
जी-20 देशों के वित्तमंत्री और वित्तीय संस्थाओं के अधिकारी स्कॉटलैंड में हैं
जी-20 देशों के वित्तमंत्रियों की बैठक शनिवार को स्कॉटलैंड में होने जा रही है. लेकिन इस बैठक के पहले जलवायु परिवर्तन और अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए दी जाने वाली आर्थिक सहायता के मुद्दे पर मतभेद सामने आए हैं.
इस बैठक के दो प्रमुख मुद्दे भी यहीं हैं. एक तो यह कि किस तरह से कार्बन गैसों के उत्सर्जन को कम किया जाए और दूसरा यह कि वैश्विक आर्थिक मंदी के उबरने के लिए और क्या उपाय किए जाएँ.
सम्मेलन शुरु होने से पहले सेंट एंड्र्यूज़ में विरोध प्रदर्शन कर रहे कुछ लोगों को पुलिस ने हिरासत में लिया है.
अर्थव्यवस्था के सवाल
जी-20 देश के कुछ सदस्य, जैसे अमरीका, जापान और जर्मनी अब आर्थिक मंदी के दौर से उबरते हुए दिख रहे हैं इसलिए वो अब चर्चा करना चाहते हैं कि आर्थिक विकास की दर को किस तरह बढ़ाया जाए.
लेकिन अभी भी मंदी से जूझ रहा ब्रिटेन अभी भी कुछ एहतियात के साथ चलना चाहता है.
जैसा कि अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने कहा है, वर्ष 2014 तक जी-20 देशों का सरकारी खर्च, उनके सकल घरेलू आय की तुलना में 118 प्रतिशत हो जाने के आसार हैं.
मुद्राकोष के पैमाने के अनुसार इसे सुरक्षित स्तर तक नीचे लाने के लिए कई बरसों तक खर्च में कटौती आदि की ज़रुरत पड़ेगी.
इसलिए फ़्रांस जैसा देश अभी भी दबाव बना रहा है कि बैंकों में भारी भरकम बोनस देने पर रोक को बरकरार रखा जाए.
जलवायु परिवर्तन

वैश्वीकरण के विरोधियों ने इस सम्मेलन का विरोध किया है
अगले महीने कोपेनहेगन में होने वाले जलवायु परिवर्तन सम्मेलन से पहले जी-20 देशों के सामने एक बड़ा सवाल जलवायु परिवर्तन से निबटने के लिए विकासशील देशों के लिए धनराशि उपलब्ध करवाने का है.
बीबीसी के वाणिज्य संवाददाता जो लाइनैम का कहना है कि इस मुद्दे पर मतभेद हैं कि इस मुद्दे पर बात करने के लिए सही फ़ोरम कौन सा है.
ऐसे समय में जब कोपेनहेगन में क्योतो संधि के बदले एक नई संधि पर सहमति के आसार कम ही नज़र आ रहे हैं, कुछ देश चाहते हैं कि इस मुद्दे पर जी-20 के फ़ोरम में ही बात हो जानी चाहिए.
ब्रिटेन सहित कई देश कह चुके हैं और संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी संकेत दे चुके हैं कि क़ानूनी रुप से बाध्यकारी किसी संधि पर सहमति के आसार फ़िलहाल नहीं दिख रहे हैं.
कुछ और देश चाहते हैं कि इस मुद्दे पर अमरीका का रुख़ पहले साफ़ हो जाए.
लेकिन लगता है कि इस समय अमरीका की प्राथमिकता स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करना है और जलवायु परिवर्तन का विधेयक संसद में कुछ धीमी रफ़्तार से ही आगे सरक रहा है.














