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शुक्रवार, 30 मई, 2003 को 09:38 GMT तक के समाचार क्या है मध्य पूर्व रोड मैप?
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दो साल के अंदर इसराइल-फ़लस्तीन संघर्ष को समाप्त करने की चरणबद्ध योजना को रोड मैप नाम दिया गया है. अमरीका, रूस, यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र द्वारा तैयार किए गए इस रोड मैप में हर चरण के लिए लक्ष्य और तिथि निर्धारित किए गए हैं.
योजना के मुख्य चरण कौन से हैं?
*पहला चरण(मई 2003)- फ़लस्तीनी हिंसा पर रोक. फ़लस्तीनी राजनीतिक सुधार. बस्तियाँ बसाने के इसराइली क़दम पर रोक और सैनिकों की वापसी. फ़लस्तीनी चुनाव.
*दूसरा चरण(जून-दिसंबर 2003)- एक स्वतंत्र फ़लस्तीनी राष्ट्र की स्थापना. रोड मैप के कार्यान्वयन की निगरानी के अंतरराष्ट्रीय प्रयास और सम्मेलन.
*तीसरा चरण(2004-2005)- दूसरा अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन. फ़लस्तीनी राष्ट्र के स्थाई दर्जे के संबंध में संधि. सीमाओं, यरुशलम, शरणार्थियों और बस्तियों के बारे में अंतिम समझौता.
अमरीकी राष्ट्रपति बुश क्यों अचानक मध्य पूर्व मामलों में व्यक्तिगत दिलचस्पी लेने लगे हैं?
अमरीकी राष्ट्रपति कार्यालय का कहना है कि मध्य पूर्व एक आशाजनक स्थिति में पहुँच गया है और राष्ट्रपति इसे ज़्यादा से ज़्यादा उम्मीदों वाला अवसर बनाने की कोशिश कर रहे हैं. उनकी मध्य-पूर्व में उपस्थिति को फ़लस्तीनियों और इसराइलियों को दिए जा रहे पुरस्कार के रूप में देखा जा रहा है- फ़लस्तीनियों को नए प्रधानमंत्री की नियुक्ति के लिए और इसराइल को रोड मैप पर सहमत होने के लिए. यह अरब जनता को यह समझाने का मौक़ा भी समझा जा रहा है कि इराक़ युद्ध के बावजूद राष्ट्रपति बुश की मध्य पूर्व में शांति स्थापित करने में दिलचस्पी है.
कितनी अहम है अमरीका की भूमिका?
बहुत अहम. अमरीका ही एकमात्र ऐसा देश है जो मध्य पूर्व में वास्तव में कुछ कर सकता है. अन्य देशों और मध्यस्थों के ज़रिए भी कुछ प्रगति हो सकती है, लेकिन इसराइल का यूरोपीय संघ, रूस या संयुक्त राष्ट्र पर ज़्यादा भरोसा नहीं है. अधिकतर विश्लेषकों का भी मानना है अमरीका की सक्रियता से ही कोई समाधान निकल सकता है.
अन्य शांति योजनाएँ नाकाम रही हैं तो रोड मैप से कितनी उम्मीद की जाए?
विश्लेषकों का मानना है कि इराक़ युद्ध के बाद मध्य पूर्व में सभी पक्षों पर अभूतपूर्व दबाव है. शांति के लिए प्रयासरत पक्षों का मानना है कि इस भारी दबाव के कारण इसराइल और फ़लस्तीन दोनों कुछ रियायतों के लिए सहमत हो सकते हैं. दूसरी ओर निराशावादियों का मानना है कि सद्दाम हुसैन शासन के ख़ात्मे का इसराइल-फ़लस्तीन संबंधों पर कोई ख़ास असर नहीं पड़ेगा. वे बुश की प्रतिबद्धता पर भी सवाल उठाते हैं, ख़ास कर 2004 में होनेवाले अमरीकी चुनावों के मद्देनज़र.
क्या यासिर अराफ़ात को इन कोशिशों से अलग रखने का इसराइल और अमरीका का फ़ैसला सही है?
नहीं. अराफ़ात ने साफ कर दिया है कि वह अब भी महत्वपूर्ण हैं. अराफ़ात और उनके समर्थकों का गहरा प्रभाव है और प्रधानमंत्री अबू माज़िन की अपने-आप में कोई ख़ास हैसियत नहीं है. अंतरराष्ट्रीय राजनयिक अब भी रामल्ला में अराफ़ात से मिलने जाते हैं. हालाँकि इसराइल वैसे राजनयिकों को अहमियत देने से इनकार करने लगा है जो अराफ़ात से मिलने जाते हैं.
क्या फ़लस्तीनी चरमपंथियों, ख़ास कर आत्मघाती हमलावरों पर प्रभावशाली रोक लग सकती है?
अबू माज़िन ने कहा है कि चरमपंथियों को रोकने का सबसे अच्छा तरीक़ा है सशस्त्र गुटों के साथ संघर्षविराम संबंधी समझौते करना. कुछ लोगों का मानना है कि परिस्थितियाँ अनुकूल रहीं तो अस्थाई शांति संधि हो सकेगी. हालाँकि हमास संगठन ने इस बात से इनकार किया है कि किसी शांति समझौते की प्रक्रिया चल रही है. उधर इसराइल ने कहा है कि उसका प्रस्तावों में नहीं वास्तविक क़दमों में दिलचस्पी है.
क्या रोड मैप संबंधी इसराइल की चिंता शांति स्थापित करने में बाधक बनेंगी?
यह अभी साफ नहीं है. इसराइली प्रधानमंत्री अरियल शेरॉन ने फ़लस्तीनी राष्ट्र के विचार को मान लिया है जो कि रोड मैप का प्रमुख लक्ष्य है. लेकिन समय सीमा और क़दम उठाने संबंधी रोड मैप के निर्देशों के बारे में इसराइली आपत्तियों के कारण लक्ष्यों को पाने में देरी हो सकती है.
क्या फ़लस्तीनी राष्ट्र का प्रस्ताव कितना व्यवहारिक है?
रोड मैप का स्पष्ट लक्ष्य है फ़लस्तीनी राष्ट्र का गठन. इसके व्यवहारिक होने के लिए ज़रूरी होगा कि इसराइल पश्चिमी तट स्थित अपनी अधिकांश बस्तियों को खाली करे.
यदि रोड मैप पर कार्यान्वयन होता है तो इसराइली बस्तियों की आबादी और फ़लस्तीनी शरणार्थियों का क्या होगा?
ये दोनों सवाल विवाद के केंद्र में रहे हैं. रोड मैप इस बारे में अंतिम समझौते को प्रक्रिया की समाप्ति तक के लिए टालता है.
इसमें बस्तियाँ बसाने के काम पर अस्थाई रोक और पिछले दो साल में बनी बस्तियों को खाली करने की बात है. |
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