब कुछ."

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा दिया है कि वह अब इस मामले की निगरानी नहीं करेगी लेकिन दिल्ली पुलिस को सख़्त हिदायत दी है कि वह उस पैसे के स्रोत का पता लगाए जो उस दिन संसद में लहराए गए थे.

आज की राजनीतिक प्रतिक्रियाओं से तो लगता है कि अब ये मामला अदालतों के बाहर भी बराबर लड़ा जाएगा.

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