काठमांडू की सड़कों पर औरतों का राज

ये महिलाएं अपने घरों से सुबह-सवेरे निकलती हैं और देर शाम तक काम करती हैं. वे अपनी रोज़ी रोटी ख़ुद कमाती हैं और अब एक ऐसा काम कर रही हैं जो कि अब तक पुरुष किया करते थे.

इन औरतों की गिनती बढ़ती जा रही है. ये काठमांडू की साफ़ा ऑटो ड्राइवर हैं.

साफ़ा ऑटो नेपाल में सार्वजनिक यातायात का सबसे लोकप्रिय साधन है. भारत की सड़कों पर दौड़ते ऑटो जैसा ही दिखता है लेकिन चलता बैटरी पर है.

साफ़ा का नेपाली में मतलब है साफ़. ये नाम इसे मिला है क्योंकि माना जाता है कि ये पर्यावरण को नुकसान नहीं पंहुचाता है. इस वाहन को भारत से निर्यात किया गया है.

नए स्रोत

रोज़गार के ये नए स्त्रोत इतने लोकप्रिय हो गए हैं कि इन ऑटो की 80 प्रतिशत चालक महिलांए हैं.

एक अनाधिकारिक अनुमान के हिसाब से काठमांडू में 400 से ज़्यादा महिला ड्राइवर हैं और हर महिला चालक एक दिन में कम से कम 120 किलोमीटर ऑटो चलाती हैं.

ऐसी महिलाओं की संख्या बढ़ रही है जो वो काम अपना रही हैं जो पारंपरिक रूप से मर्द किया करते थे. यह साफ तौर पर आर्थिक गतिविधियों से जुड़ी भूमिकाओं में आ रहे बदलाव को इंगित करता है.

मीरा मिश्रा

नेपाल में औरतों की पारंपरिक भूमिका गृहिणी की रही है.

वे ज़्यादातर समय चारदीवारी के भीतर ही रही हैं. लैंगिक विभेद के जानकारों के हिसाब से महिलाओं की ये नई भूमिका एक क्रांतिकारी बदलाव है.

मीरा मिश्रा पहला केवल महिलाओं के लिए बने एक कॉलेज में जेंडर स्टडीज़ पढाती हैं. उनका कहना है, ''ऐसी महिलाओं की संख्या बढ़ रही है जो वो काम अपना रही हैं जो पारंपरिक रूप से मर्द किया करते थे. यह साफ तौर पर आर्थिक गतिविधियों से जुड़ी भूमिकाओं में आ रहे बदलाव को इंगित करता है.''

सपना

योगकुमारी सुनुवार एक पिछड़े इलाक़े से काठमांडू आई हैं. उनकी दो बेटियां है. उनके पति ने दूसरी महिला के लिए उन्हें छोड़ दिया था.

इसके बाद वे इसराइल जाकर नौकरी करना चाहती थीं. फिर उन्होंने एक ट्रेनिंग संस्थान में दाखि़ला लिया जहां ज़रूरतमंद औरतों को बिजली से चलने वाले ऑटो को चलाने का प्रशिक्षण दिया जाता था.

प्रशिक्षण के बाद पिछले एक साल से वे ऑटो चलाती हैं और अब हर महीने नौ हज़ार रूपए कमाती हैं.

हालांकि वो आज भी इसराइल जाकर नौकरी करने का सपना देख रही हैं.

काठमांडू की भीड़ भरी सड़कों पर अपने लिए जगह तलाशना इन औरतों के लिए आसान नहीं है जहां बड़ी तादाद में पुरूष चालक मौजूद रहते हैं.

सीख लिए हैं गुर

लेकिन ये औरतें इतनी शातिर हो गई हैं कि जल्द ही इन्होंने इस काम के सारे गुर सीख लिए हैं. चाहे वो भीड़ भाड़ वाले इलाक़े में गाड़ियां निकालने का मसला हो या चालकों की तेज़-तर्रार ज़बान सीखने की ज़रूरत.

अगर किसी ने उन्हें अबला समझने की हिमाक़त की तो फिर ख़मियाजा़ भी उन्हें भुगतने के लिए तैयार रहना पड़ता है.

नेपाल की सड़कों पर औरतें चला रही है टेम्पु

राधिका श्रेष्ठ भी एक महिला चालक हैं और देश के काफ़ी ग़रीब इलाके से आती हैं.

ग़रीबी के कारण उन्हें पढ़ाई बीच में ही छोड़ देना पड़ा. उनका परिवार बड़ा था. केवल बेटों की पढ़ाई जारी रही. राधिका समेत उसकी चार बहनों को घर के काम काज की ज़िम्मेदारी उठानी पड़ी.

ऑटो चालक बनने के बाद राधिका कहती हैं उनका आत्मविश्वास वापस लौट आया है.

सजग

सड़कों की इस ज़िंदगी ने उन्हें अपने अधिकारों के प्रति भी सजग कर दिया है. वे कहती हैं कि महिला चालकों को सरकारी वाहनों को चलाने में प्राथमिकता मिलनी चाहिए.

वे कहती हैं कि अगर प्रधानमंत्री ने उन्हें अपना आधिकारिक ड्राइवर नियुक्त कर लिया तो उन्हें बहुत ख़ुशी होगी.

ये सपना ज़रूर अभी दूर सा लगता है लेकिन इतना ज़रूर है कि नेपाल के पारंपरिक समाज में बदलाव की भनक मिलनी शुरू हो गई है.

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