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'इसराइल धमकी वापस ले'
संयुक्त राष्ट्र ने कहा है कि इसराइल फ़लस्तीनी नेता यासिर अराफ़ात को हटाने की अपनी धमकी वापस ले. अरब देशों ने शुक्रवार को ऐसा एक प्रस्ताव महासभा में रखा था जिसमें कहा गया था कि इसराइल से यासिर अराफ़ात को दी गई धमकी वापस लेने के लिए कहा जाए. प्रस्ताव पर लंबी बहस के बाद मतदान हुआ और उसे सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया. प्रस्ताव के पक्ष में 133 और विरोध में सिर्फ़ चार मत पड़े. अरब देशों ने इसी सप्ताह मंगलवार को यह प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में रखा था लेकिन वहाँ अमरीका ने अपने वीटो का इस्तेमाल करके इसे पारित होने से रोक दिया था.
महासभा में सभी 191 सदस्यों को मतदान का अधिकार है और वहाँ किसी देश को वीटो का अधिकार नहीं है जिसका मतलब है कि कोई भी एक देश इसे पारित होने से नहीं रोक सकता. लेकिन महासभा से पारित प्रस्ताव की हैसियत कुछ अलग होती है और उसकी कोई क़ानूनी मान्यता नहीं होती. महासभा अगर कोई प्रस्ताव पारित करती है तो उसे विश्व समुदाय की राय माना जाता है और बस इसका महत्व इतना ही होता है. जबकि सुरक्षा परिषद अगर कोई प्रस्ताव पारित करती है तो वह क़ानूनी रूप से बाध्य होता है. यह प्रस्ताव अरब देशों की तरफ़ से सूडान ने रखा था. अरब देशों के राजनयिकों का कहना है कि इस प्रस्ताव को सुरक्षा परिषद में पारित होने से रोकने के लिए अमरीकी वीटो के बाद निराश होकर इसे महासभा में रखा गया था. बहस महासभा में बहस की शुरुआत करते हुए फ़लस्तीनी प्रतिनिधि नासिर अल किदवा ने कहा कि यासिर अराफ़ात को बाहर निकालने की किसी भी कार्रवाई को "आतंकवादी कार्रवाई" समझा जाएगा.
"यासिर अराफ़ात को बाहर निकालने का मतलब होगा फ़लस्तीनी प्रशासन का ख़ात्मा और शांति योजना रोडमैप का भी ख़ात्मा." नासिर अल किदवा का कहना था कि दुनिया को इस तरह की धमकियों की निंदा करनी चाहिए. इसके जवाब में इसराइली प्रतिनिधि डैन गिलरमैन ने आरोप लगाया कि यासिर अराफ़ात अपनी तमाम ऊर्जा शांति की बहाली को रोकने में लगा रहे हैं. |
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