अमरीकी ख़ुफ़िया 'कमज़ोरी' की पोल खुली

वाशिंगटन पोस्ट अख़बार ने अमरीकी ख़ुफ़िया तंत्र को बेडौल और बेअसर करार दिया है.

एक अमरीकी अख़बार ने अपनी जांच में पाया है कि ग्यारह सितंबर के हमलों के बाद अमरीकी ख़ुफ़िया तंत्र का आकार इतना बेडौल हो गया है कि वो सही तरीके से काम नहीं कर पा रहा.

दो साल से चल रही जांच में वाशिंगटन पोस्ट अख़बार ने पाया है कि ख़ुफ़िया तंत्र इतना फूला हुआ है कि किसीको उसके आकार का या कुल खर्च का अंदाज़ा नहीं है.

टॉप सीक्रेट अमेरिका नामक अपनी रिपोर्ट में अख़बार ने लिखा है कि तीन हज़ार से भी ज़्यादा सरकारी और निजी संगठन खुफ़िया तंत्र से जुड़े हुए हैं और न तो ये पता है कितने लोग इसमें काम कर रहे हैं न ही कि कितनी एजेंसियां एक ही काम कर रही हैं.

वाशिंगटन पोस्ट का कहना है:

  • लगभग 2,000 निजी कंपनियां और 1,270 सरकारी एजेंसियां पूरे देश में 10,000 जगहों पर आतंकवाद विरोधी काम से जुड़ी हैं.
  • कुल 854,000 अमरीकी नागरिकों को उच्चस्तरीय सुरक्षा क्लीयरेंस मिली हुई है.
  • अमरीकी सरकार के 20 प्रतिशत आतंकवाद विरोधी महकमें ग्यारह सितंबर के हमलों के बाद बने हैं.
  • उच्च स्तरीय ख़ुफ़िया काम के लिए सिर्फ़ वाशिंगटन में 30 इमारतें बनी हैं.
  • अलग अलग एजेंसियां इतनी सारी रिपोर्टें प्रकाशित करती हैं कि अक्सर अधिकारी उन्हें नज़रअंदाज़ कर दे रहे हैं.

अमरीका के कार्यकारी ख़ुफ़िया प्रमुख डेविड सी गोंपर्ट ने कहा है कि अख़बार ने जो तस्वीर पेश की है वो सही नहीं है.

उनका कहना था, “हम मानते हैं कि हम एक ऐसे माहौल में काम कर रहे हैं जहां हम बहुत कुछ बताने की स्थिति में नहीं हैं. लेकिन वास्तविकता यही है कि यहां काम करने वाले लोगों ने हमारे अभियानों को बेहतर किया है, हमलों को रोका है और हर दिन ऐसी कामयाबियां हासिल कर रहे हैं जिनके बारे में बताया नहीं जाता.”

अख़बार का कहना है कि सुरक्षा तंत्र के फैलाव से अरबों डॉलर के कॉंट्रैक्ट अलग अलग सरकारी एजेंसियों और निजी एजेंसियों को दिए गए हैं जिससे एक ऐसा तंत्र पैदा हो गया है जिसपर पूरी नज़र नहीं रखी जा सकती और उससे काफ़ी नुकसान हो रहा है.

बदलाव

ग्यारह सितंबर के बाद अमरीकी ख़ुफ़िया तंत्र में काफ़ी बदलाव किए गए.

एक डायरेक्टरेट ऑफ़ नैशनल इंटेलीजेंस का गठन किया गया जो ख़ुफ़िया मामलों से जुड़ी देश की 16 एजेंसियों पर नियंत्रण रखती है और पूरे तंत्र में काफ़ी संसाधन लगाए गए.

अमरीकी अधिकारियों का कहना है कि इससे काफ़ी फ़ायदा हुआ है.

बीबीसी के सुरक्षा मामलों के संवाददाता निक चाइल्ड्स का कहना है कि ग्यारह सितंबर के बाद अक्सर कहा गया कि अमरीकी ख़ुफ़िया एजेंसियां अलग अलग कड़ियों को जोड़ नहीं पाई थीं.

हाल ही में न्यूयॉर्क में हुआ असफल हमला हो या डेट्रॉइट में नाकामयाब रहा विमान हमला, दोनों ही दिखाते हैं कि ख़ुफ़िया एजेंसियां अभी भी कड़ियों को जोड़ नहीं पा रहीं.

सरकार की ख़ुफ़िया सलाहकार बोर्ड ने भी ख़ुफ़िया तंत्र की ये कहकर आलोचना की थी कि इसमें ज़रूरत से कहीं ज़्यादा लोग हैं और बेअसर हैं.

टॉप सीक्रेट अमेरिका नामक इस रिपोर्ट को पुलित्ज़र पुरस्कार से सम्मानित पत्रकार डाना प्रिस्ट ने बीस से ज़्यादा संवाददाताओं के साथ मिलकर संकलित किया है.

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