'पापा का प्यार ही नहीं मिला'

manjeet singh

मंजीत सिंह ड्राईवर की नौकरी करते हैं

दिल्ली के पॉश कहे जाने वाले ईस्ट ऑफ़ कैलाश इलाके के ठीक पीछे एक कालोनी है जिसे आस-पास के लोग 'विधवा कालोनी' के नाम से जानते हैं.

दिल्ली विकास प्राधिकरण द्वारा 1984 के दंगों में विस्थापित सिख परिवारों को करीब 24 साल पहले यहाँ बसाया गया था.

संकरी गलियों और छोटे-छोटे घरों को पार कर मैं पहुंचा इसी कालोनी में एक कमरे के घर में रहने वाले मंजीत सिंह के ठिकाने पर.

करीब छह फुट लम्बे और अच्छी कद-काठी वाले मंजीत गर्मजोशी से हाथ मिलकर कहते हैं, "मैं ड्राईवर की नौकरी करता हूँ लेकिन आज काम पर नहीं गया क्योंकि पता था न्यूज़ वाले आ रहे हैं."

"मुझे तो माँ से ही पता चला की हमारे परिवार के पांच सदस्य दंगे में अपनी जान गँवा बैठे. मम्मी से ही सुना की किस मुश्किल में उन्होंने सिलाई का काम कर के हमें पाल-पोस कर बड़ा किया. अब तो माँ भी नहीं रहीं. पर हाँ पापा का प्यार कभी नहीं मिल सका"

मंजीत सिंह

मंजीत के पिता सरदार गोलू सिंह दिल्ली में ऑटो चलाते थे और इसी से परिवार भी चल रहा था. पर 31 अक्टूबर,1984 की शाम जब गोलू सिंह ने सुना की शहर में दंगे भड़क उठे हैं, वे सीधे अपने घर चले आये. उन्हें नहीं पता था की मौत उनके घर पर पहुँचने वाली है क्योंकि कथित दंगाइयों ने उसी रात उन्हें घर से बहार निकाल कर जला डाला.

हादसे के दिन मंजीत सिंह की उम्र थी मात्र पंद्रह दिन!

मंजीत को उस हादसे के बारे में तभी पता चला जब उनकी उम्र करीब 12-13 साल की हुई.

मंजीत बताते हैं, "मुझे तो माँ से ही पता चला की हमारे परिवार के पांच सदस्य दंगे में अपनी जान गँवा बैठे. मम्मी से ही सुना की किस मुश्किल में उन्होंने सिलाई का काम कर के हमें पाल-पोस कर बड़ा किया. अब तो माँ भी नहीं रहीं. पर हाँ पापा का प्यार कभी नहीं मिल सका."

जिम्मेदार किसे कहें?

मंजीत की इस बात को सुन मेरा अगला सवाल स्वाभाविक था. आखिर किसे जिम्मेदार मानते हैं वे? मंजीत सिंह ने थोडा रुक कर जवाब दिया, "अब जिम्मेदार किसे कहें. जो नेता लोग थे वही और जिन्हें भड़का दिया गया वे भी. पर अब क्या, जो होना था वो हो गया और दोषियों को सज़ा भी नहीं मिली."

इस पूरे इलाके में ऐसे कई घर हैं जहाँ पर 1984 के सिख विरोधी दंगों के पीड़ित रहते हैं.

लेकिन मंजीत की शुरूआती बातों से ऐसा ही लगा की इन सभी में समाज और सरकार के खिलाफ काफ़ी रोष होगा. साथ ही ये भी लग रहा था की मंजीत सिंह जैसे नौजवान शायद ही देश की मुख्यधारा का हिस्सा बन पाएं.

लेकिन मंजीत के जवाब में कुछ और ही मिला, "हम कहीं पर भी काम मांगने जाते हैं तो विधवा कालोनी का पता बताते ही लोगों को पता चल जाता है की हम कौन हैं. लेकिन हाँ, हमारे बचपन के यार दोस्तों या उनके परिवारों ने कभी भी हमारे साथ कोई भेदभाव नहीं किया. पर हम खुद इस दर्द को कैसे भुला सकते हैं."

मंजीत के इसी जवाब के बाद मैं चाह कर भी उनसे ये नहीं पूछ सका की उनके परिवार के साथ जो हुआ उसके बाद क्या अब तक मंजीत सिंह ने भी एक साधारण भारतीय युवा की ही तरह ज़िन्दगी बिताई है!

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