अमरीका में ईसाई और मुसलमानों पर चर्चा

अमरीका में प्रदर्शन

अमरीका में ग्राउंड जी़रो के पास मस्जिद बनाने के प्रस्ताव के जितने विरोधी हैं, उससे कहीं ज़्यादा उसका समर्थन कर रहे हैं.

फ़लोरिडा की एक ईसाई संस्था ने कहा है कि 11 सितंबर की नौवीं बरसी पर वो मुसलमानों की पवित्र क़िताब क़ुरान के पन्ने जलाएंगे.

ये संस्था अब तक समलैंगिक और गर्भपात के मामलों के खिलाफ़ आवाजें उठाती आई है लेकिन इन हमलों के बाद इसने मुसलमान समुदाय को अपनी नफ़रत का निशाना बनाया है.

इसके पादरी ने अपनी एक क़िताब में इस्लाम को 'शैतानों का धर्म' भी कहा है.

अब 9/11 हमलों में मरने वालों की याद में इस संस्था ने क़ुरान के पन्नों को जलाने की घोषणा की है.

इसका प्रचार फ़ेसबुक और दूसरी सोशल नेटवर्किंग साईट पर भी किया जा रहा है.

मुसलमान, अमरीका और विवाद

न्यूयॉर्क में 'ग्राउंड ज़ीरो' के निकट मस्जिद समेत एक इस्लामी संस्कृति केंद्र की योजना पर विवाद ने देश को बाँटकर रख दिया है.

ग्राउंड ज़ीरो

न्यूयॉर्क में 'ग्राउंड ज़ीरो' वही जगह है जहाँ 9/11 के हमले में ट्विन टावर गिराए गए थे

इन दोनों मुद्दों के कारण अमरीका से बाहर रह रहे मुसलमानों को महसूस हो रहा होगा कि अमरीकी इस्लाम और मुसलमानों के दुश्मन बन गए हैं. शायद थोड़ी सच्चाई इसमें हो. लेकिन एक तो ये कि ऐसे लोग बहुत कम हैं और दूसरा ये कि यह वक़्ती है.

एक महत्वपूर्ण बात ये है कि अब भी अधिकतर अमरीकी इस्लाम या मुसलमानों के ख़िलाफ़ नहीं हैं.

जहाँ 'ग्राउंड ज़ीरो' मस्जिद का विरोध हो रहा है, वहीं देश के कई शहरों में नए इस्लामी संस्कृति केंद्र खोले भी जा रहे हैं.

वाशिंगटन के मशहूर इस्लामी केंद्र में एक बड़ी मस्जिद भी है. वहां आप जाएँ तो महसूस ही नहीं होगा की आप 'ग्राउंड ज़ीरो' का विरोध करने वालों के देश में हैं.

अमरीका,भारत और समाज

अमरीका और भारत के समाज और इनकी राजनीति में काफी चीज़ें मिलती जुलती हैं. अमरीका में बहुमत ईसाइयों का है और भारत में हिंदू धर्म के मानने वालों का. लेकिन दोनों देशों में दूसरे धर्मों का भी बोलबाला है.

अमरीका की तरह भारत भी एक लोकतंत्र है लेकिन दोनों देशों का समाज धार्मिक है. लेकिन शायद समानता यहीं ख़त्म हो जाती है.

अमरीका में राष्ट्रपति के लिए राजनीतिक कारणों से ईसाई होना ज़रूरी है, भारत में नहीं.

अमरीका में राष्ट्रपति को ईसाई ही नहीं बल्कि एक अच्छा धार्मिक ईसाई होना भी ज़रूरी है.

मेरे विचार में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की लोकप्रियता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि वो गुरुद्वारा जाते हैं या नहीं या फिर वो कितने अच्छे सिख हैं.

भारत में प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति नास्तिक भी हो तो चलेगा.

मैंने अपने एक अमरीकी पत्रकार दोस्त से मज़ाक में कहा, " आप अगर अफ़गानिस्तान और इराक़ में अमरीकी आदर्शों का निर्यात कर सकते हैं तो भारत भी अमरीका को लोकतांत्रिक आदर्शों के बारे में कुछ सिखा सकता है."

ओबामा ईसाई या मुसलमान

ओबामा

ओबामा ईसाई हैं या मुसलमान अमरीका में इस पर चर्चा चली है

अमरीका में राष्ट्रपति बराक़ ओबामा के ईसाई होने पर शक किया जाता है.

हाल के एक सर्वेक्षण के अनुसार हर पाँच अमरीकी में से एक उन्हें मुसलमान समझता है. पिछले हफ़्ते उनके ख़िलाफ़ एक मुहिम चलाने वाले लोकप्रिय टीवी होस्ट ग्लेन बेक ने उनकी ईसाइयत पर सार्वजनिक रूप से शक प्रकट किया.

यहाँ लोग पहले से अनुमान लगा रहे हैं कि ओबामा दूसरी अवधि के लिए राष्ट्रपति नहीं चुने जाएँगे.

राजनीतिक रूप से उनकी ईसाइयत पर संदेह इसका एक कारण बन सकता है.

आप्रवासी

अमरीका के बड़े अखबारों ने बुधवार को सुर्ख़ियों में ख़बर छापी कि अवैध आप्रवासियों के अमरीका में आने की संख्या दो तिहाई कम हो गई है. मेरे विचार में ये एक महत्त्वपूर्ण ख़बर है.

न केवल अमरीकियों के लिए बल्कि उन सभी लोगों के लिए भी जो अवैध तौर पर अमरीका आने की सोच रहे हैं.

पाँच साल पहले तक अवैध रूप से अमरीका आने वालों की औसतन संख्या आठ लाख पचास हज़ार थी. पिछले साल यह घटकर तीन लाख हो गई.

जिस संस्था ने ये आंकड़े जुटाए हैं उसका कहना है कि इसका मुख्य कारण है पिछले दो तीन वर्षों में अमरीकी अर्थव्यवस्था में आया भारी संकट.

इस साल के शुरू में ऐसा लगा कि संकट दूर हो गया है लेकिन अमरीका की आर्थिक स्थिति अब भी बहुत ख़राब है. अमरीकी ग़ैरक़ानूनी आप्रवास से काफ़ी चिंतित रहते हैं.

एरिज़ोना राज्य ने अवैध आप्रवास के ख़िलाफ़ एक क़ानून भी बनाया है. शायद अब इन्हें इसकी ज़रूरत ही न पड़े क्योंकि आर्थिक कठिनाई और बढ़ने से ये समस्या संभवत अपने आप ही ख़त्म हो जाए.

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