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गुरुवार, 09 अक्तूबर, 2003 को 18:11 GMT तक के समाचार पूर्व गोरखा सैनिक मुक़दमा हारे
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संभावना है कि परिवार को साथ रखने की अनुमति मिल जाएगी
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ब्रितानी सेना के सात पूर्व गोरखा सैनिक वह मुक़दमा हार गए हैं जिसमें उन्होंने सेना पर भेदभाव का आरोप लगाया था.
पूर्व गोरखा सैनिकों ने आरोप लगाया था कि उनको मिलने वाली पेंशन और मौजूदा सैनिकों को छुट्टियों के दौरान मिलने वाली तनख्वाह बहुत कम है.
उन्होंने यह आरोप भी लगाया था कि गोरखा सैनिकों को पत्नी और बच्चों को साथ रखने की अनुमति नहीं है जो मानवाधिकार और जातीय समानता के क़ानूनों का उल्लंघन है.
पूर्व गोरखा सैनिकों के वकील निकोलस ब्लैक ने लंदन की एक अदालत में कहा है कि गोरखा सैनिकों ने ब्रिटेन की सेवा में कई बरस लगाए हैं और अपनी जान जोख़िम में डाली है.
उन्होंने कहा, ''यदि जान जोखिम अन्य सैनिकों के ही बराबर है तो उनको मिलने वाला लाभ भी बराबर होना चाहिए.''
लेकिन न्यायाधीश साइमन ब्राउन, चैडविक और रिस्क ने अपने निर्णय में कहा कि रक्षा मंत्रालय ने क़ानून का उल्लंघन नहीं किया है.
जब ब्रिटेन ने 1997 में हाँगकाँग छोड़ा तब गोरखा सैनिकों को भी ब्रिटेन लाने का फ़ैसला किया गया और उनकी तनख्वाह ब्रितानी सैनिकों के बराबर कर दी गई थी.
लेकिन जब गोरखा सैनिक छुट्टी पर नेपाल में होते थे तब उन्हें उनकी तनख्वाह का पाँच प्रतिशत हिस्सा ही मिलता था.
पेंशन और परिवार
जो गोरखा सैनिक अधिकतम 17 साल की सेवा के बाद सेवानिवृत्त हुए उन्हें हर महीने 91 पाउंड यानी क़रीब सात हज़ार रुपए पेंशन मिलती है और जिन्होंने 22 साल की सेवा के बाद सेवानिवृत्ति ली उन्हें 623 पाउंड यानी लगभग 44 हज़ार रुपए हर माह की पेंशन मिलती है.
सात पूर्व गोरखा सैनिकों ने इस साल के शुरु में ब्रितानी रक्षा मंत्रालय के ख़िलाफ़ हाईकोर्ट में मुक़दमा दायर किया था.
अदालत ने गुरुवार को अपने निर्णय में कहा कि चूँकि गोरखा सैनिकों और ब्रितानी सैनिकों की परिस्थितियाँ एक जैसी नहीं हैं इसलिए उनको कम भुगतान किया जा सकता है.
हालाँकि जजों ने कहा कि गोरखा सैनिकों को अपने साथ सिर्फ़ तीन साल परिवार रखने की अनुमति दिया जाना ठीक नहीं है.
रक्षा मंत्रालय ने जून में इन शर्तों पर पुनर्विचार करने की घोषणा की थी.
गोरखा के वकीलों ने कहा है कि वे इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील नहीं करेंगे. |
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