आंखों में आंसू भी नहीं बचे

फ़तेहपुर ट्रेन हादसा

माँ की मौत हो गई है. पिता गंभीर रूप से घायल हैं. भाई की लाश अभी ट्रेन की कोच में फंसी है. बहन शहाना रोते- रोते थककर शांत हो गई है. आँखों में आंसू भी नही बचे.

शहाना अपने परिवार के साथ उस कालका मेल ट्रेन से दिल्ली जा रही थी जो रविवार की दोपहर मलवां स्टेशन के पास दुर्घटनाग्रस्त हो गई.

मिर्जापुर से आए जावेद फफक- फफक कर रो रहे हैं. उनके भाई दुर्घटना में मारे गए और वो अपने दोस्तों के साथ उन्हें ढूंढते हुए मलवां पहुंचे हैं.

कानपुर के एक गाँव के नरेश ने बताया कि उनके परिवार के लोग शादी के सिलसिले में आसनसोल गए गए थे. पांच लोग मारे गए . एक गंभीर रूप से घायल है.

उम्मीद

सोमवार की सुबह से ही कोलकाता से लेकर दिल्ली तक के लोग अपने रिश्तेदारों की खोज ख़बर लेने यहाँ पह्नुंचने लगे हैं.

सबसे पहले वो सड़क के किनारे रखी गई लाशों के पास जाते हैं और कपड़ा उठाकर पहचानने की कोशिश करते हैं.

जिसके रिश्तेदार की लाश मिल गई वो बिलखने लगता है.

बाक़ी लोग फ़तेहपुर ज़िला अस्पताल जा रहे हैं जहाँ नोटिस बोर्ड पर मरने वालों और घायलों की सूची लगी है. इनमे से कईयों की पहचान नहीं हो पाई.

अस्पताल के लोग बताते हैं कि कुछ घायल कानपुर, इलाहाबाद और लखनऊ के अस्पताल भेजे गए.

कई लोग उम्मीद लिए वहाँ जाने का साधन तलाश रहे हैं.

इनमे से कुछ वो खुशनसीब भी हैं जिंनके रिश्तेदार ने घर पहुँच कर सही सलामत होने का फ़ोन कर दिया और अब वो दूसरों की मदद कर रहे हैं.

आपात ब्रेक

भारी भरकम ट्रेन के डब्बे इस तरह आपस में एक दूसरे के ऊपर चढ़कर टूट-फूट गए हैं जैसे बच्चों के खिलौने.

एक सौ आठ किलोमीटर की तेज़ स्पीड से चली आ रही ट्रेन जब अचानक से झटका देकर रुकी तो ज़ाहिर है यह तो होना ही था.

ट्रेन हादसे में कई लोग मारे गए

दर्जनों कालका मेल हादसे में मारे गए

मलवां स्टेशन के कर्मचारी भी नही समझ पाए कि आख़िर उनकी आँखों के सामने ये ट्रेन पटरी से क्यों उतर गई.

डब्बों के टकराने से हुई ज़ोर की आवाज़ और चींख़ पुकार सुनकर अगल-बगल के गाँव के लोग दौड कर आये. इन्हीं में से थे सूर्यभान और संजीव कुमार.

इन्ही लोगों ने मुझे कल सबसे पहले मेरे मोबाइल पर दुर्घटना की सूचना दी और ट्रेन के बदहवास ड्राइवर से मेरी बात भी कराई.

ड्राईवर का कहना था कि स्टेशन के सामने पटरी का पॉइंट नही मिला था , जिसके कारण उसकी ट्रेन पटरी से उतर गई. भाग्य से दोनों ड्राइवर बच गए.

ड्राईवर छुपे

शाम को जब मै मौके़ पर पहुंचा तो पड़ताल करने की कोशिश की. मै लाल कपडे से घिरे रेल अफ़सरों के कैम्प पर गया. चेयरमैन रेलवे बोर्ड फ़ोन पर किसी से बात कर रहे थे. फै़क्स मशीन से कोई संदेश भेजा जा रहा था.

वहीं मालूम हुआ कि ड्राइवरों को पास के केबिन में छिपाकर रखा गया है. रेलवे वाले नही चाहते कि कोई बाहरी आदमी उनसे बात करे.

सुबह होते ही आस-पास के हज़ारों गाँव वाले फिर यहाँ आ गए हैं. इन्ही लोगों ने कल सबसे पहले बचाव का काम शुरू किया. लोकल पुलिस ने भी जैसे तैसे वाहन लगाकर लोगों को अस्पताल पहुंचाया.

फतेहपुर, कानपुर और इलाहाबद से राहत टीम काफ़ी बाद में आई.

प्रधानमंत्री ही इस समय रेल मंत्री भी हैं. इसलिए सेना को भी फ़ौरन तलब कर लिया गया.

जिससे जो बन पड़ रहा था वो कर रहा था.

शुक्र है मोबाइल का

लेकिन मौके़ पर पहुंचे पुलिस और प्रशासन के कुछ बड़े अफ़सर आपस में बात कर रहे थे. वे कह रहे थे कि रेलवे के पास इतना संचार साधन है मगर ये हमें समय से सूचना क्यों नही देते ताकि पुलिस और डाक्टर ऐसे मौके़ पर जल्दी से जल्दी पहुँच सके.

गनीमत है कि अब गाँव-गांव में मोबाइल फोन है . इसलिए सूचना जल्दी फैल गई.

ट्रेन हादसा

इस समय मेरे दिमाग़ में कुछ साल पहले रदोई के पास हुई एक ऎसी ही भयानक ट्रेन दुर्घटना का दृश्य घूम रहा है. उसमे भी डिब्बे एक के ऊपर एक चढ गए थे.

रेल अधिकारी कह रहे थे कि कुल छह लोग मरे हैं. मगर सुबह मैं जब घटनास्थल पर पहुंचा तो ट्रेन के अंदर बड़ी संख्या में लोग मरे पड़े थे.

उस समय के रेल मंत्री राम विलास पासवान ने जब सुबह बीबीसी पर यह बात सुनी तो रेल अफसरों को डांट लगाई और खुद मौके पर आये.

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