कसाब के मुक़दमे का सफ़र

अजमल कसाब

अजमल कसाब के ख़िलाफ़ मुकदमे में कई उतार चढ़ाव आए

मुंबई के बाज़ारों में कसाब के मुक़दमे पर आम आदमी का फ़ैसला साफ़ था, उसे फांसी पर लटका दो!

पाकिस्तान का बाशिंदा और अहम अभियुक्त मोहम्मद अजमल कसाब इस समय भारतीय जनता का दुश्मन नंबर वन हैं.

एक रिक्शे वाले ने मुझे अपनी राय यूं दी, "उसे एक साल तक जेल में रखा गया. सरकार ने पानी की तरह पैसा बहाया. उसे पकड़ते ही गोली मार देनी चाहिए थी."

लोकल ट्रेन पर सफ़र कर रहे एक मुसाफ़िर ने कहा, “जब उसे हमला करते साफ़ देखा गया और रंगे हाथों पकड़ा गया तो मुक़दमे की क्या ज़रुरत थी.”

लेकिन कानून की अदालत में फ़ैसले जनता की अदालत से अलग होते हैं.

जैसा कि जाने माने वकील माजिद मेमन ने मुझे बताया, "यह मुक़दमा भारत सरकार के लिए एक चुनौती थी. सारी दुनिया की निगाहें इस मुक़दमें पर टिकीं थीं. मुक़दमा भारतीय संविधान के अनुसार चला और यहाँ तक की अदालत ने कसाब को मुफ़्त में वकील भी दिया ताकि वो अपना बचाव कर सकें."

अदालत का फैसला जो भी हो आम तौर से यह माना जा रहा है कि यह भारतीय न्यायापालिका की विश्वसनीयता के लिए एक अहम मुक़दमा था.

आरोप

कुछ लोगों ने इस मुक़दमे की कार्रवाई के दौरान बचाव पक्ष के वकील के बदले जाने और कुछ दूसरी दुर्घटनाओं के मद्देनज़र इस क़ानूनी प्रक्रिया पर प्रश्न चिन्ह भी लगाए लेकिन जैसा कि माजिद मेमन कहते हैं,''‘इन दुर्घटनाओं से जज एम एल तहलियानी का फ़ैसला प्रभावित नहीं होगा.''

अजमल कसाब

कसाब पर 86 आरोप लगाए गए, जिनमें भारत के ख़िलाफ़ युद्ध का आरोप भी शामिल

पिछले साल अप्रैल में जब मुक़दमे की कारवाई शुरू हुई तो कसाब के ख़िलाफ़ 86 अलग-अलग आरोप लगाये गए, जिनमें भारत के ख़िलाफ़ युद्ध और हत्या के इल्ज़ाम सब से अहम थे.

मुक़दमे के लिए एक विशेष अदालत का गठन किया गया और मुंबई की आर्थर रोड जेल के अन्दर अदालत बिठाई गई. सुरक्षा के कड़े इंतज़ाम किए गए. इन सब में सरकार ने काफ़ी पैसे ख़र्च किए. मुक़दमे के दौरान 600 से अधिक गवाहों को अदालत में पेश किया गया.

मुक़दमे में कई ड्रामाई मोड़ आए. शुरू में ही कसाब ने दावा किया की वो नाबालिग़ है. यह दावा ग़लत पाया गया.

फिर मुक़दमें के दौरान जुलाई में अभियुक्त कसाब ने अचानक अपना ज़ुर्म क़ुबूल कर लिया और जज से फांसी पर लटका देने को कहा. लेकिन जज ने उसकी दरख़्वास्त रद्द कर दी और मुक़दमा जारी रहने के आदेश दिए.

नाटकीय मोड़

कसाब के इस रवैये पर सरकारी वकील उज्जवल निकम ने उसे अभिनेता और नाटकबाज़ जैसे नाम दिए.

मुकदमे में अगला नाटकीय मोड़ उस समय आया जब कसाब के वकील अब्बास काज़मी को जज ने केस से बाहर कर दिया. जज का कहना था की काज़मी मुक़दमे की कार्रवाई में देरी करके इसे तूल देना चाहते हैं.

बाद में काज़मी ने बीबीसी से एक बातचीत में दावा किया कि जज ने उन्हें झूठा कहा और सरकारी वकील ने उन्हें आतंकवादी का वकील कहा. उन्होंने यह भी शिकायत की कि अदालत का माहौल उनके ख़िलाफ़ था.

उधर पाकिस्तान ने आख़िर ये मान लिया कि कसाब उसका ही नागरिक है. पाकिस्तान ने यह भी स्वीकार किया कि मुंबई पर हुए हमलों में कुछ हद तक पाकिस्तानी नागरिक शामिल हो सकते हैं.

काज़मी की जगह उनके जूनियर वकील पवार को कसाब का वकील घोषित किया गया.

आख़िर मार्च में मुक़दमा ख़त्म हुआ. जज को कसाब के ख़िलाफ़ किसी फ़ैसले पर पहुँचने के लिए एक महीने से अधिक समय मिला है.

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