
व्यावसायियों को चिंता थी कि इस नीति से कामगारों की कमी हो सकती है
लंदन में हाईकोर्ट ने सरकार के उस निर्णय के ख़िलाफ़ फ़ैसला दिया है जिसमें सरकार ने ग़ैर-यूरोपीय देशों से ब्रिटेन आने वाले कुशल कामगारों की सीमा निर्धारित कर दी थी.
न्यायाधीशों का कहना है कि ये क़दम ग़ैरक़ानूनी ढंग से उठाए गए.
ब्रिटेन में अप्रवासन पर लगाया गया रोक काफ़ी विवादास्पद रहा है और कई कंपनियाँ शिकायत करती रही हैं कि सरकार का यह फ़ैसला ग़लत तरह के प्रवासियों को निशाना बनाता है और इससे अर्थव्यवस्था को नुक़सान पहुँच सकता है.
फ़ैसले को चुनौती
ब्रिटिश सरकार ग़ैर यूरोपीय संघ के देशों से अपने देश में आने वाले लोगों की संख्या को कम करने की नीति के तहत अगले साल अप्रैल से बाहरी ब्रिटेन में आने वाले लोगों की संख्या सीमित करना चाहती है.
लेकिन आवेदन पत्रों की बढ़ती संख्या को कम करने के लिए मंत्रियों ने इस साल गर्मी से ही प्रशिक्षित श्रमिकों की संख्या को सीमित करने का फ़ैसला कर लिया.
लेकिन बहुत से व्यवसायियों को ये शिकायत थी कि उन्हें इस बात की चिंता है कि कहीं देश में श्रमिकों की अचानक कमी न पड़ जाए.
सरकार की इस नीति के ख़िलाफ़ दो दबाव समूहों ने अदालत की शरण ली और अदालत ने उनके पक्ष में फ़ैसला सुनाया.
इन समूहों ने अदालत में दलील दी कि सरकार ने अंतरिम रूप से इस नीति को लागू करने से पहले संसद से भी मंज़ूरी नहीं ली.
मामले की सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय के जजों का कहना था कि सरकार ने इसे लागू करने के लिए जो रास्ता अपनाया है वो ग़ैर क़ानूनी है. जानकारों का कहना है कि अदालत का ये फ़ैसला गृहमंत्री टेरेसा मे के लिए बेहद शर्मिंदगी भरा है.
सरकार का संकट

ग़ौरतलब है कि डेविड कैमरन के चुनावी घोषणा पत्र में जो सबसे लोकप्रिय घोषणाएं थीं उनमें एक ये भी थी कि भारी संख्या में ब्रिटेन आने वालों की तादाद कम करने के लिए उनकी सरकार क़दम उठाएगी.
हालांकि सरकार के लिए ये नीति शुरुआती दौर में एक दिवास्वप्न जैसी ही रही और गठबंधन सरकार के लिए धर्म संकट साबित हो गई.
यही नहीं इस नीति के चलते कई लब्ध प्रतिष्ठ वैज्ञानिकों को असहज स्थिति से गुज़रना पड़ा क्योंकि ब्रिटेन में उनके प्रवेश पर प्रतिबंध लग जाता.
यही नहीं मंत्रिमंडल में भी इस नीति को लेकर मतभेद थे क्योंकि एक पक्ष ऐसा भी था जो ये मानता था कि इस नियम से ब्रिटेन के व्यापार जगत को और विश्वविद्यालयों को भारी क़ीमत चुकानी पड़ सकती है.
जहां तक गृहमंत्री की बात है तो उनसे तो ये सवाल भी पूछे जा सकते हैं कि उनके वकीलों ने इस नियम को लागू करने के समुचित तरीक़े से भी उन्हें क्यों नहीं अवगत कराया. हालांकि अभी भी मंत्रिमंडल इस नीति को अप्रैल से अमल में लाने के लिए अडा़ हुआ है.
बीबीसी के मुख्य राजनीतिक संवाददाता नॉर्मन स्मिथ का कहना है कि इस फ़ैसले से ये बात तो साबित हो ही गई कि विपक्ष में बैठ कर जो चीजें बहुत आसान और सपाट होती हैं वही सरकार में रहने पर किस तरह से समस्या बन जाती हैं.














