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गुरुवार, 17 जुलाई, 2003 को 20:11 GMT तक के समाचार
ग़रीबों की अनदेखी
कई अफ़्रीकी देश भयंकर ग़रीबी के दौर से गुज़र रहे हैं.
कई अफ़्रीकी देश भयंकर ग़रीबी के दौर से गुज़र रहे हैं.

अंतराष्ट्रीय रैडक्रास और रैडक्रीसेंट फ़ेडरेशन की एक ताज़ा रिपोर्ट में कहा गया है कि राहत और पुनर्वास के कामों में जुटी संस्थाएँ राजनीतिक- सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण देशों जैसे अफ़ग़ानिस्तान और इराक़ पर ज़्यादा ध्यान दे रही हैं.

और अफ़्रीका तथा कुछ दूसरे ग़रीब देशों में जहाँ तत्काल सहायता पहुँचाने की ज़रुरत है उनकी अनदेखी कर रही हैं.

विश्व आपदाओं से संबंधित इन एजेंसियों की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि विकसित देश शरण लेने वाले लोगों की संख्या कम करने पर तो बड़ी रक़म ख़र्च कर रहे हैं लेकिन उनकी मदद करने पर बहुत कम.

फ़ेडरेशन के अध्यक्ष जुआन मैनुअल सुआरेज़ डेल तोरो का कहना है कि "हमें विश्व मानवीय सहायता के मामले में काफ़ी ग़ैरबराबरी का सामना करना पड़ रहा है. कई ऐसे मामले है जहाँ दुनिया के कई युद्धों और आपदा की कई बड़ी घटनाओं को भुला दिया गया है."

जुआन तोरो का यह भी कहना है, "अगर सहायता एजेंसियाँ वाक़ई निष्पक्ष भाव से सहायता पहुँचाने के लिए वचनबद्ध हैं तो उन्हें अपने सिद्धांतों पर चलते हुए वहाँ सहायता पहुँचानी चाहिए जहाँ उसकी इस वक़्त सख़्त ज़रुरत है."


अगर सहायता एजेंसियाँ वाक़ई निष्पक्ष भाव से सहायता पहुँचाने के लिए वचनबद्ध हैं तो उन्हें अपने सिद्धांतों पर चलते हुए वहाँ सहायता पहुँचानी चाहिए जहाँ उसकी इस वक़्त सख़्त ज़रुरत है

जुआन तोरो
रिपोर्ट में कहा गया है कि अमरीकी प्रतिरक्षा मंत्रालय ने इस वर्ष अप्रैल माह में इराक़ के लिए राहत और पुनर्निमाण के लिए लगभग पौने दो अरब डॉलर की सहायता दी.

जबकि इसके विपरीत ठीक इसी समय 22 अफ़्रीकी देशों में भुखमरी रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र खाद्य कार्यक्रम को एक अरब डॉलर की कमी थी.

रिपोर्ट में न सिर्फ़ ये कि सरकारों की आलोचना की गई है बल्कि सहायता एजेंसियों पर भी यह आरोप लगाया गया है कि वे विश्व की कई असाध्य आपदाओं की अनदेखी के लिए ज़िम्मेदार हैं.

निष्क्रियता

रिपोर्ट कहती है कि की ज़्यादातर अंतराष्ट्रीय संस्थाएँ सन 2002 में दक्षिण अफ़्रीका में आए सूखे के दौरान खामोश रहीं.

फ़ेडरेशन ने सहायता एजेंसिंयों पर यह आरोप भी लगाया है कि कई बार वे ग़लत तरह की सहायता भी उपलब्ध कराती रहीं.

इसमे कहा गया है कि जनवरी सन 2002 में टोक्यो में हुए दाता देशों के सम्मेलन में अफ़ग़ानिस्तान को दी जाने वाली सहायता राशि की दो-तिहाई रक़म मानवीय सहायता के लिए निर्धारित की गई थी.

लेकिन अफ़ग़ान अधिकारियों के विरोध के बावजूद यह सहायता अवांछित खाद्य सामग्री के रुप में वहाँ पहुँची और इससे देश की कृषि अर्थव्यवस्था को नुक़सान पहुँचा.

एक अनुमान के मुताबिक़ अफ़ग़ानिस्तान में गेहूँ के मुक़ाबले अफ़ीम पैदा करने से 20 से 40 गुना ज़्यादा फ़ायदा होता है.

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि कई बार तो राहत कार्यों में सहायता एजेंसियों का योगदान बहुत ही कम था.

मिसाल के तौर पर 1999 में मरमारा, तुर्की में आए भुकंम्प के दौरान मलबे से जिन पचास ह़जार लोगों को ज़िंदा बाहर निकाला गया उनमें 98 प्रतिशत लोग स्थानीय लोगों द्वारा निकाले गए.

प्रवासियों की दुर्दशा

इस रिपोर्ट में प्रवासियों की दुर्दशा के बारे में कहा गया है कि उन्हें पूरी तरह भुला दिया गया है.

हालाँकि वे आर्थिक रुप से काफ़ी अहम हैं, और प्रत्येक वर्ष 80 अरब डॉलर अपने घरों को भेजते हैं. जबकि सरकारों की विकास सहायता 50-55 अरब डॉलर है.

संयुक्त राष्ट्र के एक अनुमान के मुताबिक़ यूरोपीय संघ की जनसंख्या इस तेज़ी के साथ सिकुड़ रही है कि उसे सन 2050 तक अपने श्रमिकों की संख्या सन 2000 के स्तर पर रखने के लिए 20 करोड़ 70 लाख प्रवासी श्रमिकों की ज़रुरत होगी.

इस रिपोर्ट में शरण माँगने वाले लोगों की स्थिती पर भी गहरी चिंता व्यक्त की गई है.

रिपोर्ट कहती है कि उन्हें मदद करने के बजाय ज़्यादा पैसा उन्हें बाहर निकालने पर ख़र्च होता है.
 
 
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