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रविवार, 23 मार्च, 2003 को 15:03 GMT तक के समाचार
बस बेबस बैठे रहे कुंबले
कुंबले ने अपनी बदौलत कई बार भारत को जीत दिलाई है
कुंबले ने अपनी बदौलत कई बार भारत को जीत दिलाई है

अनिल कुंबले के लिए सचमुच वो पल कठिन रहे होंगे जब उनके साथी गेंदबाज़ ऑस्ट्रेलिया के रनों की रफ़्तार पर अंकुश लगा पाने में नाक़ाम नज़र आ रहे थे.

एक दिवसीय मैचों में तीन सौ से ज़्यादा विकेट लेनेवाले अनिल कुंबले को शायद इस तरह घुटने टेकना गवारा ना हो रहा हो क्योंकि हो सकता है उनका ये आख़िरी विश्व कप हो.

बत्तीस वर्षीय कुंबले भारतीय टीम में तो हैं मगर फ़ाइनल मैच में उनको जगह नहीं मिल पाई.

कुंबले इस प्रतियोगिता में बस तीन मैचों में खेल पाए हांलाकि हॉलैंड के साथ हुए मैच में उन्होंने बत्तीस रन देकर चार विकेट चटकाए थे.

मगर भारतीय कप्तान और प्रबंधकों ने अपने तीन तेज़ गेंदबाज़ों के साथ स्पिन गेंदबाज़ी का दारोमदार हरभजन सिंह पर छोड़कर सात बल्लेबाज़ों को मौक़ा देने की रणनीति बनाई.

और इस वजह से कुंबले के लिए टीम में जगह नहीं बन पाई.

और ऑस्ट्रेलियाई के महान खिलाड़ी रह चुके इयन चैपल ने कुंबले को ना खिलाने के फ़ैसले पर सवाल उठाए हैं.

निश्चित तौर पर वो भारतीय प्रशंसक भी इससे काफ़ी हद तक सहमत होंगे जो अपनी टीम को बेबस देखना नहीं चाहते थे.

अब अगला विश्व कप जब होगा तो कुंबले उस वक़्त तक छत्तीस साल के हो चुके होंगे और कंधे की परेशानी के कारण उनका वेस्टइंडीज़ जा पाना भी संदेहास्पद है.

वैसे अरविन्द डिसिल्वा ने सैंतीस वर्ष की उम्र मे भी श्रीलंका के लिए खेलकर ये साबित कर दिया है कि जज़्बा और क़ाबिलियत हो तो उम्र कोई मायने नहीं रखती.

पिछले विश्व कप

अनिल कुंबले विश्व कप में पहली बार 1996 में खेलने उतरे थे हांलाकि अपना पहला वन डे उन्होंने छह साल पहले खेला था.

कुंबले ने 96 के विश्व कप मे पंद्रह विकेट लिए थे मगर सेमीफ़ाइनल मैच में निराशाजनक हार के कारण उनका ये प्रदर्शन भुला दिया गया.

चार साल बाद अगले विश्व कप में कुंबले ने आठ विकेट लिए और भारत सुपर सिक्स तक पहुँचकर बाहर हो गया.

मगर इस बार के विश्व कप के लिए कुंबले की तैयारी ठीक से नहीं हो पाई.

पिछले साल जब वेस्टइंडीज़ भारत आई थी तो वो उस श्रृंखला में नहीं खेल पाए थे और फिर जब भारतीय टीम न्यूज़ीलैंड गई तो भी वो व्यक्तिगत कारणों से टेस्ट मैचों में नहीं खेल पाए.

और इस बार जब पाकिस्तान के साथ हुए महत्वपूर्ण मैच में कुंबले एक भी विकेट नहीं ले पाए तो लगा जैसे टीम को उनकी ज़रूरत नहीं रही.

और ऐसा लग रहा है कि जिस तरह भारत का विश्व कप अभियान निराशा के साथ समाप्त होने जा रहा है कुछ उसी अंदाज़ में अनिल कुंबले के एक दिवसीय मैचों के करियर का भी समापन बेहद ठंडा रहेगा.
 
 
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